देशभक्ति जैसे भी दिखाई जाए, गर्व का ही विषय होती है!

    दिनांक 18-जुलाई-2021
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पीयूष द्विवेदी
देश में एक वैचारिक खेमे को देशभक्ति और राष्ट्रीयता जैसी चीजों से बड़ी चिढ़ है। इस तरह की कोई फिल्म आए तो उसमें कमियां निकालने का मौक़ा वे कतई नहीं चूकते। ऐस ही 13 अगस्त को रिलीज होने वाले फिल्म 'भुज : द प्राइड ऑफ़ इंडिया' को लेकर किया जा रहा है

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आगामी 13 अगस्त को डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर एक फिल्म आ रही है – भुज : द प्राइड ऑफ़ इंडिया। यह फिल्म 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से जुड़ी एक सच्ची घटना पर आधारित है। दरअसल हुआ यूं था कि पाकिस्तान ने 1971 के युद्ध के समय एक ख़ास रणनीति के तहत भारत के भुज एयरबेस पर हवाई हमला कर उसे तहस-नहस कर दिया था। एयर बेस की हवाई पट्टी पूरी तरह से तबाह हो गयी। उधर पाकिस्तानी सेना भाड़े के टैंक लिए कच्छ की ओर बढ़ रही थी। पाकिस्तान की यह सब कवायद केवल इसलिए थी कि भारत का ध्यान बांग्लादेश से हट जाए। लेकिन इन विपरीत परिस्थितियों में ही भुज एयरबेस का नेतृत्व कर रहे विजय कार्णिक ने निकट के गांव वालों की मदद से भुज की हवाई पट्टी को ठीक करने बीड़ा उठा लिया और सफलतापूर्वक इसे पूरा भी किया। इस तरह पाकिस्तान की मंशा अधूरी रह गई। इसी घटना को केंद्र में रखकर ‘भुज : द प्राइड ऑफ़ इण्डिया’ फिल्म बनाई गई है, जिसमें विजय कार्णिक के किरदार में सुपरस्टार अजय देवगन हैं। संजय दत्त, सोनाक्षी सिन्हा, शरद केलकर और नोरा फतेही आदि भी कई प्रमुख भूमिकाओं में हैं। अजय देवगन इस फिल्म के निर्माता भी हैं।
इस फिल्म का ट्रेलर बीते दिनों यूट्यूब पर प्रसारित हुआ जिसे बड़े पैमाने पर लोगों द्वारा पसंद किया जा रहा है और फिल्म के प्रति लोगों में बेहद उत्सुकता देखने को मिल रही है। कितने लोग तो इसके ट्रेलर से इतने प्रभावित हैं कि वे इसे ओटीटी की बजाय सीधे सिनेमाघर में प्रसारित करने की मांग कर रहे हैं। फिल्म का ट्रेलर वाकई में दमदार है। एक देशभक्ति से जुड़े विषय पर बन रही युद्ध आधारित फिल्म की जैसी ‘ट्रीटमेंट’ होनी चाहिए, उसकी झलक भुज के ट्रेलर में देखी जा सकती है। तिरंगे का सम्मान, भारतीय सेना का गरिमापूर्ण चित्रण, देशभक्ति के जोशीले संवाद, मजबूत एक्शन दृश्य और समग्रतः राष्ट्रवाद की प्रखर अभिव्यक्ति – इन सब चीजों की झलक भुज के ट्रेलर में दिखती हैं। फिल्म के संवाद प्रभाव उत्पन्न करने वाले हैं और जोश से भर देते हैं।
लेकिन देश में एक वैचारिक खेमे को देशभक्ति और राष्ट्रीयता जैसी चीजों से बड़ी चिढ़ है। इस तरह की कोई फिल्म आए तो उसमें कमियां निकालने का मौक़ा वे कतई नहीं चूकते। इस खेमे के लोग मीडिया संस्थानों में भी मौजूद हैं। ऐसे ही एक बड़े मीडिया समूह की प्रसिद्ध वेबसाइट ‘लल्लनटॉप’ ने इस फिल्म के ट्रेलर की समीक्षा की है, जिसमें शीर्षक से लेकर पूरी समीक्षा तक फिल्म की जैसी कमियां गिनवाई गई हैं उससे साफ़ जाहिर होता है कि इस फिल्म में देशभक्ति और राष्ट्रवाद को प्रखरता से प्रस्तुत किए जाने से वे कितने आहत हैं।
