ताईशान परमाणु ऊर्जा संयंत्र: नाभिकीय आपदा का खतरा

    दिनांक 15-जून-2021
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ताईशान परमाणु ऊर्जा संयंत 

एस. वर्मा

चीन के एक प्रमुख नाभिकीय वैज्ञानिक हे जुओक्सिउ ने 2015 में चेतावनी दी थी कि चीन जिस तेजी से परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के विस्तार की योजना बना रहा है, वह पूर्णत: विवेकहीन है, क्योंकि जितना निवेश इन संयत्रों पर किया जा रहा है, उसकी तुलना में चीन सुरक्षा नियंत्रण में पर्याप्त निवेश नहीं कर रहा है। 2020 में फुकिंग में हुई घटना के बाद अब एक बार फिर कुछ इसी तरह के संकेत मिले हैं अगर समय रहते स्थिति को नियंत्रण में नहीं लाया गया तो विनाशकारी परिणाम सामने आ सकते हैं। सीएनएन के अनुसार नाभिकीय संयंत्र से संबंधित व्यापार से जुडी फ्रांसीसी कम्पनी फ्रामाटोम ने बिडेन प्रशासन के डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी से गुहार लगाई है कि चीनी सुरक्षा प्राधिकरण ने ग्वांगडोंग प्रांत में ताईशान परमाणु ऊर्जा संयंत्र के बाहर विकिरण की स्वीकार्य सीमा को बढ़ाया है ताकि विकिरण बढ़ने के बाद भी इसे बंद करने से बचाया जा सके। कंपनी के अनुसार ऐसा करने से विकिरण फैलने का खतरा बढ़ गया है, जिसके कारण आसपास की आबादी का जीवन संकट में आ सकता है।

ताईशान नाभिकीय संयंत्र चीन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन केंद्र है, जिसे फ्रांसीसी सरकार के स्वामित्व वाली कम्पनी, इलेक्ट्रिसिटी डि फ्रांस के साथ परमाणु बिजली उत्पादन समझौते के तहत बनाया गया है। इलेक्ट्रिसिटी डि फ्रांस इस संयंत्र में 30 प्रतिशत का स्वामित्व रखती है जबकि शेष हिस्सेदारी चीन जनरल न्यूक्लियर पावर कॉर्प के पास है। उल्लेखनीय है कि फ्रामाटोम, इलेक्ट्रिसिटी डि फ्रांस की ही अनुषंगी कम्पनी है। दो यूनिट वाले इस संयंत्र का निर्माण 2009 में शुरू हुआ और दोनों इकाइयों, जिनकी कुल स्थापित क्षमता 3.3 अरब गीगा वॉट है, ने क्रमशः 2018 और 2019 में बिजली उत्पादन शुरू कर दिया था।

चीन सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता राष्ट्र

तेजी से बढ़ती औद्योगिक गतिविधियों के चलते चीन दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता राष्ट्र बन चुका है। जिस तेजी से यह बढ़ रहा है, अगर यह गति विद्यमान रहती है, तो अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि 2040 तक इसकी ऊर्जा संबंधी आवश्यकताएं बढ़कर दोगुनी हो जायेंगी। वर्तमान में, चीन की कुल ऊर्जा खपत के लगभग 60 प्रतिशत हिस्से की प्रतिपूर्ति कोयले के द्वारा की जाती है। लेकिन चीन अब लगातार नाशवान पारम्परिक ऊर्जा स्त्रोतों के विकल्प के रूप में नाभिकीय ऊर्जा पर भारी खर्च कर रहा है, और 2017 के बाद से इसमें अत्यधिक तीव्रता देखी गई है। इसका परिणाम यह हुआ है कि चीन में उत्पादित विद्युत का लगभग 5 प्रतिशत भाग नाभिकीय ऊर्जा से आता है। चाइना न्यूक्लियर एनर्जी एसोसिएशन के अनुसार, मार्च 2021 तक चीन में 49 परमाणु रिएक्टरों के साथ 16 चालू परमाणु संयंत्र थे, जिनकी कुल उत्पादन क्षमता 51,000 मेगावाट थी। कुल नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन क्षमता के मामले में अब चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका और फ्रांस के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा राष्ट्र बन गया है।

