पाकिस्तान: एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट से बाहर निकलने के प्रयास एक बार फिर हुए विफल

    दिनांक 28-जून-2021   
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समस्याओं से घिरे पाकिस्तान को एक और आघात लगा है। फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफएटीएफ) की ग्रे लिस्ट से बाहर निकलने के प्रयास एक बार फिर विफल हो गए हैं
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समस्याओं से घिरे पाकिस्तान को एक और आघात लगा है। फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफएटीएफ) की ग्रे लिस्ट से बाहर निकलने के प्रयास एक बार फिर विफल हो गए हैं। एफएटीएफ के अनुसार 27 सूत्रीय कार्रवाई को पूरी तरह से लागू करने में रणनीतिक रूप से विफल रहने के कारण पाकिस्तान को अभी भी ग्रे लिस्ट में रहना पड़ेगा। एफएटीएफ के अध्यक्ष मार्कस प्लेयर ने एक आभासी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि पाकिस्तान "बढ़ी हुई निगरानी सूची" पर बना हुआ है। और इस बयान ने पाकिस्तान के तथाकथित आतंकविरोधी अभियान की पोल खोल कर रख दी। इससे पूर्व 4 जून को, पाकिस्तान पर प्रकाशित एक अनुवर्ती रिपोर्ट में, एफएटीएफ ने कहा था कि "कुल मिलाकर, पाकिस्तान ने अपने म्युच्युअल इवैल्यूएशन रिपोर्ट में चिन्हित की  गई तकनीकी अनुपालन कमियों को दूर करने में उल्लेखनीय प्रगति की है और 22 अनुशंसाओं पर फिर से मूल्यांकन किया गया है।" पाकिस्तान इसे देखकर आशान्वित हो गया और वहां ऐसा लगने लगा था जैसे अब वह ग्रे लिस्ट से बाहर आ ही जाएगा। परन्तु वर्तमान घटनाक्रम ने उसकी अपेक्षाओं पर कुठाराघात दिया है।

इस सत्र में पाकिस्तान को सुझाव दिया गया है कि उसे सभी आठ आतंकी समूहों के सरगनाओं  की जांच करने और उन पर मुकदमा चलाने की अपनी योजना को लागू करना होगा, जिन्हें अतीत में एफएटीएफ द्वारा नामित किया गया है। इसमें तालिबान, हक्कानी नेटवर्क, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, जमात-उद-दावा, फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन, अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट शामिल हैं। इस सत्र में पाकिस्तान से अपेक्षा की गई है कि वह ऐसे संदेहास्पद मनी लॉन्ड्रिंग संजाल के खिलाफ उचित प्रतिबंध की कार्रवाई करे, जो एफएटीएफ के पर्यवेक्षकों द्वारा जो निर्दिष्ट गैर-वित्तीय व्यापारों और व्यवसायों से जुड़े विशिष्ट जोखिमों के अनुरूप ऑन-साइट और ऑफ-साइट पर्यवेक्षण का संचालन कर रहे हैं, की निगरानी में है। इसके साथ ही साथ पाकिस्तान से अपेक्षा की गई है कि वह मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी जांचों तथा मुकदमों को निर्णय स्थिति तक पहुंचाए। इसमें दोषियों की संपत्ति का पता लगाने, फ्रीज करने और जब्त करने के लिए विदेशी समकक्षों के साथ सक्रीय सहयोग से काम करने की अपेक्षा भी की गई है।

परन्तु वास्तव में अब तक पाकिस्तान ने जो किया है वह एकदम नगण्य है और इस सूची से निकलने के महज दिखावे के रूप में किये गए हैं। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि पाकिस्तान द्वारा आतंकियों और आतंक के वित्तीयन के विरुद्ध की कार्यवाहियां पर्याप्त नहीं हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्षों में पाकिस्तान ने जमात उद दावा और लश्कर—ए—तैयबा के सरगना हाफ़िज़ सईद और जकी उर्रहमान लखवी जैसे दुर्दांत आतंकवादियों के विरुद्ध जो कार्रवाइयां की हैं, वह महज खानापूर्ति ही कही जा सकती हैं। इसी तरह जैश—ए—मुहम्मद के सरगना मसूद अज़हर के विरुद्ध भी कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की जा सकी है। बाकी के आतंकी संगठनों के ऊपर सीधे तौर पर ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की गई हैं, जो देखी जा सकें।

जून, 2018 में पाकिस्तान को इस सूची में शामिल किया गया था, तब से उसे एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में आए 3 साल हो चुके हैं। इससे पहले दो बार और पाकिस्तान इस सूची में शामिल रह चुका है। परन्तु पिछले 3 वर्ष में पाकिस्तान का लगातार इस ग्रे लिस्ट में होना इस बात का द्योतक है कि उसके द्वारा दिखाए जा रहे प्रयास वास्तव में कार्य नहीं कर रहे हैं और यहां आतंकवाद के वित्तपोषण का कार्य अबाध रूप से किया जा रहा है।

ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान इस सूची में रहने के दुष्प्रभावों को नहीं भोग रहा है! इस साल कि शुरुआत में पाकिस्तानी अख़बार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने बताया कि ‘बेअरिंग द कॉस्ट ऑफ़ ग्लोबल पॉलिटिक्स– द इम्पैक्ट ऑफ़ एफएटीएफ ग्रे लिस्टिंग ऑन पाकिस्तान्स इकॉनमी’  शीर्षक वाले शोध पत्र में दावा किया गया है कि 2008 से 2019 तक विस्तृत रही ग्रे-लिस्टिंग कार्यवाहियों के परिणामस्वरूप पाकिस्तान के सकल घरेलू उत्पाद को 38 बिलियन अमरीकी डालर का नुकसान हुआ है। इस सूची में होने के कारण पाकिस्तान जो पहले से ही धन संकट से जूझ रहा है, उसको विदेशों से होने वाले अंतरण में न केवल अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि उसकी लागत भी बढ़ रही है। जिसका खामियाजा पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को ही उठाना पड़ेगा। परन्तु इमरान खान की सरकार एक मतिभ्रम की स्थिति में है, जिसके कारण वह कोई भी निर्णय, जो बेशक कड़े हैं पर पाकिस्तान के हित में हैं, लेने में अक्षम साबित हो रही है!