कोरोनावायरस चीन का जैविक हथियार है!

    दिनांक 10-मई-2021   
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चीन ने जैविक हथियारों के बूते तीसरा विश्व युद्ध लड़ने और जीतने का मंसूबा बरसों पहले पाल लिया और इस रणनीति में उसके वैज्ञानिक और सैन्य प्रशासन दोनों शामिल थे। कोरोना कहीं इस रणनीति का हिस्सा तो नहीं
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अगर कुछ सच है, तो वह बार-बार सिर उठाएगा। यही चीनी वायरस के मामले में भी हो रहा है। पिछले साल वायरस के संक्रमण के साथ ही चीन संदेह के घेरे में आ गया था और एक बार फिर वह निशाने पर है। इस बार आरोप उसी कड़ी में, लेकिन उससे कहीं अधिक गंभीर हैं। आरोप है कि चीन ने जैविक हथियारों के बूते तीसरा विश्व युद्ध लड़ने और जीतने का मंसूबा बरसों पहले पाल लिया और इस रणनीति में उसके वैज्ञानिक और सैन्य प्रशासन दोनों शामिल थे।  

 
कोरोनावायरस के फैलने के साथ ही जो चीन की ओर उंगलियां उठी थीं, वे अब कुछ सख्ती के साथ तनती दिख रही है। चीन के ही वैज्ञानिकों और अधिकारियों के लीक दस्तावेज से इस बात का खुलासा हुआ है कि कोरोनावायरस के फैलने से बरसों पहले चीन सार्स वायरस के जैविक हथियार के तौर पर इस्तेमाल की तैयारी कर रहा था। ड्रैगेन जैविक हथियारों से अगले विश्व युद्ध को अंजाम देने की संभावनाओं को टटोल रहा था। जाहिर है, यह एक कहीं संगीन आरोप है और इसकी जड़ों तक पहुंचना जरूरी है।

भारत में जिस तरह कोविड-19 की यह दूसरी लहर मौत का पैगाम बन गई है, उसमें इस तरह की आशंकाएं पहले ही जन्म लेनी लगी थीं। लोगों के मन में यह सवाल तो उठने ही लगा था कि आखिर जिस भारत ने पहली लहर का न केवल बड़ी सफलता के साथ मुकाबला किया, बल्कि पूरी दुनिया को वैक्सीन और जरूरी दवाएं दीं और महज तीन-चार महीने पहले तक दुनिया को रास्ता दिखा रहा था, वह खुद इतनी दयनीय स्थिति में कैसे पहुंच गया कि तमाम छोटे-बड़े देशों को उसकी मदद के लिए आगे आना पड़ा?

सनसनीखेज खुलासा


ऑस्ट्रेलिया के अखबार वीकेंड ऑस्ट्रेलियन में प्रकाशित रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन 2015 से ही सार्स कोरोनावायरस को जैविक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की संभावनाओं पर विचार कर रहा था। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 'अननैचुरल ओरिजन ऑफ सार्स एंड न्यू स्पेसीज ऑफ मैनमेड वायरेस' शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में चीन की वैश्विक महत्वाकांक्षा और उसे पूरा करने के तरीके पर बात की गई है। इसमें कहा गया है कि तीसरा विश्व युद्ध में जैविक हथियार निर्णायक साबित होंगे और चीन के वैज्ञानिक और उसकी सेना जिन जैविक हथियारों पर विश्वसनीयता के साथ भरोसा कर सकती है, उनमें कोरोना वायरस हो सकता है। इस रिपोर्ट के अआने के बाद दुनियाभर में गंहामा है। हर ओर से चीन के खिलाफ जांच की मांग हो रही है। उधर, चंद ही रोज पहले की बात है कि अमेरिका ने भी कोरोनावायरस के फैलने में चीन के हाथ की संभावित जांच शुरू कर दी है। माना जा रहा है कि 2015 से ही कोरोनावायरस को जैविक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने पर चीन के काम करने की जानकारी मिलने के ही बाद अमेरिकी कांग्रेस ने इस मामले में जांच का फैसला किया।

चीन के खिलाफ विश्वमत

जैविक हथियार से तीसरा विश्वयुद्ध लड़ने के चीन के मंसूबों केसामने आने के बाद दुनियाभर में चीन विरोधी भावना मजबूत होने लगी है। ब्राजील के राष्ट्रपति ने अभी हाल ही में कहा था कि कोरोनायवरस मानव निर्मित हो सकता है और संभव है कि इसका इस्तेमाल जैविक हथियार के तौर पर किया गया हो। हालांकि उन्होंने चीन का नाम नहीं लिया, लेकिन इशारा साफ था। लेकिन ब्राजील के राष्ट्रपति के इस बयान के सामने आने के बाद ही मामले को रफा-दफा करने के लिए यह बात प्रचारित की जाने लगी कि कोरोनावायरस के कारण ब्राजील में कोभी मौत हो रही है और राष्ट्रपति अपनी नाकामियों से लोगों का ध्यान हटाने के लिए वह इस तरह की बातें कर रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि कोरोनावायरस के कारण हर देश को जिस तरह के हालात का सामना करना पड़ रहा है, उसका एक घरेलू पक्ष भी है। जो देश ज्यादा प्रभावित हैं, वहां के जनमानस में तरह-तरह की बातें उठ रही हैं, और किन्ही खास उद्देश्यों से कुछ ताकतें लोगों में असंतोष बढ़ाने का काम कर रही हैं, लेकिन उनका केवल घरेलू बाध्यताओं से निर्देशित होना एक व्यापक मुद्दे को निहायत छोटे परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करते हुए पूरे विमर्श को केंद्र से हटाकर परिधि की ओर खिसका देना है।  