रिसाव से हांगकांग के लिए खतरा

चीन सरकार हालांकि इस तरह की किसी भी घटना से इनकार कर रही है पर फ्रामाटोम जिस आधार पर चिंता व्यक्त कर रही है, उसे नकारा नहीं जा सकता। अमेरिकी प्रशासन ने इस घटना पर कोई प्रतिक्रया नहीं दी है, परन्तु सीएनएन के अनुसार नेशनल सिक्यूरिटी काउंसिल के उच्चाधिकारियों की इस समस्या पर लगातार बैठकें जारी हैं। वैसे भी चीन सरकार का पारदर्शिता के मामले में रिकॉर्ड अत्याधिक खराब रहा है। पिछले वर्ष नवम्बर में चीन के फुकिंग परमाणु ऊर्जा संयंत्र, जो चीन के पहले घरेलू रूप से विकसित परमाणु रिएक्टर डिजाइन, हुआलोंग वन पर आधारित है, को संचालित किया गया और राष्ट्रीय ग्रिड से जोड़ा गया। परन्तु इसके बाद विकिरण रिसाव के चलते यह स्वत: बंद हो गया था। हालांकि चीनी सरकार ने इस घटना से साफ इनकार कर दिया, परन्तु नाभिकीय संयंत्रों की कार्यविधि के विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि संयंत्र के संचालन के दौरान असामान्य स्थिति उत्पन्न होती है, तो ऐसी स्थिति में ही परमाणु रिएक्टर में चल रही विखंडन प्रक्रिया में स्वचालित शटडाउन लागू किया जाता है। फुकिंग परमाणु ऊर्जा संयंत्र, फुजियान प्रांत के एक छोटे से शहर फुकिंग में स्थित है जो ताइवान की राजधानी ताइपे के उत्तर-पश्चिम में लगभग 232 किलोमीटर दूर है। इसलिए इस घटना ने ताईवान की चिंता को बढ़ा दिया था। आज ताईशान से इतना ही खतरा हांगकांग के सामने भी उपस्थित हो सकता है, जो इस सयंत्र से मात्र 135 किलोमीटर दूर है। ताईशान,स्वयं भी ग्वांगडोंग प्रान्त का एक महत्वपूर्ण शहर है जिसकी आबादी लगभग 950,000 है।

चीनी जनता नाभिकीय ऊर्जा के प्रति अनिच्छुक, सरकार बेपरवाह

चीन के नेशनल एनर्जी एडमिनिस्ट्रेशन के अनुसार बीजिंग 2060 तक कार्बन का उपयोग समाप्त करने का प्रयास कर रहा है। ऐसी स्थिति में नाभिकीय ऊर्जा का इस्तेमाल और भी तेजी से बढ़ने की संभावना है। परन्तु आज नाभिकीय ऊर्जा तुलनात्मक रूप से उतना आकर्षक और स्वच्छ ऊर्जा समाधान नहीं बचा जैसा वह पहले हुआ करता था । जापान में 2011 में हुई फुकुशिमा आपदा के बाद के वर्षों में चीन की जनता में इस के प्रति अरुचि और अविश्वास में वृद्धि हुई है, और एक सर्वे के अनुसार लगभग 60 प्रतिशत आबादी ने इसके प्रति अनिच्छा व्यक्त की है। परन्तु चीन जनमत की परवाह नहीं करता। फ्रांसीसी चैनल फ़्रांस 24 के अनुसार पिछले महीने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उनके चीनी समकक्ष शी जिनपिंग ने चीन में रूस निर्मित परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना पर चर्चा को आगे बढ़ाया है। चीन की सरकार के लिए आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्व की स्थापना से बढ़कर कोई श्रेयस्कर उद्देश्य नहीं है! नाभिकीय ऊर्जा की खोज ने विश्वयुद्धोत्तर काल में तीव्र विकास के लिए उत्सुक विश्व को इसके लिए अत्यावश्यक ऊर्जा संसाधनों के क्षेत्र में एक नवीन विकल्प प्रदान किया, और विश्व की दोनों महाशक्तियां इसकी अगुआ बनीं। परन्तु 1986 में चेर्नोबिल जैसी दुर्घटना ने एक बार फिर यह बताया कि इसके साथ किसी भी प्रकार की लापरवाही उसी तरह त्रासदायक हो सकती है जैसे प्रोजेक्ट मैनहट्टन के तहत बनाये गए परमाणु बम से हिरोशिमा और नागासाकी के लिए हुई थी। परन्तु चीन जिसने अभी इस तरह की किसी घटना का सामना नहीं किया है, दूसरे देशों के उदाहरण से ज्यादा सीखने को तत्पर नहीं दिखता!