समीक्षा का शीर्षक है – ‘क्या बिना चीखे हीरो देशभक्ति नहीं साबित कर सकता?’। इस शीर्षक को समझने के लिए मैंने फिल्म के ट्रेलर को कई बार ध्यान से देखा लेकिन एकबार भी मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखाई दिया जहाँ फिल्म के नायक अजय देवगन चीखकर अपनी देशभक्ति दिखा रहे हों। हालांकि यदि वे ऐसा करते तो भी कुछ बुरा नहीं होता क्योंकि देशभक्ति चाहें जैसे प्रकट की जाए, गर्व का ही विषय होती है। इस ट्रेलर में जोरदार आवाज में (लल्लनटॉप की भाषा में चीखकर) सिर्फ दो ही संवाद बोले गए हैं – भारत माता की जय और जय हिंद – और ये दोनों ही संवाद भरपूर प्रभाव उत्पन्न करने वाले हैं।
आगे की समीक्षा में फिल्म के एक्शन का मजाक बनाते हुए उसकी तुलना 1990 के दशक की मसालों फिल्मों से कर दी गयी है। सत्य घटना पर बनी फिल्मों में सिनेमाई प्रभाव उत्पन्न करने के लिए नाटकीयता का समावेश होता ही है, जिसकी घोषणा फिल्म के शुरुआत में ही ‘डिस्क्लेमर’ देकर कर दी जाती है। इससे पहले भी सत्य घटनाओं पर आधारित फिल्मों में ऐसा होता रहा है और वे फ़िल्में सफल भी रही हैं। 1971 की लड़ाई पर ही आधारित ‘बॉर्डर’ फिल्म इसका मजबूत उदाहरण है। हाल ही में आई फिल्म ‘गुंजन सक्सेना – द कारगिल गर्ल’ में भी जो एक्शन दिखाया गया था, क्या वो एकदम वास्तविक था ? अब विजय कार्णिक ने किस तरह की जांबाजी से उसवक्त एयरबेस पर काम किया और हवाई पट्टी को ठीक करवाया, इसकी कोई रिकॉर्डिंग नहीं है, लेकिन हम यह जानते हैं कि उन्होंने वहाँ जो किया वो असाधारण साहस, हिम्मत और हौसले का काम था। सो उस घटना के नाट्य रूपांतरण में यदि रचनात्मक छूट लेते हुए कुछ प्रभावी एक्शन दृश्य जोड़ भी दिए गए हों तो इसमें समस्या वाली कोई बात नहीं होनी चाहिए। लेकिन समस्या वाली बात तब होती है, जब देशभक्ति फिल्मों की आलोचना का मन बनाकर ही कलम उठाई जाए।
समीक्षा में यह कष्ट भी जाहिर किया गया है कि ‘बम गिरता है, सब भस्म हो जाता है लेकिन झंडा खड़ा रह जाता है।’ तिरंगा भारत के साहस, सम्मान, आत्मविश्वास और उम्मीद का प्रतीक है। सो पाकिस्तान की बमबारी के बीच इसका लहराते रहना यही दर्शाता है कि बमबारी से देश का साहस व आत्मविश्वास टूटा नहीं है और न उम्मीद ही खत्म हुई है। लेकिन समीक्षक महोदय को यह पसंद नहीं आया, उन्हें शायद तब अच्छा लगता जब ट्रेलर में कोई बम आकर तिरंगे पर लगता और भारत के साहस-सम्मान का प्रतीक तिरंगा भूमि पर गिर जाता।
इसके अलावा समीक्षा में वीएफएक्स की तुलना वीडियो गेम से करते हुए भी ट्रेलर का मजाक बनाया गया है तथा कुछ नाटकीय संवादों को ‘कवि सम्मेलन’ कहते हुए तंज किया गया है। इन बातों पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि यह समीक्षा लिखने वाले सज्जन को एकबार सोशल मीडिया का दौरा कर लेना चाहिए था तो उन्हें पता लग जाता कि लोग ट्रेलर के दृश्य इतने पसंद आ रहे कि वे फिल्म को सिनेमाघर में बड़े परदे पर देखने की मांग कर रहे हैं। वहीं फिल्म के संवाद भी पूरे सोशल मीडिया पर छाए हुए हैं। वैसे राष्ट्रवादी संवादों पर इस वेबसाईट की तकलीफ नयी नहीं है। 2020 में जब अजय देवगन की ही एक और देशभक्ति और राष्ट्रवाद से भरी फिल्म ‘तानाजी : द अनसंग वारियर’ आई थी, तो उसके संवादों से भी इन्हें तकलीफ हुई थी।
कुल मिलाकर बात ये है कि जिस फिल्म में भी देशभक्ति और राष्ट्रवाद की प्रखर प्रस्तुति हो उसमें नुक्ताचीनी करना इनकी आदत है। लेकिन ऐसी समीक्षाओं और समीक्षकों को देश की जनता ने ‘तानाजी’ को ब्लॉकबस्टर बनाके जवाब दिया था और अब ‘भुज – द प्राइड ऑफ़ इण्डिया’ की सफलता भी उसी तरह से निश्चित लग रही है।