मुश्किल में 'माया'

    दिनांक 15-जून-2021   
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बसपा को राजस्थान में कांग्रेस ने तोड़ लिया. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने बसपा के विधायकों को तोड़ा. कल्याण सिंह के समय में भी बसपा के विधायकों ने भाजपा का समर्थन किया. अब फिर एक बार बसपा टूट रही है. विधायकों का एक धड़ा अलग होने से बसपा टूट रही है. वैसे देखा जाय तो तिल - तिल कर बसपा काफी अरसे टूट रही है.

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बसपा एक बार फिर टूट की कगार पर है. हालांकि इसकी आहट बहन जी को पहले ही लग गई थी सो, उन्होंने बसपा छोड़ कर जाने वाले विधायकों को पहले ही निष्कासित कर दिया था. दरअसल, बसपा से दलित वोट बैंक खिसक रहा है. चुनाव परिणामों की अगर बात करें तो वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा एक भी सीट नहीं जीत पाई. वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में इतने कम विधायक निर्वाचित होकर आये कि मायावती, राज्यसभा सांसद भी नहीं निर्वाचित हो पाईं.


कुछ दिन पहले बसपा से निष्कासित विधायक असलम राईनी ने कहा है कि “वे नया दल बनायेंगे. विधानसभा अध्यक्ष से भेंट हो चुकी है. एक विधायक की कमी है. एक विधायक का समर्थन मिलते ही नया दल बनेगा जिसके नेता लाल जी वर्मा होंगे.”  इसके पहले कल्याण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में भी बसपा टूटी थी. मुलायम सिंह यादव ने भी बसपा के विधायकों को अपने पक्ष में तोड़ा था. इसके अतिरिक्त, बसपा तिल-तिल कर काफी अरसे से टूट रही है. बसपा के कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने भाजपा ज्वाइन किया. बसपा सरकार में ताकतवर मंत्री रहे  इन्द्रजीत सरोज ने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया. मायावती सरकार के बेहद ताकतवर मंत्री, नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने बसपा छोड़कर कांग्रेस की शरण ली.


पहले एक – एक कर नेताओं ने साथ छोड़ा और फिर अब एक धड़ा टूटकर अलग हो रहा है. इस कारण से मायावती काफी अलग-थलग पड़ती जा रही हैं. हालांकि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा से समझौता करने से थोड़ा – बहुत लाभ तो हुआ मगर मायावती ने अपने स्वभाव के अनुरूप अखिलेश यादव को झिड़कने में ज्यादा देर नहीं लगाई.  राजस्थान में समर्थन देकर उन्होंने कांग्रेस की सरकार बनवाई. उसके बाद राजस्थान में उनके विधायकों को कांग्रेस ने तोड़ लिया. इस वजह से मायावती कांग्रेस को लेकर भी बेहद नाराज हैं. उन्होंने एक बार ट्वीट किया था कि -- “ जैसा कि विदित है कि राजस्थान में कांग्रेसी सरकार को, बसपा बाहर से समर्थन दे रही है. उसके बाद भी दूसरी बार वहां के बसपा  विधायकों को तोड़कर अपनी पार्टी में शामिल करा लिया है. जो पूर्णतया विश्वासघाती है. ऐसे में कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष की  बुलाई गई बैठक में बसपा का शामिल होना, राजस्थान में पार्टी के लोगों का मनोबल गिराने वाला होगा. इसलिए बसपा इस बैठक में शामिल नहीं होगी.”


उल्लेखनीय है कि वर्ष 1993 के पहले बसपा ने दलित वोट बैंक तैयार करना शुरू किया था. बसपा की तरफ से—“तिलक , तराजू और तलवार – इनको मारों जूते चार ” सरीखे नारे दिए गए.  मायावती ने अपनी किताब “ मेरा संघर्षमय जीवन एवं बी.एस.पी मूवमेंट का सफरनामा” के विमोचन के समय यह बात स्वयं स्वीकार की थी - “बसपा को सत्ता की ताकत पहली बार मुलायम सिंह यादव की वजह से मिली थी.” बसपा के समर्थक तो कई जगह तैयार हो चुके थे मगर वो सीट जिताने की स्थिति में नहीं पहुंच पाए थे. सपा का साथ मिलते ही बड़ी सफलता हाथ लगी और जोड़ – तोड़ करके उत्तर प्रदेश की सत्ता प्राप्त हो गई."

बहरहाल , अब जोड़ - तोड़ की राजनीति के दिन लद गए और संघर्ष के दिन शुरू हो गए हैं.