किसान आंदोलन: खेती करने वाले तो ‘खादी’ वाले निकले

    दिनांक 18-जुलाई-2021   
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किसान आन्दोलन शुरुआत से ही वामपन्थी व खालिस्तान समर्थकों के बीच रस्साकशी का अखाड़ा बना हुआ है। यहां किसानों के लिए कोई आंदोलन नहीं कर रहा। सब अपनी राजनीति साधने में लगे हुए हैं

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बात शुरू करने से पहले शमश-उल-हक का प्रसिद्ध शेयर याद आ रहा है - ‘बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का। जो चीरा तो इक कतरा-ए-खूं न निकला।’ दिल्ली की सीमा पर चल रहे किसान आन्दोलन में खेती के नाम पर खूब खून और खाक का खेल खेला गया, चौबीस घण्टे खेती...खेती...खेती... का चालीसा बांचने वाले आखिर ‘खादीधारी’ निकले। वैसे तो यह कोई बहुत बड़ा रहस्योद्घाटन नहीं, लोग शुरू से ही खादी को पहचान गए थे परन्तु अब मामला पूरी तरह दिन के उजाले की तरह साफ होता आने लगा है। संयुक्त किसान मोर्चा ने भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी को इसलिए निलम्बित कर दिया क्योंकि वे पंजाब विधानसभा चुनाव में ताल ठोकने की बात करने लगे थे। इस निलम्बन पर सवाल यह भी उठ सकता है कि बंगाल के विधानसभा चुनाव में सुश्री ममता बैनर्जी और यूपी के ग्रामीण चुनावों में अपने प्रियजनों के लिए पसीना बहा चुके किसान नेता राकेश टिकैत एण्ड पार्टी के नेतृत्व वाले मोर्चे को क्या यह नैतिक अधिकार है कि वे उस अपराध के लिए किसी को दण्ड दे जो वो खुद ताल ठोक के कर चुके हैं।
वैसे किसानों की रामनामी ओढ़े इन खादीधारियों को लोग पहले ही पहचानते थे। गुरनाम सिंह चढ़ूनी की राजनीतिक आस्था आम आदमी पार्टी में रही है और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के साथ उनके घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। उनकी पत्नी आम आदमी पार्टी के टिकट पर हरियाणा के शाहबाद से विधानसभा चुनाव लड़ चुकी हैं। अब चढूनी चाहते हैं कि संयुक्त किसान मोर्चे को पंजाब के विधानसभा चुनाव में ताल ठोकनी चाहिए। चढूनी ने यह बात बिल्कुल भी हलके ढंग से नहीं कही। पहले उन्होंने पंजाब में चुनाव लडऩे की वजह बताई, इसके पक्ष में दलील दी और सरकार तक बना लेने का सपना देखा। चढूनी यहीं नहीं रुके। उन्होंने कहा कि भाजपा को हराकर कोई फायदा नहीं होगा। पहले की सरकारों जिनमें कांग्रेस सहित सभी पार्टियां शामिल हैं में भी किसानों की हालत खराब होती रही है। चढ़ूनी चाहते हैं कि किसान पंजाब में 2022 में विधानसभा चुनाव लडक़र देश का पहला रोल मॉडल तैयार करें।
चढ़ूनी ने केवल यह इच्छा जताई ही नहीं बल्कि, लगता है कि उन्होंने अपनी इस योजना को लागू भी करना शुरू कर दिया है। इसका संकेत मिला है पंजाब में भाजपा के बाद कांग्रेसी नेताओं के विरुद्ध किसानों के शुरू हुए प्रदर्शनों से। अभी कल ही जालन्धर में पंजाब के स्वास्थ्य मन्त्री बलबीर सिंह सिद्धू को किसानों के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा। वे स्वास्थ्य केन्द्र का उद्घाटन करने आए थे परन्तु विरोध के चलते उन्हें अधर में ही लौटना पड़ा। इससे कुछ दिन पहले भी कांग्रेस के कई मन्त्रियों, सांसदों को जगह-जगह पर किसानों के विरोध का सामना करना पड़ चुका है। काबिलेजिक्र है कि कांग्रेस किसान आन्दोलन को समर्थन दे रही है परन्तु इसके बावजूद किसान कांग्रेसी नेताओं का विरोध कर रहे हैं तो यह साफ समझ में आता है कि राज्य में राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पाले आम आदमी पार्टी की शह पर यह हो रहा है, जो चढ़ूनी की चहेती पार्टी है।
