रियांग शरणार्थियों के जीवन में नया सवेरा

    दिनांक 01-मई-2021   
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केंद्र सरकार के अच्छे कार्यों की सूची में एक और काम जुड़ गया है। वह काम है त्रिपुरा में रह रहे मिजोरम के रियांग शरणार्थियों की समस्याओं का समाधान करना। अब इन शरणार्थियों को स्थाई रूप से त्रिपुरा में ही बसाने का काम शुरू हो गया है
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हादुकुलूक में शरणार्थियों से बात करते मुख्यमंत्री बिप्लब देब


 आखिर त्रिपुरा में 23 साल से शरणार्थी जीवन बिता रहे ब्रू (रियांग) जनजाति के लोगों के लिए नया सवेरा हो ही गया। अब ये लोग शरणार्थी नहीं, बल्कि कानूनन त्रिपुरा के नागरिक हो गए हैं। अब इन्हें त्रिपुरा में वे सारी सुविधाएं मिलने लगी हैं, जो त्रिपुरा के और किसी भी नागरिक को मिलती हैं। यह चमत्कार हुआ है 16 जनवरी, 2020 को हुए एक समझौते पर अमल से। उल्लेखनीय है कि यह समझौता केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की देखरेख में केंद्र सरकार, त्रिपुरा सरकार, मिजोरम सरकार और ब्रू जनजाति के प्रतिनिधियों के बीच हुआ था। इसमें लगभग 37,000 रियांग शरणार्थियों को त्रिपुरा में ही बसाने पर सहमति बनी थी। समझौते के अंतर्गत प्रत्येक विस्थापित परिवार को 1200 वर्ग फीट का आवासीय भूखंड दिया जा रहा है। इसके साथ ही हर विस्थापित परिवार को घर बनाने के लिए 1,50,000 रु. की सहायता दी जा रही है। राज्य सरकार विस्थापित परिवारों के लिए मतदाता पहचानपत्र, बैंक खाते, आधार कार्ड, जाति और निवासी प्रमाणपत्र आदि कागजातों की व्यवस्था करेगी।

अब इन लोगों को स्थाई रूप से बसाने के लिए त्रिपुरा के धलाई जिले के हादुकुलूक में एक कॉलोनी बनाई जा रही है। इसे देखने के लिए 29 अप्रैल को त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लव देब हादुकुलूक पहुंचे। इस अवसर पर उन्होंने कुछ रियांगों से भी बातचीत की और उनका हालचाल लिया। शरणार्थियों की समस्या का हल करने के लिए उन्होंने केंद्र सरकार को धन्यवाद भी दिया। उन्होंने कहा, ‘‘23 साल से ये लोग अपने ही देश में शरणार्थी के रूप में रह रहे थे, पर अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के कारण इनकी समस्या का समाधान हो गया है। इनका सपना था स्थाई मकान। अब इनका सपना पूरा होने जा रहा है।’’

क्यों हुए थे विस्थापित  

मिजोरम में रहने वाले ब्रू जनजाति के लोगों ने 1995 में अपनी संस्कृति की रक्षा और अपने लोगों के विकास को गति देने के लिए अपनी बहुलता वाले क्षेत्रों के लिए ‘स्वायत्त जिला परिषद’ की मांग की थी। इसका विरोध प्रशासन ने तो नहीं किया, लेकिन कहा जाता है कि प्रशासन की शह पर मिजो समुदाय (यानी ईसाई समाज) ने किया। इस कारण ब्रू जनजाति और मिजो समुदाय के बीच संघर्ष हुआ। यह दो साल तक चला। अंत में 1997 में ब्रू जनजाति के लोगों को त्रिपुरा में आकर शरण लेनी पड़ी। तभी से ये लोग उत्तरी त्रिपुरा के कंचनपुर अनुमंडल में बने शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। 1997 में इनके विस्थापन के छह महीने बाद ही इनकी समस्या के समाधान के लिए सरकारों ने प्रयास किए, पर पूर्ण सफलता नहीं मिली।

2014 तक 1,622 ब्रू परिवारों को कई समूहों में मिजोरम वापस भेजा भी गया। लेकिन मिजो समुदाय के विरोध के कारण कुछ साल तक यह मामला आगे नहीं बढ़ पाया। इसके बाद 3 जुलाई, 2018 को ब्रू जनजाति के प्रतिनिधियों, त्रिपुरा सरकार, मिजोरम सरकार और केंद्र सरकार के बीच एक दूसरा समझौता हुआ। इसके अंतर्गत 5,260 ब्रू परिवारों के 32,876 लोगों को 435 करोड़ रु. मी मदद दी गई। इसके बाद 2018-19 में ब्रू जनजाति के 1,369 लोग मिजोरम वापस भी गए। इस समझौते के कारण इन्हें मिजोरम में जाति एवं निवास प्रमाण-पत्र के साथ मतदान करने का अधिकार भी मिला। पर अधिकतर ब्रू लोगों ने अपनी सुरक्षा का हवाला देते हुए मिजोरम जाने से मना कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने त्रिपुरा में ही बसाने की मांग की।

कौन हैं ब्रू

ब्रू जनजाति मूल रूप से म्यांमार की है। हालांकि इस जनजाति के कुछ लोग बरसों पहले मिजोरम में बस गए थे। इसलिए मिजो समुदाय इन्हें बाहरी मानता है। इस जनजाति की जनसंख्या मिजोरम के मामित और कोलासिब जिलों में सबसे अधिक है। कुछ ब्रू असम में भी  हैं। बांग्लादेश के चटगांव जिले की पहाड़ियों में भी ब्रू जनजाति के लोग रहते हैं। इस जनजाति की 12 उपजातियां हैं। इनमें से एक रियांग है। त्रिपुरा में रहने वाले ब्रू रियांग उपजाति के हैं इसलिए वहां इन्हें रियांग कहा जाता है।