पाकिस्‍तान चाहता है अफगानिस्‍तान में जो सरकार बने उसमें तालिबान शामिल हो

    दिनांक 25-जुलाई-2021   
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यूरोपीय थिंक टैंक का कहना है कि आज तालिबान जिस स्थिति में है, वह पाकिस्‍तान के समर्थन के बिना नहीं हो सकता। युद्धग्रस्‍त अफगानिस्‍तान से अमेरिका और नाटो के निकलने के बाद अफगान संघर्ष एक छद्म क्षेत्रीय संघर्ष के नए और घातक चरण में प्रवेश कर सकता है
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अफगानिस्‍तान में पाकिस्‍तान का मुख्‍य उद्देश्‍य एक ऐसी अंतरिम सरकार का गठन करना चाहता है, जिसमें तालिबान भी शामिल है। आज जो आतंकी समूह है, वह ऐसा नहीं होता। यह सब पाकिस्‍तान के लगातार सहयोग और समर्थन के कारण है। यूरोप के एक विचार समूह यूरोपियन फाउंडेशन फॉर साउथ एशियन स्‍टडीज (ईएफएसएएस) ये बातें कही हैं।
ईएफएसएएस की 'रीजनल पॉवर्स एंड पोस्ट-नाटो अफगानिस्तान' शीर्षक वाली रिपोर्ट को नाटो डिफेंस कॉलेज (एनडीसी) ने जारी किया है। इसमें द्वा कहा गया है कि "अमेरिका और नाटो की वापसी के बाद एक खतरा यह है कि अफगान संघर्ष एक छद्म क्षेत्रीय संघर्ष के नए और अधिक घातक चरण में प्रवेश कर सकता है। अमेरिका और नाटो के बाद क्षेत्रीय राज्य पहले से ही अफगानिस्तान में स्थानीय पावरब्रोकर और आतंकवादी गुटों का समर्थन करके प्रभाव हासिल करना चाह रहे हैं। अफगानिस्तान में पाकिस्तान का मुख्य उद्देश्य एक अंतरिम सरकार स्थापित करना है, जिसमें तालिबान भी शामिल रहे। हालांकि, इस्लामाबाद तालिबान शासन के खिलाफ है। तालिबान के वर्चस्व वाले या तालिबानी सैन्‍य शासन को पाकिस्‍तान कई कारणों से अपने राष्ट्रीय हितों के अनुकूल नहीं मानता है।"
तालिबान और हक्‍कानी नेटवर्क को खुला समर्थन
एनडीसी के इस अकादमिक शोधपत्र में कहा गया है कि "इस क्षेत्र में भारत की सैन्य श्रेष्ठता को चुनौती देने के लिए परदे के पीछे से आतंकियों के इस्‍तेमाल का पाकिस्‍तान का लंबा इतिहास रहा है, खासतौर से कश्मीर और अफगानिस्तान में। इसने 2001 के बाद भी तालिबान और हक्कानी नेटवर्क जैसे आतंकी गुटों को सहयोग और संबंध बनाए रखा ताकि अफगानिस्‍तान के नए नेताओं के भारत समर्थक रुख का मुकाबला कर सके।" साथ ही, शोधपत्र में पाकिस्‍तान के आरोपों का भी खंडन किया गया है कि भारत, पाकिस्‍तान विरोधी आतंकी समूहों को समर्थन करने के लिए अफगान क्षेत्र का इस्‍तेमाल कर रहा है। कहा गया है कि "भारत अभी तक अफगानिस्तान में पाकिस्तान के साथ सीधे छद्म युद्ध में शामिल नहीं हुआ है, बल्कि अफगान सरकार के साथ घनिष्ठ संबंधों को बढ़ावा दे रहा है।"
जिम्‍मेदारी से भाग नहीं सकता अमेरिका
वाशिंगटन विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र, सार्वजनिक नीति और शासन के प्रोफेसर माइकल ब्लेक ने 21 जुलाई को एक लेख में लिखा था। इसका शीर्षक था- ‘अमेरिका, अफगानिस्तान छोड़ने की नैतिक जिम्मेदारी से नहीं भाग सकता'। नाटो की वापसी के बाद मानवाधिकार उल्लंघन होने की संभावना है। इसके लिए पूरी तरह से अमेरिका जिम्‍मेदार है। ब्लेक का कहना है कि अमेरिका को "यह सुनिश्चित करने के लिए काम करना चाहिए कि वह भविष्य में नैतिक रूप से ऐसी दुखद स्थितियों में प्रवेश करने से बचेे। ब्लेक ने अमेरिका के लिए जो कुछ भी कहा वह नाटो पर भी समान रूप से लागू होता है। ईएफएसएएस थिंक टैंक ने कहा, "पिछली बार जब पाकिस्तान-तालिबान गठबंधन ने अफगानिस्तान पर अपना दबदबा कायम किया था, तो नाटो के लिए उसका अंत अच्छा नहीं रहा था। यही वजह है कि उसे वहां की जमीनी स्थिति का सही-सही आकलन करने और इसके निहितार्थों को दूर करने के लिए बहुत सावधानी बरतनी चाहिए।"
