जयंती विशेष: आधुनिक भारत के कर्मयो​गी लोकमान्य बालगंगाधर तिलक

    दिनांक 23-जुलाई-2021
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सुदेश गौड़
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में तिलक की भूमिका अतुलनीय है। सर्वप्रथम तिलक ने भारतीय जनता को 'अवज्ञा का सिद्धान्त प्रदान किया, जो स्वराज्य प्राप्ति में सहायक बना

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अपने वैभवशाली इतिहास पर गर्व करे बगैर कोई भी राष्ट्र महान नहीं बन सकता है। बाल गंगाधर तिलक जन्म 23 जुलाई 1856 को हुआ था। वह अपनी राष्ट्र भक्ति, देश के प्रति अपने अथक त्याग व बलिदान के लिए जाने जाते हैं। वामपंथी इतिहासकारों ने जानते-बूझते उन्हें इतिहास में यथोचित स्थान न देकर एक अक्षम्य अपराध किया है, महात्मा गांधी और पंडित नेहरू दोनों ही जानते थे कि तिलक के काल में कोई दूसरा ऐसा नेता नहीं है जिसे जनता उनसे (तिलक से) अधिक प्यार करती हो। जनता उन्हें 'लोकमान्य' कहकर पुकारती थी। वे आधुनिक भारत के महानतम कर्मयोगियों में से थे। उन्होंने भारतवासियों को स्वराज्य के अधिकार का प्रथम पाठ पढ़ाया। सूरत में राष्ट्रीय कांग्रेस महाधिवेशन में फूट के सूत्रधार वे ही थे। संगठन में दो विचारधारा के लोग शामिल थे, एक वे जो अंग्रेजी साम्राज्य के प्रति वफादार रहते हुए अपनी सहूलियत के लिए कार्य करना चाहते थे। दूसरे वे जो अंग्रेजी तरीकों से ही अंग्रेजों को देश से बाहर निकालना चाहते थे।इन दो विचारधारा के राजनीतिक संगठनों में एक संगठन उदारवादी कहलाता था एवं दूसरा संगठन उग्रवादी विचारधारा का कहलाता था। इन दोनों गुटों नरम दल व गरम दल के मतभेद का स्पष्ट उजागर कांग्रेस के सूरत अधिवेशन 1907 में हुआ। उन्होंने ही इसकी योजना बनाई थी। उन्होंने ही इसका प्रचार किया और उन्होंने ही उस असाधारण आन्दोलन को दिशा दी थी।
श्रीमती ऐनी बेसेण्ट ने लिखा है, "यदि भारतवर्ष की जनता में राजनीतिक चेतना काफी मात्रा में होती तो तिलक क्रॉमवेल की भांति भारत में सफल नायक होते।" ब्रिटिश पत्रकार व इतिहासकार सर वैलेण्टाइन शिरोल द्वारा तिलक को 'भारतीय अशान्ति के जनक' की उपाधि देना उस महान भूमिका का प्रमाण है जो तिलक ने नवीन राष्ट्रवाद के प्रचार करने में अदा की थी। राजनीति के सम्बन्ध में तिलक ने आदर्शवादी मार्ग नहीं अपनाया।
ब्रिटिश शासन के प्रति विद्रोह उनके अंग-अंग में निहित था। तिलक जीवनभर नौकरशाही के लिए खतरा बने रहे। राष्ट्रीय आन्दोलन को नया जीवन प्रदान करने के लिए तिलक ने 'गणपति उत्सव' और 'शिवाजी उत्सव' प्रारम्भ किए। तिलक ने कहा था, भाट की तरह से गुणगान करने से स्वतन्त्रता नहीं मिल जाएगी। स्वतन्त्रता के लिए शिवाजी और बाजीराव की तरह साहसी कार्य करने पड़ेंगे।"जन-जागृति” के लिए तिलक ने 'मराठा' तथा 'केसरी' नामक दो समाचार-पत्रों का सम्पादन किया।1897 में उन्होंने दक्षिण के दुर्भिक्ष के समय जनता की बहुत सेवा की तथा किसानों से कर न चुकाने का आह्वान इन शब्दों में किया,"क्या आप इस समय भी साहसी नहीं बन सकते जबकि मौत आपके सिर पर नाच रही हो ।”
