ग्राम्य जीवन में हैं उल्लास और रोजगार के सूत्र

    दिनांक 17-जून-2021
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मीना जांगिड़


लोक-संस्कृति किसी समाज का आईना होती है। उल्लास, स्वावलम्बन और संतोषीवृत्ति ग्राम व्यवस्था की पहचान होते थे। जाति व्यवस्था में मानवीय मूल्य भी थे और पीढ़ी-दर-पीढ़ी कार्य कौशल का हस्तांतरण भी था। पूंजीवाद और शहरीकरण ने ग्राम्य जीवन को बदल कर रख दिया है परंतु आज भी ग्राम्य समाज में परस्पर निर्भरता की विशिष्टता बरकरार है।
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किसी भी समय के समाज को समझने के लिए उसकी समकालीन लोक-संस्कृति उसका सबसे अच्छा आईना हो सकती है। तत्कालीन प्रचलित लोककथाएं, लोकगीत, लोकोक्तियां, मुहावरे वगैरह लोक साहित्य के विभिन्न प्रकार, समकालीन समाज को समझने के लिए बेहतर साधन सामग्री हो सकते हैं। इनसे समकालीन समाज का ढांचा, रीति-रिवाज, व्यवहार-विचार आदि को जानने-समझने में पर्याप्त मदद मिलती है। खासतौर पर जब हम लोक-संस्कृति की बात करते हैं तो प्रथमदृष्टया ही ग्राम्य संस्कृति उसका पर्याय नजर आता है। भारतीय ग्राम्य समाज, जो कि एक लम्बी अवधि तय कर चुका है, अपनी परस्पर निर्भरता वाली विशिष्टता को कहीं ना कहीं आज भी बरकरार रखे हुए है। हालांकि पूंजीवाद पर आधारित आधुनिक शहरीकरण के कारण भारतीय ग्राम का स्वरूप अब वो नहीं रहा जो पूर्व औद्योगिक काल में रहा था।

परपस्परावलंबी ग्राम व्यवस्था
भारतीय ग्राम व्यवस्था में जिस परस्परावलम्बी व्यवस्था के दर्शन होते हैं, उसे समझने के लिए लोक-संस्कृति को समझना सबसे जरूरी है। जहां एक तरफ गांव में सामन्ती-व्यवस्था, जाति व्यवस्था जैसी बुराइयां देखने को मिलती हैं, वहीं इन्हीं गांवों में इन्हीं व्यवस्थाओं के अंतर्गत एक परस्पर सहयोग की व्यवस्था के भी दर्शन होते हैं जो भारतीय ग्राम्य व्यवस्था की इन आधारों पर की गई आलोचनाओं के सामने एक नया विधान खड़ा करती है। जहां एक तरफ जाति व्यवस्था थी, वहीं दूसरी तरफ ये जाति व्यवस्था कई मायनों में परस्पर सहयोग एवं कायोें के वर्गीकरण के सिद्धान्त पर आधारित एक ऐसा समाज बना रही थी जहां सामाजिक स्तरीकरण के बावजूद एक सहयोग एवं परस्पर निर्भरता भी देखने को मिलती थी। ग्राम व्यवस्था का आधार किसान अपने साथ-साथ पूरे समाज के कल्याण की कामना करता है। इस कामना को वो गुनगुनाते हुए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को आपसी बंधुत्व के लोकगीतों के माध्यम से स्थान्तरित करता रहा है। उसे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए होता है, वो अपने संतोष भाव से ही सदैव प्रसन्न रहा है। जैसे -
सुखी गांव में सुखी किसान, आंगन में गुनवंती जोय,
द्वार बैल दो जोड़ी होय। जोत भर खेत थोड़े बबुरान,
कहना माने पूत सयान। बनिया बढ़ई लुहार चमार,
गाउं हरवहा होई बाजार। बोव निहार मिलै बिनु रोक,
व्यवहार चलत होइ कछु थोक। थोड़-बहुत हो अपने गाछ,
गाय दुधार होय दो बाछ। कछु-कछु सेह होयं गोयडंत,
होइ सेवा कछु साधु-संत। दया होय मन राम लगत,

