चश्मा चढ़ाए लुटियन मीडिया

    दिनांक 26-मई-2021
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ज्ञानेन्द्र बरतरिया

लुटियन्स संस्कारों से पगा ‘मेनस्ट्रीम मीडिया’ खबर उसी को मानता है, जिससे उसके स्वार्थ सधते हों। जिस खबर से कोई हित न सधता हो उसे वह खबर ही नहीं मानता
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हाल ही में एक न्यूज चैनल पर एक एंकर के मुख से ये शब्द निकल गए थे, ‘‘अब हमें मोबाइल से चुनौती मिल रही है।’’ यह उस एंकर की ईमानदारी थी। वरना किसी अखबार ने कबूल नहीं किया कि हमें टीवी से चुनौती मिल रही है। किसी न्यूज चैनल ने कभी नहीं कहा कि सास-बहू या क्रिकेट दिखाने वाले चैनल उन्हें निगल रहे हैं। सब खुद को, किसी न किसी तरह ‘नंबर वन’ बता कर खुश होते रहे हैं।

पूर्वी जर्मनी ने कभी शिकायत नहीं की कि उसे पश्चिमी जर्मनी निगल रहा है। पश्चिमी जर्मनी ने कभी शिकायत नहीं की कि उसे ‘नॉटो’ निगल रहा है। सब समय का ऐसा प्रवाह साबित हुआ, जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो।
भारत में कथित मुख्यधारा का मीडिया (एमएसएम) कब का सोवियत संघ और भूतपूर्व सोवियत संघ बन चुका है। लेकिन उसे इसमें कोई दिक्कत महसूस नहीं होती है। और यही अच्छी बात है। वास्तव में इसमें किसी को कोई दिक्कत महसूस नहीं होती है। कैसे, आगे पढ़ते चलिए।

बात समझने की है। अगर मीडिया विशुद्ध जनसंचार का माध्यम होगा, तो उसके ‘बिजनेस’ का क्या होगा? ‘बिजनेस’ के लिए शक्ति चाहिए। शक्ति के लिए सत्ता चाहिए।
इसलिए मीडिया सत्ता संचार का माध्यम बन गया। उसने अपना नाम रखा- एमएसएम। अगर वह अपना नाम ‘मुख्यधारा का मीडिया’ रखता, तो वह सत्ता की मुख्यधारा में शामिल न हो पाता।

‘मेनस्ट्रीम मीडिया’। यह ‘पॉवरनेमिंग’ है। एक बार ‘पॉवरनेमिंग’ होने के साथ ही आपको ‘लुटियन्स संस्कार’ भी करवाना होता है। आप वामपंथी हो जाते हैं या वैसे दिखने लगते हैं। व्यापक मशीनरी- एनजीओ गिरोहों, वकीलों के गुटों, सरकारी साहबों, बॉलीवुड, जो खुद हॉलीवुड जैसी ‘पॉवरनेमिंग’ के बाद की संस्कारण पीड़ा से गुजर रहा है- कुछ शिक्षण संस्थानों, कुछ दूतावासों आदि के साथ तालमेल बैठा लेते हैं।

‘लुटियन्स संस्कार’ मीडिया को मीडिया हाउस, और पत्रकार को ‘एडीटर साब’ बना देता है। सामूहिक रूप से ये खुद को सेकुलर, लिबरल, फेमिनिस्ट, लोकतांत्रिक, किसी (नापसंद) घटना पर क्रोध और आक्रोश की एक अत्यंत तीव्र प्रतिक्रिया देने वाले, ‘इन्टॉलरेंस’ के खोजी विशेषज्ञ आदि बताते हैं। जरूरत पड़ने पर लेखक, पत्रकार, आशु पीआईएलकर्ता और कलाकार वगैरह भी हो जाते हैं। क्या आप इन्हें कोई एक नाम दे सकते हैं?

