भीमा कोरेगांव मामला: अदालत ने तेलतुम्‍बडे के खिलाफ आरोपों कोप्रथम दृष्‍टया सच माना

    दिनांक 17-जुलाई-2021   
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मुंबई की विशेष एनआईए अदालत ने यल्‍गार परिषद के आनंद तेलतुम्‍बडे को जमानत देने से इनकार कर दिया। 2018 में भीमा कोरेगांव हिंसा में कथित भूमिका के लिए वह फिलहाल तलोजा सेंट्रल जेल में बंद है। एनआईए अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पर्याप्‍त सबूत हैं कि भीमा कोरेगांव के आरोपी आनंद तेलतुम्बडे के खिलाफ आरोप सच हैं।
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मुंबई की विशेष एनआईए अदालत ने यल्‍गार परिषद के आनंद तेलतुम्‍बडे को जमानत देने से इनकार कर दिया। 2018 में भीमा कोरेगांव हिंसा में कथित भूमिका के लिए वह फिलहाल तलोजा सेंट्रल जेल में बंद है। एनआईए अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पर्याप्‍त सबूत हैं कि भीमा कोरेगांव के आरोपी आनंद तेलतुम्बडे के खिलाफ आरोप सच हैं।
अभियोजन पक्ष के वकील प्रकाश शेट्टी ने 70 वर्षीय तेलतुम्‍बके की जमानत याचिका का विरोध करते हुए आरोप लगाया कि वह प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवाद) का सक्रिय सदस्‍य था और संगठन के एजेंडे को आगे बढ़ा रहा था। शेट्टी ने यह भी दावा किया कि एक गवाह ने कहा है कि तेलतुम्‍बडे अपने भाई मिलिंद के संपर्क में था, जिसका नाम आरोपपत्र में एक फरार आरोपी और संगठन के शीर्ष संचालक के रूप में था। मिलिंद ने गवाह को बताया था कि तेलतुम्‍बडे से प्रेरित होकर ही वह संगठन में शामिल हुआ था। हालांकि तेलतुम्‍बडे के वकील सुदीप पासबोला ने यह कहते हुए इसका विरोध किया कि अभियोजन पक्ष का अफवाह को सबूत मान रहा है। लेकिन अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्‍तुत सबूतों को प्रथम दृष्‍टया सही माना।
अपने 40 पन्‍नों के आदेश में विशेष एनआईए अदालत के न्यायाधीश डी.ई कोठालीकर ने कहा, "जमानत याचिका को केवल या विशेष रूप से इस आधार पर स्‍वीकार नहीं किया जा सकता है कि आपराधिक न्यायशास्त्र का मूल सिद्धांत यह है कि आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक कि उसे सक्षम अदालत द्वारा दोषी नहीं पाया जाता है।"
अदालत ने बॉम्‍बे उच्च न्यायालय के निष्कर्षों को नोट किया कि तेलतुम्बडे के खिलाफ साक्ष्‍यों की उपलब्धता अपराध में उनकी संलिप्तता को दर्शाता है। इस तरह के निष्कर्षों के आधार पर विशेष न्यायालय इस नतीजे पर पहुंचा कि याची के पक्ष में वह अपने विवेकाधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता। अभियोजन और बचाव पक्ष के दस्‍तावेजों के आधार पर अदालत ने कहा कि इस एक सीमा तक निष्‍कर्ष निकालने में संकोच नहीं कि रिकॉर्ड में उपलब्‍ध सामग्री प्रथम दृष्‍टया यह बताती है कि या‍ची के खिलाफ लगाए गए आरोप सही हैं। अदालत ने पासबोला के उस तर्क को भी खारिज कर दिया कि जांच एजेंसी द्वारा पेश दस्‍तावेज को सबूत के तौर पर स्‍वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि जमानत याचिका पर निर्णय लेने के समय ‘घुमावदार जांच’ या मिनी ट्रायल की अपेक्षा नहीं की जाती है।
2018 के भीमा कोरेगांव हिंसा में संलिप्तता को लेकर हिरासत में लिए गए आनंद तेलतुंबडे ने जमानत मांगी थी। उसका कहना था कि जांच एजेंसियां और एनआईए के पास उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों को सही साबित करने के लिए पर्याप्‍त सबूत नहीं हैं। लेकिन उसकी याचिका का विरोध करते हुए एनआईए ने कहा कि तेलतुम्‍बडे प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) का सक्रिय सदस्‍य था और भीमा कोरेगांव में अन्‍य आरोपियों को हिंसा के लिए भड़काने का जिम्‍मेदार है। अपने हलफनामे में एनआई ने कहा है कि तेलतुम्बडे न केवल एल्गार परिषद के कार्यक्रम में मौजूद था, बल्कि इस कार्यक्रम में उसके कार्य और प्रदर्शन की प्रकृति भड़काऊ थी।