दक्षिण-पूर्व एशिया में हिन्दुत्व का ऐतिहासिक प्रवाह

    दिनांक 12-जून-2021
Total Views |
प्रो. भगवती प्रकाश

म्यांमार, थाईलैंड, मलेशिया, कम्बोडिया, वियतनाम, फिलीपीन्स व बोर्निओ के सभी प्राचीन शिलालेखों में संस्कृत भाषा एवं देवनागरी, ब्राह्मी व पल्लव आदि लिपियों के साथ, कई शिलालेखों में छंद व व्याकरण प्रयोग भारत से भी शुद्ध है।
p46_1  H x W: 0

वृहत्तर भारत अर्थात हमारी पौराणिक सीमाओं में स्थित दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों का जनजीवन व संस्कृति 15वीं सदी तक भारत जैसी रही है। हमसे डेढ़ गुना अधिक क्षेत्र में फैले इन देशों की प्राचीन सभ्यता, संस्कृति, साहित्य, अभिलेख, आस्थाएं, शासन व्यवस्था, स्थापत्य कालगणना या कैलेंडर एवं लोक जीवन हिन्दू मान्यताओं पर आधारित रहे हैं। प्राचीन मंदिरों, अभिलेखों में संस्कृत भाषा एवं देवनागरी, ब्राह्मी व पल्लव आदि भारतीय लिपियों के प्रयोग और उनमें वैदिक, पौराणिक साहित्य सहित रामायण महाभारत के संदर्भों की प्रचुरता है।

स्थापत्य और कलाएं

विगत दो सहस्राब्दियों के स्थापत्य व कलाओं में भारतीय संस्कृति से भेद कर पाना कठिन है। ‘द हिन्दू’ के 17 अप्रैल, 2014 व 21 मई, 2016 के संस्करण में लवीना मेलवानी ने लिखा है कि कलाओं के अवशेष वहां की प्राचीन संस्कृति को जीवंत करदेती हैं।

मूर्तिकला : प्राचीन दक्षिण-पूर्वी एशियाई लुप्त साम्राज्यों की हिन्दू व बौद्ध मूर्तिकला पर ‘न्यूयार्क मेट्रोपोलिटन म्यूजियम आॅफ आर्ट’ में अप्रैल 14 से 27 जुलाई, 2014 तक 15 सप्ताह की प्रदर्शनी आयोजित की गई। म्यूजियम के निदेशक थॉमस कैम्पवेल के अनुसार, वहां का प्रारंभिक विकास हिन्दू व परवर्ती काल में बौद्ध संस्कृति जन्य है। प्रदर्शनी में दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों व यूरो-अमेरिकी संग्रहालयों से प्राचीन प्यू, फुनान, झेन्ला, चम्पा, द्वारावती, केदाह, श्रीविजय, शैलेन्द्र, मजपहित आदि साम्राज्यों की प्रमुख मूर्तियों व कलाकृतियों को लाकर 15-20 सप्ताह के लिए प्रदर्शित किया था। क्रॉफर्ड के अनुसार, हिन्दू परंपरा का कोई देवता ऐसा नहीं है, जिसकी पाषाण या धातु की प्रतिमा अन्यत्र हो और वह यहां न हो। उत्खननों में आज भी अनगिनत मूर्तियां व मंदिर मिल रहे हैं। विशाल शिव, विष्णु लक्ष्मी, दुर्गा, गणेश, राम, कृष्ण सहित अनेक हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों में से कई के वेश आयुधों व मुकुट आदि पर दक्षिण-पूर्व एशियाई प्रभाव भी हैं। गोवर्द्धन पर्वत धारण करते कृष्ण की ऐसी मूर्तियां विश्व में दुर्लभ हैं।

मंदिर: अंकोरवाट बोरोबुदुर व प्रबनन अर्थात परब्रह्मन जैसे विशाल हिन्दू व बौद्ध मंदिर भारत में भी नहीं हैं। परब्रह्मन का नाम ही ‘सेवु’ अर्थात निर्माण क्रम में एक हजारवां है। जावी भाषा में सेवु का अर्थ एक हजारवां होता है। इस मंदिर परिसर में आठ प्रमुख व 156 अन्य मंदिर हैं। नौंवीं शताब्दी के मुख्य शिव मंदिर के साथ वहां ब्रह्मा, विष्णु, दुर्गा आदि के मंदिर हैं। इसमें शिव प्रतिमा ईसा पूर्व काल की है। बाली व जावा के हजारों मंदिरों के अतिरिक्त म्यांमार के पगान नगर में लाल ईंट के 2,000 मंदिरों, थाईलैंड के अयुथ्या अर्थात अयोध्या नगरी के 400 भव्य मंदिरों, वियतनाम के ‘माई सोन’, ‘होगे हुओंग’ और ‘पो नगर’ के मंदिर संकुलों पर कई हजार पृष्ठों की सामग्री लिखी जा सकती है। ‘माई सोन’ का प्राचीन शिवलिंग और ‘वो कान्ह’ का चौथी सदी का संस्कृत शिलालेख दो सहस्राब्दि प्राचीन हिन्दू इतिहास के साक्षी हैं।

