गुरु के प्रति असीम निष्ठा के कारण लहना बन गए अंगददेव

    दिनांक 24-जुलाई-2021   
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जिस शिष्य पर गुरु की कृपा होती है, वह भी आगे जाकर गुरु बन जाता है। इसके एक उदाहरण हैं सिखों के दूसरे गुरु अंगददेव जी। पहले उनका नाम लहना था। कहा जाता है कि गुरुनानक जी ने उनकी भक्ति और आध्यात्मिक योग्यता से प्रभावित होकर उन्हें अपना अंग माना और अंगद नाम दिया था।
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एक रात उसने स्वप्न में नानकदेव जी को देखा। इससे उसके मन में गुरु दर्शन की व्याकुलता उत्पन्न हो गयी। सुबह होते ही वह गुरु-आश्रम चलाने की तैयारी करने लगा। उन दिनों नमक के आवागमन पर प्रतिबंध था। अतः उसने डेढ़ मन नमक का प्रबंध किया और सिर पर लादकर गुरु-आश्रम को चल पड़ा। नानक का आश्रम उसके घर से सोलह कोस दूरी पर था। भादो का महीना, धूप निकलती तो सुई समान चुभती। बादल घिरते तो उमस बढ़ जाती। इसके बावजूद वह मंजिल की ओर बढ़ता चला जा रहा था। बीस वर्ष का यह नौजवान चार बजे अंधेरे घर से चला था, अब सूरज पश्चिम की ओट ले रहा था कि वह गुरु-आश्रम पहुंच गया। गुरुमाता को प्रणाम किया। गुरुमाता ने आशीर्वाद दिया। जब उसने गुरु के बारे में पूछा तो पता चला कि वे खेत पर हैं।
वह वहीं पुंच गया और उनका दर्शन कर कृतार्थ हो गया। उसकी आंखों में अगले आदेश की याचना उभर आयी। आदेश हुआ - खेत की घास उखाड़ने का। आदेशानुसार उसने घास उखाड़ी और उसके ढेर को सिर पर लादकर ले चला। कीचड़ युक्त गन्दा पानी उसके शरीर और कपड़ों को बदरंग बना रहा था। पर उसके सामने एक ही लक्ष्य था- गुरु की आज्ञा पालन करना। वह आश्रम पहुंचा। पीछे गुरुदेव भी पहुंचे। युवक की दशा देखकर गुरुमाता नानकदेव पर बरस पड़ीं, ‘‘यह मुंह अंधेरे घर से चला था। अब रात होने को आयी है। एक दाना न खाया, न एक बूंद पानी पिया। आपने इसकी क्या दुर्गति बनायी है? आपको दया नहीं आती इस पर?’’
शांत भाव से नानक मुस्कराये- ‘‘मैं तो इसका कीचड़ उतार रहा हूं।’’ इतना कहकर एक अन्य आदेश दे डाला- ‘‘मेरे कपड़े मैले हो गये हैं। जाओ इन्हें नदी से धो लाओ।’’ रात का समय, चारों ओर अंधकार, उस पर मन्द-मन्द होती बारिश। फिर भी गुरु भक्त युवक तुरन्त लेकर चल पड़ा। उसने एक-एक कपड़ा अच्छी तरह धोया और सूखने के लिए घास पर फैला दिये। न जाने कहां से सूर्य उदय हुआ और कुछ ही क्षणों में सारे कपड़े सूख गये। कपड़े समेट कर वह आश्रम पर आ गया।
गुरुनानक ने पूछा, ‘‘सूख गये कपड़े?’’
‘‘जी हां गुरुदेव!’’ कहकर उसने गुरु से सूर्य उग आने की सारी कहानी सुना दी। रहस्यमय मुस्कान बिखेरते हुए नानक बोले, ‘‘पागल तो नहीं हो गया तू, देख ले बाहर जाकर अभी अंधेरा है और बारिश हो रही है।’’ तब उस युवक के मन में प्रश्न कौंधा- यह तेरा गुरु निष्ठा का सूर्य था। सारी बात उसकी समझ में आ गयी। मन ही मन उसने गुरु को प्रणाम किया।
अभी परीक्षा शेष थी। अगले दिन गुरुदेव को जमींदार भक्त का निमंत्रण मिला। वे अपने दो पुत्रों और उस युवक को साथ ले चल पड़े। भोजन के पश्चात् जमींदार ने गुरुदेव को दो सोने के कटोरे भेंट किये। रास्ते में गुरुदेव ने वे दोनों कटोरे मलमूत्र भरे गड्ढे में फेंक दिये। इसके बाद उन्होंने पुत्रों की ओर देखा, ‘‘जा बेटे कटोरे निकाल ला’’ वे दोनों अचल रहे जैसे उन्होंने सुना ही नहीं। तब उन्होंने युवक की ओर देखा, ‘लहना अब तेरी बारी है।’
आदेश के साथ ही लहना उस गड्ढे में कूद पड़ा। मल-मूत्र से वह सन गया। लेकिन उसके मुख पर शिकन नहीं आयी। वह कटोरे लेकर गड्ढे से बाहर आया। स्वयं नहाया और उन कटोरों को रगड़-रगड़ कर साफ किया और कटोरे गुरुदेव के चरणों में लाकर रख दिये। गुरुदेव की आंखें खुशी से चमक रही थीं। उन्होंने कुछ कहा नहीं। रास्ते पर बढ़ते रहे। सभी चुपचाप थे, फिर भी वह गहरा मौन कुछ कहे जा रहा था।
उसी रात गुरुनानक ने झोपड़ी में सोये लहना को जगाया और अपने कक्ष में ले आये। उस पर अपना असीम वात्सल्य उड़ेलते हुए बोले, ‘‘अब यह शरीर जर्जर हो गया है, लहना। इसे छोड़ने से पहले मैं अपना समस्त योग बल तुम्हें दे रहा हूं।’’ इतना कह कर उन्होंने अपनी सारी आत्मशक्ति उस गुरुभक्त लहना को दे दी और समाधि में लीन हो गये। कालान्तर में यही लहना अंगददेव के नाम से पूजित और प्रतिष्ठित हुए।