नीम चढ़ा करेला

    दिनांक 27-मई-2021
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भारत और हिन्दू विरोधी व झूठी खबरें परोस रहे मीडिया के साथ अब सोशल मीडिया कंपनियां भी सक्रिय हुर्इं
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जिस तरह अमेरिका में चुनावों को प्रभावित करने के लिए मीडिया और महामारी को अस्त्र बनाया गया, वही प्रयोग भारत में दोहराने का प्रयास हो रहा है। कांग्रेस का टूलकिट इसी बात की गवाही दे रहा है। लोगों ने टूलकिट को लेकर कांग्रेस से प्रश्न पूछने शुरू किए तो ट्विटर उसके बचाव में आ गया। मात्र एक पुलिस शिकायत के आधार पर ट्विटर ने कांग्रेस के टूलकिट को ‘भ्रामक’ घोषित कर दिया। भारत में भी ट्विटर उसी भूमिका में आ रहा है जो भूमिका उसने अमेरिका में निभाई थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में ट्विटर यह काम लंबे समय से करता रहा है, लेकिन अब वह सीधे-सीधे भारतीय लोकतंत्र में दखलंदाजी के स्तर तक आ चुका है। ट्विटर का पक्षपात किसी से छिपा नहीं है। ढेरों उदाहरण है जब ट्विटर राष्ट्रवादी विचारों को दबाने का काम करता है। यह स्थिति भारत जैसे देश में स्वीकार नहीं की जा सकती। ट्विटर और फेसबुक जैसी कंपनियां नई ईस्ट इंडिया कंपनी बन चुकी हैं, जो भारत को अपना उपनिवेश बनाने के प्रयास में हैं।

 कांग्रेस की टूलकिट में मीडिया की जो भूमिका तय की गई है वह आश्चर्यजनक है। इसमें भारत और हिंदू विरोधी शब्द गढ़ने की बात की गई है, जिसे इंडिया टुडे, टाइम्स आॅफ इंडिया और दैनिक भास्कर जैसे मीडिया संस्थान पहले से कर रहे हैं। ये पिछले कुछ समय से ‘इंडियन वैरिएंट’ और कुंभ के लिए ‘सुपर-स्प्रेडर’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। टूलकिट में कहा गया कि रमजान और ईद पर कोई बात नहीं करनी है तो मीडिया के इस वर्ग विशेष ने रमजान और ईद के समाचारों के साथ कोरोना और लॉकडाउन जैसे शब्दों का प्रयोग तक नहीं किया। स्पष्ट देखा जा सकता है कि मीडिया के एक बड़े वर्ग ने उत्तर प्रदेश में कोरोना वायरस को लेकर झूठी खबरों की भरमार लगा दी है, जबकि उत्तर प्रदेश सबसे अधिक टेस्ट कर रहा है और उसके प्रयासों की विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी प्रशंसा की है।

गाजा में इजराइल की सैनिक कार्रवाई पर भारतीय मीडिया का वर्ग विशेष बौखलाया हुआ है। लगातार ऐसी दुष्प्रचार सामग्री दिखाई जा रही हैं, जिससे सामान्य भारतीयों के मन में यह बात बैठ जाए कि इजराइल बहुत गलत कर रहा है। शायद यही कारण था कि एनडीटीवी ने इजराइल में आतंकी संगठन हमास के रॉकेट हमले का शिकार हुईं भारतीय नर्स की मौत का उल्टा ही कारण बता दिया। यह अनजाने में होने वाली भूल नहीं, जानबूझकर किए जाने वाले प्रयास हैं। ऐसे ही ढेरों प्रयास चल जाते हैं और कभी-कभार कुछ पकड़े जाते हैं।

मणिपुर में दो राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की मृत्यु की अफवाह सोशल मीडिया पर फैलाई। पुलिस ने कार्रवाई की और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। टाइम्स आॅफ इंडिया और दिल्ली के अखबारों ने आरोपियों को पत्रकार बताते हुए पुलिस की कार्रवाई पर प्रश्नचिह्न लगाया। वहीं, इससे एक सप्ताह पहले ही राजस्थान के टोंक में एक पत्रकार की गिरफ़्तारी का समाचार दिल्ली की मीडिया में स्थान नहीं बना पाया था। उस पत्रकार ने कोई फेक न्यूज नहीं, बल्कि अस्पतालों में अव्यवस्था का समाचार देने की गलती की थी। अखबारों और चैनलों ने जोर-शोर से बताया कि कोविड से जुड़े एक सलाहकार समूह के विषाणु वैज्ञानिक शाहिद जमील ने त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने महामारी से निपटने में केंद्र सरकार की आलोचना की। शाहिद जमील वही वैज्ञानिक हैं जिन्होंने बीते दिसंबर में ही घोषित कर दिया था कि कोरोना संकट अब समाप्त हो चुका है। तब उन्होंने किस आधार पर यह घोषणा की थी? क्या मीडिया को उनके बारे में यह पहलू भी पाठकों को याद नहीं दिलाना चाहिए था? 

पत्रिका ह्यद वीक’ ने स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर का अपमान करने को लेकर सार्वजनिक माफी मांगी है। ‘द वीक’ ने 2016 में एक लेख छापा था, जिसका शीर्षक था ह्यअ छेंु, छ्रङ्मल्ल्र२ीह्णि। इसमें सावरकर को लेकर कई झूठ और अपमानजनक टिप्पणियां की गई थीं। लेकिन मीडिया के लिए अब यह एक परंपरा बन गई है कि पहले बिना किसी सबूत के झूठ बोलो और कोई न्यायालय में शिकायत कर दे तो 5-6 वर्ष के बाद चुपके से क्षमा याचना करके छूट जाओ। अपनी क्षमा याचना में ‘द वीक’ ने कहा है कि ‘हमारा वह लेख उच्च कद वाले वीर सावरकर की गलत व्याख्या करता है। हम वीर सावरकर को अति सम्मान की श्रेणी में रखते हैं। यदि इस लेख से किसी व्यक्ति को कोई ठेस पहुंची हो, तो पत्रिका प्रबंधन खेद व्यक्त करता है और इस तरह के प्रकाशन के लिए क्षमा चाहता है।’ हालांकि यह तय है कि ‘द वीक’ और उसके जैसे वामपंथी और कांग्रेसी मीडिया संस्थान ऐसी हरकतें आगे भी जारी रखेंगे। ल्ल