पुरातत्वविद् अमरनाथ खन्ना के अनुसार, भारतीय शिल्प का अध्ययन दक्षिण-पूर्व एशियाई शिल्प व कलाओं के बिना आधा ही कहा जाएगा। इंडोनेशिया व मलेशिया की आज क्रमश: 87 व 66 प्रतिशत जनसंख्या का इस्लामीकरण व फिलीपीन्स की 94 प्रतिशत जनसंख्या के ईसाईकरण के बाद भी इंडोनेशिया में हजारों हिन्दू मंदिरों, मलेशिया में गणेश, नवग्रह, शिव आदि हिन्दू देवताओं के मंदिरों और फिलीपीन्स व भारत में भी दुर्लभ तपोरत माता पार्वती की प्रतिमा से लेकर कई मूर्तियों, संस्कृत मिश्रित शिलालेखों, थाईलैंड के नौवीं सदी के बरतनों तक पर ब्राह्मी लिपि आदि की मौजूदगी पर अन्वेषण आवश्यक है।

साहित्य और संस्कृति
अभिलेख, भाषा व लिपियां : म्यामार, थाईलैंड, मलेशिया, कम्बोडिया, वियतनाम, फिलीपीन्स व बोर्निओ के सभी प्राचीन शिलालेखों में संस्कृत भाषा एवं देवनागरी, ब्राह्मी व पल्लव आदि लिपियों के साथ, कई शिलालेखों में छंद व व्याकरण प्रयोग भारत से भी शुद्ध है। मलय के मुस्लिम बहुल क्षेत्र बोर्निओ का चौथी सदी का ‘कुताई शिलालेख’, मलय प्रायद्वीप का 775 ई. का ‘लिगोर का शिलालेख’, मलाया में ‘केदाह का 1086 का शिलालेख’, राजा पूर्णवर्मा का टुगु का शिलालेख विशेष उल्लेखनीय हैं। अंकोर में 1250 संस्कृत अभिलेख मिले हैं। भारतीय राजाओं की भांति तुलादान व अन्य दानपत्रों के संस्कृत व पाली के अभिलेख भी मिले हैं। बर्मी, थाई, जावी, लाओ व कम्बोडियाई भाषा में भारतीय अक्षरों व शब्दावलियों से कई समानताएं हैं।

संस्कृत साहित्य : संस्कृत व व्याकरण अध्ययन के साथ दक्षिण-पूर्वी एशिया में 400-1500 ई. के मध्य विशाल संस्कृत साहित्य का भाषान्तर व रचना हुई है। ईस्वी के प्रथम सहस्राब्दी में रचे गए काव्यों में अर्जुन-सुभद्र्रा विवाह, भारत युद्ध, स्मर दहन (भगवान शंकर द्वारा कामदेव दहन) व सुमन सान्तक जैसी अनेक उत्कृष्ट रचनाएं हैं। सुमन-सान्तक दशरथ की माता इन्दुमति पर आधारित है। श्रीराम के दादा राजा अज उनके पिता रधु व दादा दिलीप पर साहित्य भारत के लोकजीवन से लुप्तप्राय है।

रामायण के संस्करण : रामायण के स्थानीय संस्करणों में कम्बोडिया में ‘रीमेकर’ इंडोनेशियाई ‘रामायण जावा’, लाओस में ‘फ्रालका-फ्रा राम’, मलेशियाई ‘हिकारत सेरी राम’, म्यांमार (बर्मा या ब्रह्मदेश) में ‘यम जाजद्वा’ व ‘यामायण’, फिलीपीन्स में ‘दारांगेण’ व ‘सिंग्किल’ और थाईलैंड (अर्थात् स्यामदेश) में ‘रामाकीन’ उनके जनजीवन में रचे बसे हैं। इस्लामीकरण व ईसाईकरण के बाद भी रामलीला, कृष्णलीला व महाभारत के प्रसंगों का मंचन लोकजीवन व संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। फिलीपीन्स में 94 प्रतिशत जनसंख्या के ईसाईकरण के बाद भी 72,000 पदों की फिलीपीनी रामायण ‘दारांगेन’ पर ‘सिंग्किल नृत्य नाटिका’ अत्यंत लोकप्रिय है।

बौद्ध संस्कृति का जीवंत क्षेत्र: चौथी सदी से बौद्ध थेरवाद के प्रसार के फलस्वरूप थाईलैंड, बर्मा, लाओस व कम्बोडिया में आज बौद्ध संस्कृति जीवंत है। तटीय प्रदेशों में महायान बौद्धमत के प्रसार के फलस्वरूप इंडोनेशिया व मलेशिया में इस्लामीकरण से बचे लोगों में महायान बौद्धमत की प्रधानता है। तिमोर की संपूर्ण जनसंख्या ईसाई है।

निष्कर्ष: दक्षिण-पूर्व एशिया के पुरावशेषों, स्मारकों अभिलेखों, स्थापत्य, प्राचीन साहित्य व अनुवांशिकीय अध्ययनों से वहां के अतीत का सही चित्रण आज की महती आवश्यकता है।
       (लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)