असम के बाद सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी बढ़ रही है उत्तराखंड में

    दिनांक 10-जून-2021
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दिनेश

उत्तराखंड में क्या किसी षड्यंत्र के तहत मुस्लिम आबादी बढ़ रही है? सुदूर पहाड़ी कस्बों में  मस्जिदें, मजारें देवभूमि उत्तराखंड में किसके इशारे पर, किसके संरक्षण में बनती जा रही हैं? सूत्र बताते हैं कि चौंकाने वाली इस खबर की जानकारी आई बी ने केंद्र को दी है, जिस पर और जानकारी जुटाई जा रही है।
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टिहरी झील के पास बनी एक मजार

उत्तराखंड राज्य बने बीस साल से ज्यादा का समय हो चुका है। इस दौरान राज्य में मुस्लिमों की आबादी तेजी से बढ़ी है। 2001 की जनगणना के अनुसार राज्य में 11.9 प्रतिशत मुस्लिम आबादी थी, जोकि 2011 में बढ़ कर 13.94 प्रतिशत हो गयी। अकेले हरिद्वार जैसे तीर्थ जिले में मुस्लिम आबादी तेज़ी से बढ़ी है। यहां मुस्लिम आबादी दर दो गुने से ज्यादा हो गयी। इसके पीछे वजह है हरिद्वार जिले से लगते उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बाहुल्य जिले मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, नजीबाबाद आदि से बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी यहां आकर बसी। 2011 में  हरिद्वार जिले की कुल आबादी 18,90,422 थी, इसमें 4,78,000 से ज्यादा मुस्लिम थे। इसके बाद 2022 में जिले की आबादी 21,92890 पार करने का अनुमान है जिसमें मुस्लिमों की आबादी 6,00,000 के पार होगी।

यूपी से लगे उधमसिंहनगर जिले में भी पिछले बीस साल में बरेली, रामपुर, पीलीभीत, बिजनौर आदि जिले से आये मुस्लिम आबादी की बसावट बड़ी संख्या में दर्ज की गई है। जिले की 35 फीसदी आबादी मुस्लिम 2022 में हो जाने का अनुमान है। इसी तरह देहरादून जिले की मुस्लिम आबादी 34 प्रतिशत के आसपास हो जाएगी।

पूरे राज्य का यदि आंकलन करें तो मैदानी चार जिलों में मुस्लिम आबादी तीस प्रतिशत के पार हो रही है, जबकि पहाड़ों के अन्य नौ जिलो में मुस्लिम आबादी की बसावट 2001 से 2011 तक कम थी लेकिन 2022 तक इसमें भी अप्रत्याशित वृद्धि होने की बात कही जा रही है।

जिस पर  आई बी ने केंद्र को चेताया है कि सुदूर सीमावर्ती जिलो में ही मुस्लिम आबादी की बसावट हो रही है। वेल्डर, मैकेनिक, राजमिस्त्री, मजदूर, कार पेंटर, सब्जी विक्रेता के छोटे कारोबार करने वाले तिब्बत चीन नेपाल सीमा तक जा बसे हैं। सस्ती जमीन मिल जाने के लालच में मुस्लिम आबादी के बसने की एक बड़ी वजह है। हाल ही में एक और रिपोर्ट भी सामने आई है कि पहाड़ों में वन भूमि पर मजारें बनाई जा रही हैं। टिहरी झील के आसपास ऐसी मजारें देखने मे आयी हैं। कुछ ऐसे शहर, कस्बे भी चिन्हित किये गए हैं, जहां मुस्लिम आबादी तेज़ी से बढ़ रही है।

यहां मजारें बनाई जा रही हैं, उनकी आड़ में लोग बस रहे हैं। रामनगर, कालाढूंगी, टनकपुर बनबसा, चंपावत, भवाली,बागेश्वर,धारचूला, कोटद्वार,पौड़ी,श्रीनगर सतपुली, पिथौरागढ़ वे पहाड़ी इलाके हैं, जहां सुनियोजित ढंग से मुस्लिम आबादी की बसावट हो रही है। यहां मजारें, मस्जिदें कैसे बन गईं, जबकि उत्तराखंड ही नही पूरे देश में किसी नए पूजा स्थल के निर्माण पर रोक लगी हुई है। उत्तराखंड के किच्छा, लक्सर, ज्वालापुर, खटीमा, सितारगंज, रुद्रपुर, जसपुर, सुल्तानपुर पट्टी, गदरपुर, हल्द्वानी आदि कस्बे ऐसे हैं जोकि भविष्य में करीब 33 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले हो जाएंगे।

2011 में देश की जनगणना रिपोर्ट में 2001 से 2011 के बीच 0.8 फीसदी मुस्लिम आबादी वृद्धि दर सामने आई। सबसे ज्यादा असम में 3.3 फीसदी की मुस्लिम आबादी वृद्धि दर दर्ज हुई और उसके बाद उत्तराखंड में, जहां 2 फीसदी मुस्लिम आबादी वृद्धि दर सामने आई। इसके बाद केरल में 1.9 प्रतिशत,बंगाल में 1.8 फीसदी वृद्धि दर मुस्लिमों की सामने आई।

उत्तराखंड के पहाड़ों से स्थानीय लोगों का पलायन पिछले बीस साल में तेज़ी से हुआ है। रोजगार की तलाश में पहाड़ के लोग मैदानी इलाकों की ओर रुख कर चुके हैं। पहाड़ों पर खाली हुए खेत खलियानों में मुस्लिम आबादी की नज़र है,ऐसा खुफिया रिपोर्ट में बताया गया है!ऐसी भी जानकारी में आया है कि मजदूरों के रूप में रुहेला, बांग्लादेशी मुस्लिम लोग यहां आकर बस चुके हैं। वोटों की राजनीति के चलते मतदाता सूची में इनके नाम चढ़ रहे हैं और आधार कार्ड भी बन रहे हैं।

उत्तराखंड में लव जिहाद,धार्मिक स्थलों के बारे में सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट डालने को लेकर भी घटनाओं में तेज़ी से इजाफा हुआ है। पिछले दिनों पौड़ी गढ़वाल के सतपुली इलाके में कोटद्वार में तनाव हुआ। अभी हाल ही में हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज परिसर में एक मज़ार को लेकर विवाद सामने आया। टिहरी झील के पास बनीं मजारो में देवताओं के नाम तक लिख कर स्थानीय लोगों को भ्रमित किया गया।
कांग्रेस के शासन काल में जब हरीश रावत की सरकार थी तब एक अभियान के तहत मैदानी जिलो में मुस्लिम वोट बैंक बढ़ाने का अभियान भी गुपचुप तरीके से चलाया गया,जिसकी चुनाव के समय जबर्दस्त प्रतिक्रिया भी हुई और हरीश रावत किच्छा और हरिद्वार की दोनों विधानसभा सीटों पर चुनाव हार गए। ऐसा ही देहरादून और रुड़की सीटों पर भी हुआ।

बहरहाल, आई बी की रिपोर्ट गौर करने वाली है। केंद्र और राज्य सरकार को इस पर ठोस योजना बनानी होगी और भूमि संबधी कानूनों पर पुनर्विचार करना होगा।