रथयात्रा: भगवान स्वयं भक्तों से मिलने मंदिर से बाहर आते हैं

    दिनांक 12-जुलाई-2021   
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पूनम नेगी
 रथयात्रा एक ऐसा अनूठा त्योहार है,जहां भगवान स्वयं अपने भक्तों से मिलने मंदिर से बाहर निकल उनके बीच आते हैं और अपने आशीर्वाद से सबको कृतार्थ कर यह संदेश देते हैं कि ईश्वर की नजर में न छोटा है न कोई बड़ा, न कोई अमीर है और न गरीब

jagannath puri rath yatra
स्कंद पुराण में जगन्नाथ पुरी को धरती के बैकुंठ की संज्ञा दी गयी है। भगवान जगन्नाथ पूर्ण पुरुषोत्तम हैं। उनमें श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, महायान का शून्य और अद्वैत का ब्रह्म सभी कुछ समाहित है
उनके अनेक नाम हैं, वे पतित पावन हैं। इस पवित्र नगरी का श्रीजगन्नाथ मंदिर दुनिया का सबसे अद्भुत मंदिर है। रथयात्रा उत्सव इस चमत्कारी मंदिर सदियों पुराना सामुदायिक पर्व है। प्रति वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया से आयोजित होने वाले इस दस दिवसीय लोकोत्सव में सनातनधर्मियों की आस्था का जो अद्भुत वैभव देखने को मिलता है, उसका कोई सानी नहीं। ऐसा विराट समागम दुनिया में कहीं और आयोजित नहीं होता। इसीलिए यह रथयात्रा सदियों से न केवल भारत अपितु विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। भले ही कोरोना संकट के वर्तमान दौर में इस उत्सव का आयोजन सीमित हो गया हो; लेकिन इस प्रतिबंध से इस महायात्रा की महत्ता जरा भी प्रभावित नहीं होती। यह रथयात्रा एक ऐसा अनूठा त्योहार है,जहां भगवान स्वयं अपने भक्तों से मिलने मंदिर से बाहर निकल उनके बीच आते हैं और अपने आशीर्वाद से सबको कृतार्थ कर यह संदेश देते हैं कि ईश्वर की नजर में न छोटा है न कोई बड़ा, न कोई अमीर है और न गरीब। भगवान जगन्नाथ जनता के बीच आकर उनके सुख दुख में सहभागी होते हैं और सबको ‘सब मनिसा मोर परजा’ (सब मनुष्य मेरी प्रजा है), का आश्वासन देते हैं। इस अवसर पर घरों में कोई भी पूजा नहीं होती तथा न ही कोई उपवास रखा जाता है। इस रथयात्रा में किसी प्रकार का कोई जातिभेद नहीं होता। सभी एक साथ मिल बैठ कर भोजन करते हैं। जगन्नाथ स्वामी की रसोई दुनिया की सबसे निराली रसोई है जिसमें पूरा भोजन प्रसाद मिट्टी के पात्रों में चूल्हों पर बनाया जाता है। कितने ही श्रद्धालु भोजन पाने आ जाएं, इस रसोई का भोजन कभी नहीं घटता। इसीलिए तो इसके स्वामी जगन्नाथ (जग के नाथ) कहलाते हैं। श्री जगन्नाथ जी के प्रसाद को "महाप्रसाद" माना जाता है जबकि अन्य तीर्थों के प्रसाद को सामान्यतः प्रसाद ही कहा जाता है। ज्ञात हो कि श्री जगन्नाथ जी के प्रसाद को महाप्रसाद का स्वरूप महाप्रभु बल्लभाचार्य जी के द्वारा मिला था। कहते हैं कि महाप्रभु बल्लभाचार्य की निष्ठा की परीक्षा लेने के लिए उनके एकादशी व्रत के दिन पुरी पहुंचने पर मन्दिर में ही किसी ने प्रसाद दे दिया।
महाप्रभु ने प्रसाद हाथ में लेकर स्तवन करते हुए दिन के बाद रात्रि भी बिता दी। अगले दिन द्वादशी को स्तवन की समाप्ति पर उस प्रसाद को ग्रहण किया। तभी से उस प्रसाद को महाप्रसाद का गौरव मिल गया। इस महाप्रसाद में विशेष रूप से नारियल, लाई, गजामूंग और मालपुआ का प्रसाद रहता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण में इस रथयात्रा का अत्यंत सारगर्भित तत्वदर्शन वर्णित है। इस शास्त्रीय विवेचन के मुताबिक लोकपालक का यह अनूठा रथ मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार; इन चार पायों के संतुलित समन्वय पर टिका है। ऐसे रथ रूपी शरीर में आत्मा रूपी भगवान जगन्नाथ विराजमान होते हैं। वस्तुतः यह रथयात्रा शरीर और आत्मा के मिलन की द्योतक है। यद्यपि प्रत्येक जीवधारी के शरीर में आत्मा होती है पर वह स्वयं संचालित नहीं होती, बल्कि उसे माया संचालित करती है। सनातन हिंदू