1898 में पूना में प्लेग फैलने पर उन्होंने सरकारी अव्यवस्था की धज्जियां उड़ा दी थीं। उनके लेखों से भावुक होकर एक युवक ने तत्कालीन प्लेग कमिश्नर रैण्ड व एक अन्य अंग्रेज अधिकारी आयर्स्ट को मार दिया था। फलस्वरूप तिलक पर ‘कत्ल के उत्तेजक’ के रूप में मुकदमा चलाया गया व 18 माह की सजा सुनाई गई थी। जनता में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई । 1908 में उन्हें सरकार विरोधी लेख लिखने के अपराध में सजा हुई थी।इस बार भी देश में दंगे हुए।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में तिलक की भूमिका अतुलनीय है। सर्वप्रथम तिलक ने भारतीय जनता को 'अवज्ञा का सिद्धान्त प्रदान किया, जो स्वराज्य प्राप्ति में सहायक बना । उदारवादी नेताओं के विपरीत तिलक राजनीतिक अधिकारी व सुधार के लिए सरकार पर दबाव डालना चाहते थे। इसके लिए वे बलिदान, त्याग के लिए भी तैयार थे। उनका मत था कि यदि स्वराज्य संवैधानिक साधनों से प्राप्त नहीं होता है, तो हिंसात्मक साधनों को प्रयोग करने में कोई बुराई नहीं है। वे मानते थे कि साध्य की पवित्रता साधन को भी पवित्र बना देती है, इसलिए वे राजनीतिक भिक्षावृत्ति की नीति को बदलने को कहते थे। तिलक का कहना था कि "विदेशी शासन चाहे कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो, पर वह स्वशासन से श्रेष्ठ नहीं हो सकता।"
इतिहास पर गहराई से नजर डालें तो पता चलेगा कि गांधीजी ने तिलक की मृत्यु के बाद जो आन्दोलन किए वे सब तिलक ने पहले ही कर लिए थे। उनका जीवन दिव्य जीवन था और देशवासियों ने उन्हें न केवल लोकमान्य की उपाधि दी, वरन् उन्हें तिलक भगवान कहकर भी पुकारा। वे चारों ओर से अंधेरे में प्रकाश की ज्योति की तरह सामने आए।
मुम्बई के तत्कालीन गवर्नर ने लिखा था कि तिलक मुख्य षड्यन्त्रकारियों में से हैं या सबसे मुख्य षड्यन्त्रकारी हैं। उसके गणपति उत्सव, शिवाजी उत्सव, पैसा, फण्ड और राष्ट्रीय स्कूल, इन सबका एक ही उद्देश्य है-अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंका जाए।
1908 में मार्टिन लीडर समाचार-पत्र ने लिखा था, "तिलक का निजी प्रभाव देश पर अन्य सभी राजनीतिज्ञों से बढ़कर है।मुम्बई से लेकर बंगाल की खाड़ी तक प्रत्येक गरम विचारों वाला व्यक्ति उनका मान-सम्मान करता है।
तिलक प्रथम भारतीय थे जिन्होंने घोषणा की कि “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा।" गोखले की तरह तिलक अंग्रेजों की कृपा पर जीवित नहीं रहना चाहते थे। वे स्वराज्य को अपना अधिकार मानते थे। उन्होंने आह्वान किया कि भारतीयों को स्वराज्य प्राप्त करने के लिए त्याग करना होगा, कट सहने होंगे और अपना सर्वस्व न्योछावर करना होगा। वास्तव में तिलक लोकतान्त्रिक स्वराज्य के प्रवर्तक विचारक थे। वे एक ऐसी शासन व्यवस्था चाहते थे, जिसमें सभी अधिकारी और कर्मचारी जनता के प्रति उत्तरदायी हो और अन्तिम सत्ता जनता के हाथ में हो। 1897 में तिलक ने स्वराज्य का नारा लगाया । जब सरकार ने उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया, तो वकील के पूछने पर तिलक ने उत्तर दिया “गुलाम जाति के लिए स्वाधीनता की कामना करना न तो बुरा है और न कोई अपराध ।” तिलक के प्रयास से 1906 में कांग्रेस ने स्वराज्य का प्रस्ताव पारित किया। गोखले, मेहता और बनर्जी इसे बदलवाने की कोशिश में थे। तिलक ने इसका घोर विरोध किया। सन् 1907 में तिलक के विरोध के कारण बहुमत के आधार पर उन्हें कांग्रेस से निकाल दिया गया। सरकार ने उन्हें 6 वर्ष का कारावास देकर बर्मा के माण्डले जेल में डाल दिया था। मृत्यु के समय भी उन्होंने कहा कि यदि स्वराज्य नहीं मिला, तो भारत समृद्ध नहीं हो सकता । स्वराज्य हमारे अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।
