बंगाल हिंसा की गहराई से पड़ताल की जरूरत

    दिनांक 05-मई-2021   
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चुनाव-परिणाम आने के बाद से जारी हिंसा में मृतकों की संख्या 17 हो गई है। भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि इनमें नौ उनके कार्यकर्ता हैं। उधर तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि हमारे भी सात कार्यकर्ता मारे गए हैं। भाजपा ने तीन दिन में हुई हिंसक घटनाओं की सूची तैयार की है, जिसमें हत्या, हिंसा, आगजनी और लूटपाट के 273 मामले दर्ज हैं।

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पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है। उनकी फिलहाल सबसे बड़ी जवाबदेही उस हिंसा को लेकर है, जो किसी न किसी रूप में तीसरे दिन भी जारी थी। हालांकि हिंसा के तीन दिन बाद आज कुछ अखबारों में इन घटनाओं की कवरेज हुई है, पर बंगाल या देश-विदेश के मीडिया ने इन घटनाओं की गहराई से पड़ताल करने की कोशिश नहीं की है, जो चिंता का विषय है।

ज्यादातर अखबारों ने ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक बयानों और सरकारी गतिविधियों को खबर बनाया है। यह पता लगाने की कोशिश नहीं की है कि इनके पीछे क्या कारण हैं। खासतौर से बंगाल के अखबारों ने इन खबरों की या तो अनदेखी की है या शांति बनाए रखने की मुख्यमंत्री की अपील को प्रमुखता दी है। चौबीस घंटे सनसनी फैलाने वाले टीवी चैनलों के प्रतिनिधियों या कैमरामैनों ने भी घटनास्थलों तक जाकर पीड़ितों से बात करने का प्रयास नहीं किया है। जो वीडियो वायरल हुए हैं, वे घटनास्थलों पर उपस्थिति लोगों ने मोबाइल फोनों से तैयार किए हैं।

महिलाओं से दुर्व्यवहार

इस कवरेज से ही पता लगेगा कि महिलाओं के साथ क्या सलूक किया गया और घरों पर किस तरह से हमले हुए हैं। ये घटनाएं बंगाल की राजनीति के एक महत्वपूर्ण पहलू से वास्ता रखती हैं। दिल्ली के एक अखबार ने कल अपने सम्पादकीय में जरूर लिखा कि ममता बनर्जी को उस हिंसा पर रोक लगानी चाहिए, जिसमें उनके समर्थक अपने विरोधियों को निशाना बना रहे हैं। पर केवल हिंसा को लेकर न तो सम्पादकीय लिखे गए हैं और न ही गहराई से विवेचन किया गया है। बंगाल के आर्थिक पिछड़ेपन के पीछे देहाती क्षेत्रों में व्याप्त इस हिंसा की भी भूमिका है।

बंगाल की राजनीति में हिंसा की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। अक्सर पूरे गांव के गांव राजनीतिक दबाव में रहते हैं। इसकी शुरुआत वामपंथी दलों के शासन में ही हो गई थी और तृणमूल कांग्रेस ने उस हिंसा का जवाब हिंसा से देकर अपनी जगह बनाई है। पर क्या इसे लोकतांत्रिक परिघटना माना जाए ? इस हिंसा और उसे फैलाने वाली मनोवृत्ति के गम्भीर विवेचन की जरूरत है। इस हिंसा की पड़ताल मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग और बाल अधिकारों की रक्षा के लिए बने आयोग को भी करनी चाहिए। हिंसा में ज्यादातर हाशिए के गरीब लोग, स्त्रियां और बच्चे शिकार हुए हैं।
 
हिंसा के 273 मामले

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बहरहाल, चुनाव-परिणाम आने के बाद से जारी हिंसा में मृतकों की संख्या 17 हो गई है। भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि इनमें नौ उनके कार्यकर्ता हैं। उधर तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि हमारे भी सात कार्यकर्ता मारे गए हैं। भाजपा ने तीन दिन में हुई हिंसक घटनाओं की सूची तैयार की है, जिसमें हत्या, हिंसा, आगजनी और लूटपाट के 273 मामले दर्ज हैं।

हालांकि इसे बीजेपी और तृणमूल के बीच का मामला मानकर चला जा रहा है, पर कांग्रेस और सीपीएम ने भी तृणमूल पर हिंसा फैलाने का आरोप लगाया है। मंगलवार को पुलिस ने माना कि राज्य के अलग-अलग इलाक़ों में हुई झड़पों में कम से कम 12 लोगों की मौत हुई है, पर यह नहीं बताया कि मृतक किस पार्टी से जुड़े थे।

मीडिया के प्रतिनिधियों ने जो जानकारियाँ दी हैं, उनमें सीमा सुरक्षा बल के जवानों के घरों पर हुए हमलों की खबरें चिंतनीय हैं। एक चैनल के पत्रकार ने सोशल मीडिया के माध्यम से बताया है टीएमसी कार्यकर्ताओं ने दो अलग-अलग जगहों पर बीएसएफ जवानों के घरों पर हमले किए हैं। पहला मामला जलपाईगुड़ी ज़िले के रानीरहाट इलाक़े का है, जहाँ छुट्टी पर आए जवान कमल सेन के घर पर हमला बोला गया। घायल जवान सिलीगुड़ी के अस्पताल में भर्ती है। दूसरी घटना कूचबिहार की है। यहाँ सुशांत बर्मन नामक जवान के घर पर लूट मचाई गई। बर्मन के परिवार के सदस्य घर छोड़कर भागे हुए हैं। इस चुनाव के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों को लेकर भी टिप्पणियां हुई हैं, जो चिंतनीय बात है।

आरोपों से पल्ला झाड़ा

ममता बनर्जी ने सोमवार को इन आरोपों से पल्ला झाड़ लिया था, पर जब मंगलवार को आरोपों की झड़ी लगी और बात बढ़ने लगी, तब उन्होंने मुख्य सचिव आलापन बंदोपाध्याय, गृह-सचिव हरिकृष्ण द्विवेदी और डीजी पुलिस पी नीरजनयन के साथ बैठक की और उन्हें निर्देश दिया कि हिंसा को जल्द से जल्द काबू में करें। कोलकाता के पुलिस कमिश्नर सोमेन मित्रा भी इस बैठक में उपस्थित थे। ममता बनर्जी ने कहा, जरूरी गिरफ्तारियाँ भी फौरन की जाएं।
मुख्यमंत्री ने तमाम घटनाओं के वीडियो भी देखे और कहा कि इनमें से जो वीडियो पुराने हैं या इस हिंसा से नहीं जुड़े हैं, उनकी पहचान करें और उन्हें फैलाने वालों पर कार्रवाई करें। ऐसा काफी हद तक सम्भव है कि कुछ वीडियो पुराने हों या इस हिंसा से जुड़े नहीं हों। सोशल मीडिया के इस दौर में फेक वीडियो भी एक रणनीति के तहत चलाए जाते हैं। अक्सर मुख्य घटना से ध्यान हटाने के लिए कुछ लोग ऐसे वीडियो का सहारा लेते हैं, ताकि पहले कहा जाए कि ये पुराने वीडियो हैं, फिर उनकी आड़ में सभी वीडियो और चित्रों को गलत साबित कर दिया जाता है। इसलिए देखा यह भी जाना चाहिए कि उन्हें फैला कौन रहा है।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)