धर्म के इस विलक्षण तत्वदर्शन का सर्वाधिक सशक्त प्रमाण है जगत पालक की अद्भुत रथयात्रा। पौराणिक मान्यता है कि है कि जो श्रद्धालु इस रथयात्रा में शामिल होता है, वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष पा जाता है। इस्कान के संस्थापक ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी का कहना है कि रथयात्रा उत्सव का मूलभाव श्रीकृष्ण को कुरुक्षेत्र से वृन्दावन वापस लाने का है। पुरी स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर वह पावन स्थल है जहां श्रीकृष्ण परम-ऐश्वर्य का भोग करते हैं तथा गुण्डिचा मंदिर वृन्दावन का रूप है जहां भगवान को लाया जाता है जो कि उनकी मधुरतम लीलाओं की दिव्य भूमि है।
श्रीजगन्नाथ मंदिर और यहां रथयात्रा के जुड़े पौराणिक कथानक भी खासे दिलचस्प हैं। ब्रह्मपुराण के अनुसार देवशिल्पी विश्वकर्मा ने खुद जगन्नाथ मंदिर का निर्माण किया था। बताते चलें कि उनके द्वारा निर्मित चार लाख वर्गफुट में क्षेत्र में फैले और 214 फुट ऊंचे दुनिया के भव्यतम मंदिरों में शुमार इस मंदिर मुख्य गुंबद की छाया कभी भी धरती पर नहीं पड़ती। मंदिर के शिखर पर स्थापित ध्वजा सदैव हवा की विपरीत दिशा में लहराती है। कोई किसी भी स्थान से देखे, मंदिर के शीर्ष पर लगा सुदर्शन चक्र उसे सदैव अपने सामने दिखायी देता है। मंदिर के गुंबद के ऊपर पक्षी तो क्या विमान तक नहीं उड़ पाता। मंदिर के सिंहद्वार में पहला कदम रखते ही सुनायी पड़ना बिल्कुल बंद हो जाती है। इस मंदिर के यह चमत्कार यहां आने वाले श्रद्धालुओं को दांतों तले अंगुलियां दबाने को विवश कर देते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लोकलीला के संवरण के उपरांत अपने परम भक्त उत्कल देश के राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न में इस मंदिर को बनवाने की प्रेरणा दी थी। मंदिर का निर्माण हो जाने के बाद एक वृद्ध शिल्पकार का रूप धरकर विश्वकर्मा स्वयं राजा के पास गये और कहा कि देव विग्रह तैयार होने के पहले द्वार को खोला नहीं जाए। पर कई दिनों तक उनके बाहर न आने पर रानी को उनके भूख-प्यास की चिंता हुई और उन्होंने आग्रह कर द्वार खुलवा दिए। लेकिन वहां भगवान की अधूरी मूर्तियों की सिवा कोई नहीं मिला। तब देववाणी के मुताबिक वे अधूरे विग्रह ही मंदिर में स्थापित कर दिए गये जो सदियों से आज तक पूजित होते आ रहे हैं। पुरी की इस रथयात्रा को लेकर मान्यता है कि एक दिन भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने उनसे नगर दर्शन कराने की प्रार्थना की। तब भगवान जगन्नाथ ने अपनी बहन की इच्छा पूर्ति के लिए अपने अग्रज बलराम के साथ उन्हें रथ में बिठाकर पूरे नगर का भ्रमण करवाया था। माना जाता है कि तभी से उपरोक्त अवधि में रथयात्रा निकलने की परम्परा की शुरू हो गयी।
रथयात्रा के लिए श्री जगन्नाथ जी, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के क्रमश: 45, 44 व 43 फीट ऊंचे तीन रथ तैयार किये जाते हैं। जगन्नाथ का रथ "नंदीघोष" 16 पहियों का, बलभद्र जी का रथ "तालध्वज" 14 पहियों का और सुभद्रा का रथ "देवदलन" 12 पहियों का बनता है। इन रथों को सजाने के लिए लगभग 1090 मीटर कपड़ा लगता है। लाल वस्त्रों के अलावा जगन्नाथ के रथ को पीले वस्त्रों से,बलभद्र जी के रथ को नीले से और सुभद्रा के रथ को काले वस्त्रों से मढ़ा जाता है। इसे खींचने वाली रस्सी को "स्वर्णचूड़ा" कहते हैं। आज भी रथयात्रा में जगन्नाथ जी को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है। भगवान जगन्नाथ के इस पुण्य धाम में विभिन्न धर्मो, मतों और विश्वासों का अद्भुत समन्वय दिखायी देता है। मंदिर में पूजा पाठ, दैनिक आचार-व्यवहार, रीति-नीति और व्यवस्थाओं को शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन और तंत्र साधकों ने भी प्रभावित किया है।