केवल चढ़ूनी ही क्यों, संयुक्त मोर्चा का नेतृत्व कर रहे अभी तक जितने भी लोग हैं, उनकी अपनी-अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि है, राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं हैं। भाकियू नेता राकेश टिकैत की जाटलैण्ड पर निगाह है। बंंगाल के बाद वे उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक हैसीयत तोलने का सपना देख रहे लगते हैं। किसान व जाट नेता चौधरी चरण सिंह के पुत्र चौधरी अजीत सिंह के स्वर्गवास के बाद जाट सिंहासन रिक्त नजर आ रहा है जिस पर टिकैत बन्धु नजरें गड़ाए बैठे लगते हैं।
किसान मोर्चा में शामिल अन्य नेता स्वराज इण्डिया के संस्थापक योगेन्द्र यादव हरियाणा की राजनीति में सक्रिय होकर आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष एवं दिल्ली के मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल के हाथों हुए अपने एतिहासिक अपमान का बदला लेने का इरादा रखते हैं। आन्दोलन के नाम पर वे अपनी राजनीतिक जमीन तलाशते दिख रहे हैं। इसके अतिरिक्त दर्शनपाल जैसे नेता वामपन्थी दलों से जुड़े हैं।
सोशल मीडिया का गहनता से अध्ययन करने पर पता चलता है कि किसान आन्दोलन शुरुआत से ही वामपन्थी व खालिस्तान समर्थकों के बीच रस्साकशी का अखाड़ा बना हुआ है। चाहे भाजपा व संघ विरोध के नाम पर आन्दोलनकारी एक मंच पर दिखाई देते हैं परन्तु उनके समर्थक सोशल मीडिया में परस्पर भारी-भरकम दुष्प्रचार व गालीगलौज करते हैं। खालिस्तान समर्थक लॉबी आम आदमी पार्टी की समर्थक मानी जाती है जिसका खुलासा 2017 के विधानसभा चुनाव में ही हो चुका है। इन चुनावों में प्रचार के दौरान पंजाब आने पर अरविन्द केजरीवाल न केवल खालिस्तानियों बल्कि पूर्व दुर्दांत आतंकियों के घरों में रातें गुजारते रहे हैं। विदेशों में बैठी खालिस्तानी लॉबी भी आम आदमी पार्टी के पक्ष में लामबन्द होती रही है।
पूरे प्रकरण में कांग्रेस की हालत माया मिली न राम वाली बनती दिख रही है। आन्दोलन को समर्थन देने वाली कांग्रेस के नेता ही अब किसानों के विरोध का सामना करने लगे हैं। राजनीतिक लाभ के लिए पंजाब के हितों को तिलांजलि देने और राजधर्म तक भूलने वाले पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह सहित पूरी कांग्रेस पार्टी अपने को ठगा महसूस करने लगी है। किसानों की धक्केशाही से परेशान आम लोगों में पहले ही कांग्रेस के खिलाफ गुस्सा है और अब खुद किसानों द्वारा ही कांग्रेस को लतियाने से पार्टी को दोनो तरफ से फटकार पड़ती दिख रही है। यही कारण है कि अब कैप्टन ने किसी को कानून व्यवस्था से खिलवाड़ नहीं करने देने की चेतावनी देनी शुरू कर दी है। फिलहाल खेती के आवरण में खादी निकलने से वास्तविक खेतीदार अपने को ठगा महसूस करने लगे हैं।