सत्तासेवा-सत्तामेवा ही इस रिश्ते की डोर थी, लेकिन 2014 के बाद से इन्हें एक और जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है- हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के विरोध की जिम्मेदारी। कोई मामला न मिले, तो झूठ बोलो, उसे खबर बताओ। पूरी मशीनरी लगाओ। (मशीनरी का विवरण ऊपर है) एक-दूसरे के झूठ पर कभी सवाल मत उठाओ।

हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद का झूठा-सच्चा कैसा भी विरोध इन वामपंथियों का और इस ‘लुटियन्स मीडिया’ का साझा जुनून है। गौर से देखिए। दोनों के लिए यह जुनून ही नहीं आस्था जैसा मामला है कि मार्क्सवाद का, और दूसरे छोर से उदार लोकतंत्र का आगे से आगे बढ़ते जाना, और एक दिन अपनी मंजिल प्राप्त कर लेना तो अपरिहार्य है।

मार्क्सवादियों को यकीन है कि एक न एक दिन भारत में साम्यवादी-समाजवादी टाइप की कोई हुकूमत तामीर हो जाएगी और ‘लुटियन्स मीडिया’ के ‘लिबरल’ और अन्य ‘लिस्टों’ को यकीन है कि एक न एक दिन भारत में ऐसी हुकूमत कायम हो जाएगी, जिसमें किसी तरह का कोई पीड़ित नहीं होगा। दोनों की परिकल्पनाओं का अंत परिणाम एक जैसा है कि उस दिन अंतिम हिन्दू को भी समाप्त किया जा चुका होगा। इसी अंत परिणाम के हसीन सपनों के कारण इस्लामिस्ट भी इनके ‘जिन-पड़ोसी’ हो लेते हैं। उन्हें भी अपने सपनों पर पूरा यकीन है।

अब आइए ‘लुटियन्स मीडिया’ के लिबरलिस्टों पर। इनकी मूल और पहली खुराक है हिन्दुत्व से वास्तविक या काल्पनिक ‘पीड़ित’ लोगों का शिकार करना। चूंकि इनके शिकार अधिकांशत: काल्पनिक और झूठे होते रहे हैं, गुजरात की ‘मॉब लिंचिंग’ की घटनाओं की तरह, इसलिए इनके बारे में यह तय करना संभव नहीं है कि यह कब कहां और कैसा हमला करेंगे।

बेखौफ हमलों के लिए इनकी ढाल भी तैयार है। सबसे खतरनाक बात यह है लिबरलिस्टों ने प्रचार से लेकर प्रशासन तक, विज्ञापनों के बाजार पर, कानूनी हथकंडों के प्रयोग से लेकर लोकतंत्र का दुरुपयोग करने तक इतनी चालाकी से चमड़ी की इतनी सारी परतें एक के ऊपर एक जमा ली हैं, कि अब न मतदाता इनको खदेड़ सकते हैं, न अखबारों के पाठक, न टीवी के दर्शक। विज्ञापन और फंड और अन्य हितों की पूर्ति उन्हें इस आतंक के बूते प्राप्त होती है कि वे किसी भी शिष्ट, प्रभावशाली, विद्वान और धनाढ्य व्यक्ति की प्रतिष्ठा और आजीविका पल भर में छीन सकते हैं, जैसी कि कोशिश सर्वोच्च न्यायालय में देखी गई। इससे ज्यादा क्या हो सकता है?

तकनीकी या सैद्धांतिक तौर पर, इस स्थिति का समापन तब होगा, जब ‘लुटियन्स मीडिया’ के लिबरलिस्टों को सिर्फ उनके विचार के बूते समाज में, प्रशासन में महत्व या स्थान नहीं मिलेगा। इस स्थिति का समापन तब होगा, जब ‘लुटियन्स मीडिया’ के लिबरलिस्टों की पहचान आधारित राजनीति पर (कि वह पीड़ित है, क्योंकि वह फलां जाति का या इस मजहब का है), उनके तराशे और गढ़े गए फर्जी आंकड़ों पर विश्वास करने के लिए कोई राजी नहीं होगा।
हो सकता है कि उसमें थोड़ा समय लगे। लेकिन समय कहां लगना है? उन्हें तो सोशल मीडिया ही खत्म किए दे रहा है-  छोटा सा फोन!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)