घरेलू हिंसा और आर्थिक पिछड़ेपन का शिकार हैं मुस्लिम ​महिलाएं

    दिनांक 10-जुलाई-2021   
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एमडीयू यूनिवर्सिटी रोहतक के एक प्रोफेसर द्वारा किए गए सर्वे में पता चला है कि मुस्लिम महिलाएं घरेलू हिंसा और आर्थिक रूप से पिछड़ेपन का शिकार हैं। उनके पति सबसे ज्यादा रोकटोक करते हैं

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राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) के एक प्रोजेक्ट के तहत प्रोफेसर ओहल्याण ने यह अध्ययन किया है। यह सर्वे ग्रामीण क्षेत्रों में मुस्लिम महिलाओं की आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियों को जानने के लिए सर्वे किया गया। डा. ओहल्याण के अनुसार इस वजह से स्वास्थ्य सेवाएं, शैक्षिक प्राप्ति, सामाजिक गतिशीलता और रोजगार के अवसर भी मुस्लिम महिलाओं की पहुंच से दूर हैं। आर्थिक शोषण का बड़ा पहलू महिलाओं के रोजगार के अवसरों को नियंत्रित करने का है। ऐसा इसलिए भी किया जाता है ताकि महिलाएं अपने अधिकारों के लिए अधिक मुखर न हों।
सर्वे में शामिल एक महिला तो यह भी कह देती है कि उन्हें लगता है कि मजहब में भी आर्थिक हिंसा कायम है। यदि वह किसी हिदू परिवार में जन्म लेती तो स्थिति बेहतर होती, पिता की संपत्ति में भी हिस्सा मिलता। सर्वे में 18 से 50 वर्ष की 387 महिलाओं को किया गया शामिल किया गया। हरियाणा के नूंह, राजस्थान के नागौर और पंजाब के संगरूर की 387 महिलाओं को अध्ययन में शामिल किया गया। 18 से 50 वर्ष की शादीशुदा महिलाओं से विभिन्न सवाल पूछे गए। महिलाओं की औसत आयु 38 वर्ष रही। 77 फीसद महिलाएं एकल परिवार से रहीं, 23 फीसद संयुक्त परिवार की महिलाओं ने जवाब दिए। ज्यादातर के परिवार रोजगार के लिए श्रम और कृषि पर निर्भर थे।