बलूचों के खिलाफ नहीं तालिबान

    दिनांक 20-जुलाई-2021   
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काजीदाद मोहम्मद रेहान

अफगानिस्तान में तालिबान के मजबूत होने का असर पूरे इलाके पर पड़ेगा। इस लिहाज से बलूचिस्तान के लिए भी यह बदलाव अहम है क्योंकि दोनों के बीच लंबी सरहद पड़ती है। लेकिन फिलहाल जो संकेत हैं, बलूचों के लिए मुश्किल हालात का अंदेशा नहीं दिखता

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तालिबान ने अफगानिस्तान के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है और बलूचिस्तान के साथ उसकी लंबी सरहद है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अफगानिस्तान में तालिबान के मजबूत होने का बलूचिस्तान और उसकी कौमी तहरीक पर क्या असर पड़ेगा।

इस बात पर गौर फरमाने से पहले तारीख में कुछ पीछे जाना पड़ेगा। 1970 के दशक में नेशनलिस्ट मूवमेंट चलाने वाली बड़ी शख्सियत थे खैरबख्श मर्री। बाबा मर्री ने बलूचिस्तान पीपल्स लिबरेशन फ्रंट के नाम से तंजीम बनाई और अफगानिस्तान को अपना मरकज (केंद्र) बनाया। तब की अफगानिस्तानी हुकूमत के अलावा वहां चल रही अलग-अलग महकमों की तहरीकों से भी उन्हें मदद मिली। तारीखी तौर पर माजी (बीते समय) में भी अफगानिस्तान बलूचों का दूसरा वतन रहा है। लेकिन जब तालिबान की हुकूमत का तालिबानीकरण हुआ तो हालात बदले।

जब तालिबान की हुकूमत आई तो बलूच स्वात यूनियन के साथ थे। बाबा खैरबख्श मर्री तब बलूच कौमी तहरीक को लीड कर रहे थे। वे मार्क्सवादी थे। अफगानिस्तान हुकूमत के खत्म हो जाने और तालिबान के आने के बाद एक मार्क्सवादी गुट का अफगानिस्तान में रहना मुश्किल था। इस वजह से खैरबख्श मर्री पाकिस्तानी हुकूमत के साथ बातचीत कर वापस बलूचिस्तान आ गए। इस तरह अफगानिस्तान में तालिबान के आने के बाद बलूचिस्तान में 1970 से लेकर 1973 तक चले एक बड़े मूवमेंट का एक तरह से खात्मा हो गया। इसीलिए यह सवाल मौजूं है कि अब चूंकि अफगानिस्तान में दोबारा तालिबान आ रहे हैं तो वही सूरते-हाल होगी या नहीं। मेरी राय है कि अब न वो स्वात यूनियन रहा, न अब वो जमाना है और न ही बलूचों में अब वो लीडरशिप है जिनका तालिबान के साथ नजरियाती टकराव था। बलूच यकीनी तौर पर ताबिलानी सोच को नहीं मानेंगे।

पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने तालिबान के मन में यह बात बैठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि बलूच इस्लाम के खिलाफ हैं और इस वजह से उनके खिलाफ भी जिहाद होना चाहिए। बलूचिस्तान में भी पाकिस्तान ने जिन मजहबी तंजीमों को खड़ा किया था, उनकी भी सोच यही थी। यही तंजीमें अफगानिस्तान में तालिबान की मदद कर रही थीं। यहां से लोगों को भर्ती कर अफगानिस्तान भेजा जा रहा था। जब अफगानिस्तान में तालिबान आए, तो ऐसे बलूचों को वापस आना पड़ा। लेकिन अब बलूचों की सोच में वैसा कुछ नहीं रहा जिससे उनके साथ कोई बहुत बड़ी नाइत्तेफाकी हो।

पाकिस्तान का फैक्टर
बलूचों पर क्या असर पड़ेगा, इसे तालिबान और पाकिस्तान के रिश्तों को जाने बिना नहीं समझा जा सकता। पूरी दुनिया जानती है कि पाकिस्तानी हुकूमत ने तालिबान के लोगों को क्वेटा में शेल्टर दे रखा था, उन्हें महफूज ठिकाने दे रखे थे। फिर अमेरिका को भी समझ में आ गया कि पाकिस्तान ऊपर से अमेरिका की मदद करता है लेकिन अंदर से तालिबान की मदद कर रहा है। ऐसे में अमेरिका ने पाकिस्तान से कहा कि उसकी तालिबान से बात कराए। फिर तालिबान और अमेरिका में बातचीत में पाकिस्तान ने बड़ा रोल अदा किया। इसी दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका और तालिबान के सामने शर्त रखी कि अगर आने वाले समय में अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत आएगी तो उसमें ऐसी ताकतें नहीं होंगी जो पाकिस्तान के खिलाफ हैं। यह इशारा था आजादी के लिए लड़ाई लड़ रहे बलूचों की तरफ कि उस सूरत में अफगानिस्तान की जमीन से बलूचों की मदद नहीं मिले।

दूसरी ओर जब अफगानिस्तान की हुकूमत को महसूस हुआ कि वह तो किनारे हो गया है और अमेरिका ने तालिबान के साथ बातचीत शुरू कर दी है तो उसे मजबूर होकर पाकिस्तान के साथ खुफिया मीटिंग करनी पड़ी। उसमें पाकिस्तान ने साफ कहा कि अफगानिस्तान में रह रहे बलूच फ्रीडम फाइटर्स को आप नहीं छोड़ेंगे। इसपर अफगानिस्तानी हुकूमत राजी हो गई थी। लेकिन फिर वह बात आगे नहीं बढ़ी।