उदारवादी विचारधारा के अनुसार ब्रिटिश शासन एक दैविक शासन था तथा उसके द्वारा भारत का जो कल्याण हुआ है।वह उसके बिना सम्भव नहीं था। बिटिश सरकार शनै-शनैः वह सब अधिकार हमें देगी जिसके हम धीरे-धीरे अधिकारी होते जाएंगे। तिलक इस उदारवादी विचारधारा के विरुद्ध थे। तिलक ने भारतीयों के कल्याण के लिए स्वराज्य ही उपयुक्त बताया। स्वशासन का अधिकार वह मानव का प्राकृतिक अधिकार मानते थे।
तिलक ने बंग-भंग आन्दोलन के समय 1904-05 में तथा फिर दोबारा 1916 के लखनऊ अधिवेशन में कहा, "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा। तिलक स्वराज्य को राजनीतिक नहीं अपितु नैतिक आवश्यकता मानते थे। उनकी स्वराज्य की धारणा प्राचीन भारतीय धर्मग्रन्थों के आधार पर थी। वे स्वराज्य का अर्थ स्वधर्म आचरण की स्वतन्त्रता से लगाते थे। उनकी स्वराज्य को धारणा छत्रपति शिवाजी तथा स्वामी दयानन्द सरस्वती के जैसी ही थी।
उदारवादी कांग्रेसियों के अनुसार स्वराज्य का अर्थ ब्रिटिश शासन के अन्दर गृह शासन की सुविधाओं से था। तिलक उदारवादियों का औपनिवेशिक स्तर वाला स्वराज्य नहीं चाहते थे। उन्होंने स्वराज्य की व्याख्या पूर्ण स्वतन्त्र राष्ट्र से मिलती-जुलती की थी। जनसाधारण में स्वराज्य की भावना विकसित करने हेतु उन्होंने सन् 1916 में 'होमरूल लीग' की स्थापना की। 'होमरूल लीग' का उद्घाटन करते हुए तिलक ने कहा था कि स्वराज्य से अभिप्राय केवल यह है कि भारत के आन्तरिक मामलों का संचालन और प्रबन्ध भारतवासियों के हाथों में हो। हम ब्रिटेन के सम्राट को बनाए रखने में विश्वास करते हैं।” उन्होंने आगे कहा, “जिस स्वराज्य का मैं वर्णन कर रहा हूँ,उसका तात्पर्य इस साकार शासन से है। इसमें क्या परिवर्तन किए जाने चाहिए जिससे जनता के कल्याण में उन्नति हो सके? स्वराज्य के प्रश्न का अर्थ वास्तव में यह है कि हमारे विषयों के ऊपर नियन्त्रण करने की शक्ति किसके हाथों में निहित हो ? मैं कह चुका हूँ कि हम अपरिवर्तनशील शासन या राजा को बदलना नहीं चाहते, अपितु हमारी मांग यह है कि हमारा शासन प्रबन्ध नौकरशाही के हाथों में नहीं रहना चाहिए, जैसा कि वह है, वरन् उसे हमारे हाथों में आना चाहिए। सारांश में स्वराज्य आन्दोलन का उद्देश्य यह है कि नियन्त्रण शक्ति लोगों में निहित होनी चाहिए।"
लोकमान्य तिलक की आज 165 वीं जयंती तथा अगले सप्ताह यानी 1अगस्त को उनकी 101वीं पुण्यतिथि पर यह संकल्प करना होगा कि भारत की नौजवान पीढ़ी को स्वतंत्रता आंदोलन में उनके अतुलनीय योगदान के बारे में शिक्षित करेंगे। आज भी मुंबई में सरदार गृह, जहां वे रहते थे, दुर्गति को प्राप्त है। रत्नागिरि के जिस भवन में उनका जन्म हुआ था, उसे संग्रहालय का सिर्फ नाम भर दिया गया है पर हालात दयनीय ही हैं। पुणे में बने तिलक म्यूजियम के उनके परिजन ही अपने स्तर पर चला रहे हैं। महाराष्ट्र व भारत सरकार द्वारा एक रुपए की राशि भी प्रदान नहीं की जाती है जबकि कुछ नेताओं के नाम पर बने राष्ट्रीय स्मारकों पर करोड़ों रुपए प्रतिवर्ष खर्च किए जाते हैं। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की विचारधारा, साहित्य, स्मारक आज भी गांधी नेहरु के प्रभुत्व में दबकर घुटन महसूस करते हुए यथोचित सम्मान पाने के लिए अनवरत प्रतीक्षा कर रहे हैं।