झूठ के ठेकेदार!

    दिनांक 30-जून-2021
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ऐसा लगता है कि सेकुलर मीडिया को झूठ फैलाने की सुपारी मिली है
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सेकुलर मीडिया को अब निष्पक्षता का नाटक करने की भी आवश्यकता अनुभव नहीं होती। वह स्पष्ट रूप से एक विचारधारा और एक राजनीतिक दल के प्रति निष्ठा को प्रकट करता है। गाजियाबाद में एक मुस्लिम बुजुर्ग की पिटाई का वीडियो फैलाकर दुष्प्रचार करने वाले समाचार संस्थानों और पत्रकारों पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की तो ऐसा माहौल बना मानो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा रहा हो। देश में संपादकों की संस्था ‘एडिटर्स गिल्ड’ ने झूठ फैलाने वाले इन पत्रकारों के समर्थन में वक्तव्य जारी किया, जबकि उनसे आशा की जाती है कि वे ऐसी प्रवृत्तियों की निंदा करेंगे। मीडिया का यही गिरोह तब चुप्पी मारकर बैठ गया जब रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्णब गोस्वामी के विरुद्ध मुंबई पुलिस ने उच्च न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल किया, जबकि न्यायालय कह चुका है कि अर्णब गोस्वामी के विरुद्ध कोई साक्ष्य नहीं है।

कोरोना काल में समाचारों पर हाल में एक अध्ययन सामने आया, जिसके अनुसार भारत को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छपने वाले आधे से अधिक झूठे समाचार बीबीसी के थे। बीते सप्ताह कोरोना वायरस से जुड़े एक समाचार में बीबीसी ने भारत का जो मानचित्र दिखाया उसमें पूरा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख गायब था। यह वह गलती है, जो बीबीसी हर कुछ दिन पर करता रहता है। निश्चित रूप से यह सोची-समझी संपादकीय नीति के अंतर्गत किया जाता है। बीबीसी अपनी औपनिवेशक मानसिकता से आज तक उबर नहीं सका है। इसके लिए वह समय-समय पर भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को चुनौती देता रहता है। उसे भारत-विरोधी गतिविधियों की छूट कब तक मिलती रहेगी?

टाइम्स आफ इंडिया समेत मीडिया के एक वर्ग ने कोरोना वायरस टीकाकरण के विरुद्ध अभियान चला रखा है। आंकड़ों की बाजीगरी से बताया जा रहा है कि टीकाकरण में भारत अन्य देशों से बहुत पीछे है। मीडिया के इस वर्ग ने जैसी विभीषिका की कल्पना की थी, वैसा कुछ न होता देख अब वे व्यक्तिगत कहानियों के माध्यम से नकारात्मक माहौल बनाने में भी जुटे हैं। इस पूरे अभियान में आपको केरल और महाराष्ट्र का हाल कहीं नहीं पता चलेगा, जहां अब भी सबसे अधिक संक्रमण सामने आ रहे हैं। कहा जा रहा है कि केरल और महाराष्ट्र में तीसरी लहर भी आरंभ हो चुकी है। लेकिन वहां की सरकारों पर मुख्यधारा मीडिया की वैसी आलोचना देखने को नहीं मिलती, जैसी उत्तर प्रदेश और अन्य भाजपा शासित राज्यों को लेकर रहती है।

भीड़ द्वारा हत्याओं के नैरेटिव पर भी काम जारी है। त्रिपुरा में वनवासी समुदाय के ग्रामीणों द्वारा कुछ गोतस्करों पर हमले का समाचार दिल्ली के अखबारों ने इतनी प्रमुखता से छापा मानो उनकी सहानुभूति पीड़ित गांववालों से नहीं, बल्कि चोरों से हो। टाइम्स आॅफ इंडिया ने कुछ वर्ष पहले कथित लिंचिंग की घटना में मारे गए जुनैद नाम के लड़के के परिवार पर एक लंबा-चौड़ा फीचर छापा। यह अखबार इसी तरह अखलाक, तबरेज इत्यादि पर हर वर्ष ‘फॉलोअप’ छापता है। प्रश्न उठता है कि ऐसी रिपोर्टिंग कभी भरत यादव, ध्रुव त्यागी या डॉ. पंकज नारंग के लिए क्यों नहीं होती? इस सबके बीच यह देखकर सबसे अधिक आश्चर्य होता है कि बंगाल में हिंदुओं के साथ हो रही राजनीतिक हिंसा के समाचार दिल्ली के मीडिया से पूरी तरह गायब हैं।

इंडिया टुडे, टाइम्स आॅफ इंडिया जैसे संस्थानों ने दिल्ली दंगों के आरोपियों को जमानत देने के दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश पर ऐसे उत्सव मनाया मानो वे दोषमुक्त हो गए हों। जबकि सर्वोच्च न्यायालय इस आदेश और टिप्पणियों को अनुचित ठहरा चुका है। उत्तर प्रदेश में गंगा में कथित रूप से बहते शवों का विषय भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में पहुंचा था। न्यायालय ने भी माना कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में गंगा के किनारे रहने वाले समुदायों की धार्मिक परंपराएं ऐसी हैं, जिसमें कई लोग इसी तरह अंतिम संस्कार करते हैं। सबसे पहले पाञ्चजन्य ने मीडिया के माध्यम से फैलाए जा रहे इस झूठ का खंडन किया था और लोगों तक सचाई पहुंचाई थी।

लक्षद्वीप में इस्लामी कट्टरपंथियों के पक्ष में मीडिया का झुकाव भी स्पष्ट देखा जा सकता है। चूंकि वहां पर इस्लामी प्रभुत्व है संभवत: इसलिए मीडिया के इस वर्ग के लिए भारत के संविधान की कोई आवश्यकता नहीं। ‘फेक न्यूज’ की ‘फैक्ट्री’ बन चुकी पीटीआई ने झूठ फैलाया कि लक्षद्वीप का न्यायिक क्षेत्राधिकार केरल से बदलकर कर्नाटक उच्च न्यायालय कर दिया गया है। निश्चित रूप से एक दुष्प्रचार के अंतर्गत यह किया गया, क्योंकि यह समाचार अब भी कई अखबारों और चैनलों की वेबसाइट पर देखा जा सकता है।