अब के हालात अलग
लेकिन अब के हालात अलग हैं। अभी हाल ही में पाकिस्तान में हुकूमत और फौज के बीच एक मीटिंग हुई जिसमें इस बात पर अफसोस जाहिर किया गया कि तालिबान ने तो अफगानिस्तान पर तेजी से पकड़ बनानी शुरू कर दी है लेकिन इसके साथ ही वह पाकिस्तान की पकड़ से बाहर होता जा रहा है। यह हकीकत है कि अफगानिस्तान की सूरते-हाल पर पाकिस्तान का किरदार फिलहाल कम हो गया है। तालिबान डुरंड लाइन को नहीं मानने जा रहा है और इस मसले पर पाकिस्तान और तालिबान के बीच बड़ा विरोध होगा। पाकिस्तान के कब्जे वाले पश्तून इलाके को अफगानिस्तान अपना मानता है और इसीलिए वह इस लाइन को नहीं मानता। इस मामले में यह भी गौर करना चाहिए कि अफगानिस्तानी प्रेसिडेंट अशरफ गनी ने तालिबान से कहा था कि आप वादा करें कि डूरंड लाइन को नहीं मानेंगे और इस मामले में गैरमुल्कियों (पाकिस्तान) की नहीं सुनेंगे। दरअसल, अफगानिस्तान में जिसकी भी सरकार आ जाए, वे डुरंड लाइन को नहीं मानने वाले और अफगानिस्तान में पाकिस्तान की सबसे बड़ी दिलचस्पी इसी बात को लेकर है कि वहां कोई ऐसी सरकार न आ जाए जो पहले हुए एग्रीमेंट के तहत पाकिस्तान के कब्जे वाले पश्तून इलाके को वापस मांग ले।

उलटा पड़ा दांव
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जितना टकराव होगा, बलूचों को उतनी ही राहत मिलेगी। हाल के समय में पाकिस्तान ने तालिबान के लोगों के साथ कोई वफादारी नहीं की, उनके लोगों को जेल में बंद किया गया। उनको कत्ल किया गया, उनके बच्चों को मारा गया। तालिबान की जो लीडरशिप है, वो पाकिस्तान की बेवफाई से खफा है। तालिबान ने इस बीच पाकिस्तान में एक और खेल किया है। उन्होंने पाकिस्तान में अपना एक धड़ा खड़ा किया है। अमेरिका ने जब तालिबान की हुकूमत का खात्मा किया, तब पाकिस्तान ने अपने बॉर्डर खोले। बड़ी तादाद में तालिबान आए। घर-बार बसाए। अपनी तरह से रहना और फैसले करना शुरू किया। उनके पास हथियार तो थे ही। फिर पाकिस्तान ने उनके खिलाफ ताकत का इस्तेमाल किया। उनका कत्लेआम किया। उन्हें पहले मजहबी बुनियाद पर जोड़ा गया था, उनमें जिहाद की बातें भरी गई थीं। लेकिन फौज के आॅपरेशन से पाकिस्तान में रहने वाले पश्तूनों की आंखें खुल गर्इं। फिर उन्होंने तहरीके-तालिबान नाम से अलग तंजीम बनाई। तहरीके-तालिबान पाकिस्तान और अफगानिस्तान के तालिबान, दोनों की सोच एक है। जिस तरह अफगानिस्तान का तालिबान अफगानिस्तान की हुकूमत पर कब्जा करना चाहता है, वैसे ही तहरीके तालिबान पाकिस्तान भी पाकिस्तान की हुकूमत पर कब्जा करना चाहता है। अफगानिस्तान के तालिबान की ओर से तहरीके तालिबान पाकिस्तान को हर तरह की मदद मिलती है। ऐसे में पाकिस्तान के लिए तालिबान एक खतरा बन चुका है।

तालिबान से संकेत
अफगानिस्तान में बलूचों के खिलाफ जो भी जुल्म हुआ, उनके लोगों को जो कत्ल किया गया, उसके बारे में तालिबान ने अपना हाथ होने से इनकार किया है। उसने यह भी कहा है कि वह आगे भी बलूचों के खिलाफ किसी भी जुल्म या कत्ल में शामिल नहीं होने जा रहा। इन सब बातों को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि तालिबान फिलहाल तो बलूचों के साथ किसी भी तरह के टकराव या जंग में जाने से परहेज करेगा। यह तालिबान के लिए दूसरे तरीके से भी अच्छा है क्योंकि अफगानिस्तान में आम लोग बलूचों को भाई के तौर पर देखते हैं और अरसे से हुकूमत से बाहर रहे तालिबान शायद ही ऐसा कोई कदम उठाएं जिससे लोगों में किसी तरह की कोई गलतफहमी रहे। हुकूमती तौर पर फिलहाल ऐसी कोई सूरत नहीं दिखती कि वहां रह रहे बलूच लीडर्स को पकड़कर पाकिस्तान के हवाले कर दिया जाए।

इस बार के हालात अलग हैं और जिस तरह के बयानात तालिबान की ओर से आए हैं, उन्हें मद्देनजर रखते हुए बलूचों को भी तालिबान से बातचीत का रास्ता खोजना चाहिए। जब उनके दुश्मन अमेरिका तक ने उनसे बातचीत की, रूस बातचीत कर रहा है, भारत ने भी बात शुरू कर दी है तो भला बलूच ऐसा क्यों नहीं कर सकते?               
(लेखक रेडियो जुम्बिश से जुड़े पत्रकार हैं)
प्रस्तुति : अरविन्द