चीन आग-बबूला

चीन के खिलाफ जैविक युद्ध छेड़ने का आरोप लगे तो उसे आग-बबूला तो होना ही चाहिए। चीन के सरकारी मीडिया; वैसे चीन में क्या सरकारी और क्या गैर-सरकारी, वहां मीडिया की मतलब ही है सरकारी भोंपू; ने दुनियाभर में चल रहे इस तरह के ‘दुष्प्रचार’ का कड़ा विरोध किया है। ग्लोबल टाइम्स ने कहा कि “ऑस्ट्रेलियाई अखबार ने कोविड-19 के स्रोत को लेकर लीक कागजात के तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया। उन्होंने अपनी इस कॉन्सपिरेसी थ्योरी कि चीन ने नोवल कोरोनावायरस को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की रणनीति कई साल पहले तैयार कर ली थी, को साबित करने के लिए ऐसा किया।”

हमारे यहां का कानून कहता है कि जब तक कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिए दोषी साबित नहीं हो जाता, वह निर्दोष है और पूरी दुनिया की कानून-व्यवस्था मोटे तौर पर इसी सिद्धांत पर चलती है। ऐसे में दुनियाभर में चीन के खिलाफ ‘बिना सबूत’ जो उंगलियां उठाई जा रही हैं, वह अनुचित है। सवाल यह उठता है कि ऐसे में क्या करना चाहिए? कोरोनावायरस के फैलने के साथ ही जो चीन का ‘मान मर्दन’ किया जा रहा है, उसकी उन्नति और प्रगति को देखकर जो ताकतें जलकर उसके खिलाफ मनगढ़ंत आरोप लगा रही हैं, आधे-अधूरे तथ्यों के साथ विशालकाय ड्रैगन पर जो उंगलियां उठाई जा रही हैं, उसका निदान क्या है?

चीन की बेगुनाही सिद्ध करने के लिए हो जांच

है न! चीन को बदनाम करने का जो भी अभियान चला है, उससे चीन को पाक-साफ निकालने का एक तरीका है। वह यह कि इस बात के लिए जांच न हो कि चीन दोषी है। इस बात को केंद्र में रखकर जांच हो कि चीन निर्दोष है और यह जांच पूरी ईमानदारी के साथ हो। जहां-जहां, जिन-जिन आधारों पर चीन को दोषी ठहराए जाने का अभियान चल रहा है, उन्हें एक-एक करके खारिज करते चला जाए। निहायत मानवतावादी प्रयोगों में जुटी वुहान की प्रयोगशाला के खिलाफ दुनियाभर में चलाया जा रहा दुष्प्रचार अभियान बंद होना चाहिए। दुनिया के सामने यह सच आना चाहिए कि एक पीड़ित को ही गुनहगार साबित करने की कैसी साजिश चल रही है! कुछ इसी तरह के अभियान का शिकार उसका जिगरी दोस्त पाकिस्तान पहले ही हो चुका है जिसे दुनिया आतंकवादी मुल्क साबित करने पर तुली है जबकि वह तो खुद इसका पीड़ित और शिकार है!

भारत दिलाए चीन को न्याय

तो अब भारत को क्या करना चाहिए! विश्वबंधुत्व की भावना पर चलने का दावा करने वाले भारत को चाहिए कि वह न्याय की बात करे, अपने पूर्वाग्रहों से बाहर आकर यह सुनिश्चित करे कि दुनिया चीन को निर्दोष सिद्ध करने के लिए एकजुट होकर काम करे, जांच करे, हर उस स्रोत को खंगाले जिसके आधार पर भोले-भाले ड्रैगन को रक्तपिपासू साबित करने का अभियान चल रहा है। चांज कर यह साबित करे कि चीन ने जैविक हथियार विकसित करने का कोई कार्यक्रम नहीं चलाया, उसका दुनिया के अपने विरोधियों को जैविक हथियार का शिकार बनाने का कोई इरादा नहीं था, कोरोनावायरस से एक भी व्यक्ति की मौत से पहले ही चीन द्वारा इसकी वैक्सीन बना लेने की बात बेबुनियाद है, कोरोनावायरस के कारण चीन की अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचने के आरोपों में कोई तथ्य नहीं। हर धार्मिक आयोजन में आकाश की ओर हाथ उठाकर ‘विश्व का कल्याण हो’ का उद्घोष करने वाले हिंदू दर्शन को व्यवहार में लाने की अगर हमारी लेशमात्र भी इच्छा है, तो चीन के दामन पर लगे इन धब्बों को मिटाने का बीड़ा हमें ही उठाना चाहिए। तभी विश्व का कल्याण हो सकेगा।