सुख से सोवें खेती हरकंत।


भावार्थ -आंगणे में घर-गिरस्ती रे कामा में होशियार लुगाई होवे। दो जोड़ी बळदांरी दरवाजे पर हो और जितना वेबास के उतना बड़ा खेत बाने के लिये हो। छोटी सी बबुराई हो। बेटा समझदार और प्राज्ञाकारी हो। गांव में बाणिया, खाती, लुहार, चमार हो और हल बनाने वाला होवे। छोटा सा बाजार भी हो। बीज बीजने वाले भी जब चाहे तब मिलते हों। थोड़ा-बहुत बोपार भी हो। कुछ नगदी भी जमा होवे। थोड़ा-बहुत रूख भी लगायेड़ा होवे। गाय दूध देती हो और उसके अपणे दो बहड़का भी होवे। छोटा सा खेत गांवरे कने भी होवे। साधु-संतारो सेवा भी बनती रहे। मन में दया भाव भी हो और राम नाम री लगन भी हो। इतरी सुविधा होवे तो खेती खड़ सुखहूं नींद ले सकेला।
इस प्रकार सामाजिक संबंधों, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक अनुबन्धों के कारण एक वर्ग दूसरे वर्ग पर निर्भर रहता था और शोषण से अधिक महत्वपूर्ण पोषण हो जाता था।

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जाति व्यवस्था में मानवीय मूल्य
ये सच है कि सामाजिक जीवन में जाति एक समस्या की तरह रही है किन्तु इसी जाति व्यवस्था में भी कुछ तत्व ऐसे भी रहे हैं जो इसके उस पहलू को भी उजागर करते हैं जिसे हम मानवीय मूल्यों पर आधारित कह सकते हैं। जैसे उच्च जाति के लोगों द्वारा निम्न जाति के लोगों के प्रति पितृभावयुक्त स्वामित्व का भाव। कार्य विभाजन की वजह से परस्पर निर्भरता रहती थी और उसी वजह से न्यूनाधिक रूप में परस्पर सहयोग एव सम्मान की अवधारणा भी देखी जा सकती है। विभिन्न साहित्यिक विधाओं में जहां एक तरफ सामाजिक-सहजीवन की समस्याओं को उजागर किया गया है, वहीं दूसरी तरफ उसी सहजीवन के सकारात्मक पहलू के दर्शन भी होते हैं। ग्राम्य समाज, जो अलग-अलग जाति समूहों का एक परस्परावलम्बी एवं स्वनिर्भर सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक ढांचा था, के दर्शन भी उसी साहित्य में होते हैं।

संतोष और स्वालम्बन ग्राम्यजीवन की पहचान

पूंजीवाद पर आधारित नवीन सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था ने ग्राम की अवधारणा को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया। व्यक्तिगतता का सिद्धान्त ग्राम्य परिवेश में पहुंचा, स्थानीय अर्थव्यवस्था का विनाश होने से पलायनवृत्ति ने जन्म लिया और गांवों की बलिवेदी पर शहरों का निर्माण और विकास होने लगा। ये सिर्फ ढांचागत परिवर्तन नहीं था बल्कि पूरी सामाजिक व्यवस्था एवं सामाजिक मनोविज्ञान में परिवर्तन होने जा रहा था। जहां एक तरफ परस्पर निर्भरता की व्यवस्था रही थी, पितृभावयुक्त स्वामित्व था, वहीं अब परावलम्बन और लाभ आधारित संबंध स्थापित हो गए। गांव की अन्य महत्वपूर्ण विशेषता थी उल्लासपूर्णता एवं संतोषीवृत्ति। इसे भी शहरीकरण ने समाप्त कर दिया।

