झूठ का बोलबाला

    दिनांक 26-मई-2021   
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इन दिनों लोकतंत्र को झूठी खबरों की चुनौती मिल रही है। तथ्यों को छुपाकर खबरें गढ़ी जाती हैं और सोशल मीडिया के जरिए उन्हें प्रचारित किया जाता है। लोग जब तक सही-गलत की पहचान कर पाते हैं तब तक बहुत नुकसान हो चुका होता है
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पिछले कुछ बरसों में ‘फेक न्यूज’ शब्द का अर्थ-विस्तार हुआ है। किसी की छवि बनाने या बिगाड़ने, तथ्यों का हेरफेर करने और झूठ का मायाजाल खड़ा करने की यह कला क्या तकनीक के विस्तार के साथ और फैलेगी? क्या वैश्विक स्तर पर इसके खिलाफ कुछ नहीं हो सकता? क्या यह वैश्वीकरण का अंतर्विरोध है या लोकतंत्र को बेहतर बनाने के रास्ते में खड़ी एक नई चुनौती? मामूली-सी गलत सूचना के कारण हम हाल के वर्षों में कई घटनाओं को होते हुए देख चुके हैं।

इस्रायली लेखक युवाल नोह हरारी ने 21वीं सदी के 21 सबक शीर्षक से अपनी किताब में लिखा है कि हम ‘उत्तर-सत्य’ दौर में हैं। बेशक ऐसा मनुष्य प्रजाति के जन्म के बाद से ही है। पर आज उसका जो रूप सामने आ रहा है, वह भयावह है।

अक्सर हम झूठ को इस आधार पर सही साबित करते आए हैं कि यह ज्यादा बड़े उद्देश्य के लिए बोला जाता है। ‘वृहत्तर सत्य’ की रणनीति के रूप में फरेब आंशिक रूप से जीवन में काम भी करता रहा है। माताएं अपने बच्चों को समझाने और भरमाने के लिए कई रास्ते अपनाती हैं। समूचे समाज को भरमाने और भड़काने के जो उदाहरण अब सामने आ रहे हैं, वे भविष्य के खौफनाक परिदृश्य को प्रस्तुत कर रहे हैं। अब हमें बैठकर सोचना चाहिए कि सत्य को इस तरीके से खंडित करने की परिणति क्या है? यह केवल भारत का सवाल नहीं है।

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एक तथ्य अक्सर व्हाट्सएप संदेशों में नत्थी होकर आता है कि भारत सरकार ने उद्योगपतियों पर बैंकों के 3.5 लाख करोड़ रुपए के कर्जे माफ कर दिए हैं। राहुल गांधी ने चुनावी रैलियों में दावा किया है कि नरेंद्र मोदी ने 15 बड़े उद्योगपतियों के बैंक ऋण माफ किए हैं। यह भी कहा जाता है कि जब उद्योगपतियों के कर्ज माफ किए जा सकते हैं, तो किसानों के कर्ज माफ करने में दिक्कत क्या है? यह बात पढ़े-लिखे समझदार लोग भी कहते हैं। सच है कि सार्वजनिक बैंकों के बड़े कर्ज़दार उद्योगपति और बड़ी कंपनियां ही हैं। ‘डिफॉल्टर्स’ में उनके नाम ही हैं।

अर्ध-झूठ का इंद्रजाल
सच को घुमा-फिराकर प्रस्तुत करना भी एक मायने में झूठ है और इस लिहाज से हम अपने मीडिया पर नजर डालें तो समझ में आने लगता है कि बड़ी संख्या में पत्रकार जान-बूझकर या अनजाने में अर्ध-सत्य को फैलाते हैं और यह भी मानते हैं कि हम झूठी खबर के दायरे से बाहर हैं। मुख्यधारा के मीडिया का महत्व इसलिए है, क्योंकि वही मीडिया है, जिस पर तथ्यों की पुष्टि करने की जिम्मेदारी है। समस्या का केंद्र सोशल मीडिया है।

सोशल मीडिया से जुड़े मसलों में झूठी खबर के अलावा भड़काऊ भाषण की समस्या भी जुड़ी है। भड़काऊ भाषण यानी किसी सम्प्रदाय, जाति, वर्ग, भाषा वगैरह के प्रति दुर्भावना। खासतौर से राजनीतिक रुझान से उपजी दुर्भावना। ये सवाल केवल भारत में ही नहीं उठे हैं। सभी देशों में ये अलग-अलग संदर्भों में उठे हैं या उठाए जा रहे हैं।

क्या सोशल मीडिया हमारे समाज का दर्पण है? सोशल मीडिया के दूसरे प्लेटफॉर्मों से जुड़े प्रसंगों को भी शामिल कर लेंगे, तो शायद बात करना मुश्किल हो जाएगा। इसमें काफी बातें वे हैं, जो समाज में प्रचलित रही हैं, पर सामने इसलिए नहीं आईं, क्योंकि उसका कोई मीडिया नहीं था। जिस दौर में इन प्लेटफॉर्मों  का उदय हुआ है, उसके शुरुआती वर्षों में अनुमान नहीं था कि इनका विस्तार इतने बड़े स्तर पर हो जाएगा। ज्यादातर शुरुआत सामान्य संपर्कों को स्थापित करने के लिए थी। स्कूल या कॉलेज के छात्रों का शुरुआती संवाद आज दुनिया के सिर पर चढ़कर बोल रहा है।

झूठी खबर जांचने का फौरी समाधान है तथ्यों की जांच। यह बुनियादी तौर पर निष्पक्ष भाव से किया जाने वाला काम है। इसके लिए जरूरी तकनीक की एक कीमत है, जबकि फैक्ट-चेकिंग मीडिया का अभी तक कोई व्यावसायिक मॉडल नहीं बना है। राजनीतिक क्षेत्र में इसकी जरूरत कुछ देर से महसूस की गई है। अंतत: मजबूत लोकतंत्र ही हमारा सहारा है। झूठी सूचनाएं लोकतंत्र के बुनियादी आधार को ध्वस्त कर देंगी। एक सर्वे से यह बात सामने आई है कि देश में हर दूसरे व्यक्ति का फेक न्यूज से सामना हो रहा है।  
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और दैनिक हिन्दुस्तान के पूर्व स्थानीय संपादक हैं)