पाकिस्‍तान का तालिबान को समर्थन अफगान सरकार और सुरक्षाबलों के लिए घातक: थिंक टैंक
कनाडा स्थित एक थिंक टैंक ने कहा है कि अफगानिस्‍तान में संभावित पूर्ण कब्‍जे की ओर तालिबान के बढ़ते कदम से हालात बिगड़ते जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में आतंकी समूह को पाकिस्‍तान की ओर से कोई भी समर्थन अफगान सरकार और उसके सशस्‍त्र बलों के लिए हानिकारक होगा। इंटरनेशनल फोरम फॉर राइट्स एंड सिक्योरिटी (आईएफएफआरएएस) ने अपनी रिपोर्ट में अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान के दोमुंहेपन पर प्रकाश डाला है। इसमें कहा गया है कि दोनों देशों को अलग करने वाली सीमा डूरंड रेखा के दोनों ओर के कट्टरपंथी तत्व राजनीतिक खाद-पानी पर पल रहे हैं। इन्‍हें पाकिस्तानी अधिकारियों का मौन समर्थन हासिल है।
भय और निराशा से लोग हताश
थिंक टैंक का कहना है कि अफगानिस्तान पर शासन करने के पीछे तालिबान का मुख्य उद्देश्य एक अति-रूढ़िवादी इस्लामी शासन को बहाल करना है, जो भविष्‍य में उनके शासन को जारी रखना सुनिश्चित करेगा। आईएफएफआरएएस की रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन इलाकों में तालिबान ने कब्‍जा किया है, वहां प्रतिबंधों के बाद छिटपुट घटनाएं हुई हैं, जैसे- महिलाओं का सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करना, बड़ी संख्‍या में लोगों का देश से पलायन आदि। ऐसी घटनाएं पूरे देश में देखी जा रही हैं, जो भय और निराशा से भरे खतरनाक भविष्‍य की ओर संकेत करता है। इसके साथ, पाकिस्तान को दोमुंहापन दोहरापन जारी रखने के लिए एक अवसर मिल गया है। अफगानिस्तान के घरेलू मामलों में 'मदद' के बहाने देश में अपना वर्चस्‍व बनाने के लिए तालिबान के प्रमुख सहयोगी के रूप में काम करता है।
पाकिस्‍तान की करतूतेंं जानता है अमेरिका
आईएफएफआरएएस के अनुसार, अमेरिका भी पाकिस्‍तान के इस दोहरे चरित्र से वाकिफ है। वह जानता है कि समूचे अफगानिस्‍तान के हालात में पाकिस्‍तान की भूमिका संदिग्‍ध है। हाल ही में, अफगानिस्तान सुलह के लिए अमेरिका के उप विशेष प्रतिनिधि, थॉमस वेस्ट ने देखा कि पाकिस्‍तान सतही स्‍तर पर सक्रिय तौर पर मदद करने के बजाए दोष से बचने के लिए कहानी गढ़ने में अधिक रुचि रखता है और तालिबान से सीमित लाभी उठाने के अपने दावों का खंडन करता है।
7,000 से अधिक आतंकी लड़ाके भेजे
थिंक टैंक ने कहा कि पाकिस्‍तान प्रशासन चुपचाप सैकड़ों आतंकियों को अफगानिस्‍तान में भेज रहा है। अनुमान है कि करीब 7,200 पाकिस्‍तानी आतंकी अभी तालिबान के साथ लड़ रहे हैं। आईएफएफआरएएस ने जोर देकर कहा कि लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी पूर्वी अफगानिस्तान के कुनार और नंगरहार प्रांतों, हेलमंद व कंधार प्रांतों में सक्रिय हैं। इसके आवा, तहरीक-ए-तालिबान, लश्‍कर-ए-झांगवी, जमात-उल-अरहर, लश्कर-ए-इस्लाम और अल बद्र जैसे पाकिस्तान स्थित अन्य आतंकी समूहों के लड़ाकों को बड़ी संख्‍या में तालिबान के साथ लड़ते हुए देखा गया है। थिंक टैंक का दावा है कि पाकिस्‍तान के भीतर तालिबान आर्थिक समर्थन भी जुटा रहा है। पाकिस्तानी सरजमीं पर विशेष रूप से बलूचिस्तान में अफगान तालिबान द्वारा धन उगाही और भर्तियां की जा रही हैं। माना जाता है कि शीर्ष तालिबानी नेता बलूचि‍स्‍तान में हैं।