सबका जीवन एक-दूसरे के सहयोग से सादा-सरल था। संतोष एवं स्वालम्बन ग्राम्य जीवन की पहचान रही है। ग्राम्य परिवेश सामाजिक-आर्थिक रूप से तो सम्पन्न था ही, स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहद भरपूर था। ग्रामीण व्यवस्थाएं एक-दूसरे को रोजगार तो देती ही थीं, इसके साथ समय-समय पर विभिन्न आयोजनों, अनुष्ठानों के माध्यमों से अतिरिक्त आय के साधन भी मुहैय्या करवाती थीं। उदाहरणत: उत्तर-पश्चिमी भारत में कृषि एवं पशुपालक जाट जाति के बारे में एक कहावत प्रसिद्ध है कि ‘दूध बेचो भावै पूत बेचो’ अर्थात जाट अनेक दुधारू पशुओं को रखते हुए भी दूध नहीं बेचते थे क्योंकि उन्हें खूब मेहनत करने के लिए अपने-आपको शारिरिक रूप से ह्रष्ट-पुष्ट रखने की जरूरत होती थी। ये लोग खेती-किसानी में न दिन देखते थे, न ही रात। जाट जाति के मेहनतकश स्वभाव को इस तरह के एक अन्य लोकोक्ति के माध्यम से भी समझ सकते हैं -‘आसोजांकाता वड़ा जोगी होगा जाट’। आश्विन की कड़ी धूप में भी ये लोग खेतों में खूब काम करते रहे हैं। तभी तो आज भी इस समुदाय के लिए कहा जाता है कि ‘जाट जठे ठाठ’। गांव की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति बिना किसी बाजार एवं मुद्रा के हो जाती थी।
अपने-अपने कार्यों में दक्ष विभिन्न जातियां अपने पुरखों से सीखे कार्यों को ही आगे बढ़ाने में ही खुशी अनुभव करती थीं।
गूजरों को खेती के बजाय पशु चराना ही अधिक भाता था। उनके लिए लोक में प्रचलित कहावत है - ‘कै गूजर को दाय जो, कै बकरी कै भेड़’ अर्थात इन सबके लिए भेड़-बकरियां ही सबकुछ थीं और वे सैकड़ों की संख्या में भेड़-बकरियां पालते थे। इतनी बड़ी संख्या में पशुओं को रखने के लिए जगह की भी ज्यादा जरूरत होती थी। इसलिए ये गांव से बाहर खुले मैदान या फिर जहां चारे-पानी की व्यवस्था आसानी से हो जाए, वहीं रहते थे। बस्ती से थोड़ा अलग रहने के कारण इनके रहन-सहन को ‘गूजर जहां ऊजड़’ की इस लोकोक्ति से समझ सकते हैं। इस प्रकार बस्ती से बाहर की तरफ रहना हमेशा किसी तरह के सामाजिक-आर्थिक शोषण पर आधारित ना होकर एक व्यवस्था का हिस्सा होता था।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलता था कौशल
आज रोजगार एवं भविष्य की अनिश्चितता को लेकर सभी चिंतित रहते हैं। उन सभी कार्यों की कुशलता के लिए बड़े-बड़े संस्थानों में बड़ी-बड़ी धनराशि खर्च कर प्रशिक्षण लेते हैं जो सब ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के खेल ही खेल में सीख लेते थे। उस प्रशिक्षण को देखना चाहें तो हम प्राचीनकाल से समय-समय पर अनेक छोटे-बड़े आश्चर्यजनक निर्माण कार्यों एवम उपलब्धियों में देख सकते हैं जो आज मशीनी युग में भी असम्भव लगता है। पुरखों के अनंत निर्माण आज भी देश में असंख्य जगहों पर आश्चर्यचकित करते हैं जिनको देख आंखें और बुद्धि स्तब्ध हो सोचने को मजबूर करती हैं कि अरे! ये सब निर्माण आखिर संभव कैसे हुआ होगा?

हमारे गांव का सबसे बड़ा बड़प्पन यही था कि वह किसी भी कार्य को छोटा नहीं मानता था। सभी अपने-अपने कार्यों में दक्षता हासिल कर गांव की समूची संरचना में अपनी निर्धारित भूमिका निभाते थे। जैसे भील समुदाय में लोकोक्ति है कि ‘काम मोटो है, नाम मोटोनी’ यानी सभी तरह के काम बड़े हैं फिर चाहे उस कार्य का नाम छोटा ही क्यों न हो। गांवों की गहरी से गहरी मान्यताओं में से एक मान्यता ये भी थी कि कोई भी अपने कर्तव्यों से विमुख होकर अपने अधिकार नहीं पा सकता। लेकिन आज हमने अपने कर्तव्यों से विमुख होकर अधिकारों का ऐसा उजाड़ रच लिया है जहां पुरुषार्थ और कर्तव्य मात्र मृगतृष्णा से झुठलाते भर ही हैं।
भारतीय ग्राम्य व्यवस्था का ये चेहरा भी लोगों के सामने आना चाहिए और पूंजीवाद आधारित आधुनिक शहरी व्यवस्था, जिसने व्यक्तिगतता को आधार बनाकर भारतीय समाज का विखंडन किया है, उसका जवाब हमारी परम्परागत परस्परावलम्बी ग्राम्य व्यवस्था में ही खोजा जा सकता है। ल्