जल आंदोलन : बढ़ती प्यास, घटता पानी

    दिनांक 29-जुलाई-2021
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अमित त्यागी

हमारी जीवन शैली दो चक्रों पर आधारित है। एक चक्र है परम्परा, जिसमें आस्था-विश्वास रहता है। दूसरा चक्र है वैज्ञानिक सोच, जिसमें विकास रहता है। शायद हम विकास एवं विनाश की सही विभाजक रेखा का निर्धारण नहीं कर पा रहे हैं और यही वर्तमान समस्या का कारण है। हमें इन सभी दर्शनों में सामंजस्य बनाना है। बौद्धिकता तथा नैतिकता से तालमेल साधना है
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विश्व सागर में प्रकृति एक विशिष्ट आवरण एवं आकृति है, जो अपनी प्राकृतिक सुन्दरता, विभिन्नता एवं विषमता के रूप में यत्र-तत्र-सर्वत्र विद्यमान है। हम अपने चारों तरफ के विहंगम एवं विभिन्नता से परिपूर्ण दृश्यों को प्राकृतिक सौन्दर्य कहते हैं जो ब्रहम स्वरूप है, स्वत: व्याप्त है, जिसमें कृत्रिमता का कोई समावेश नहीं है। भूमण्डल में फैले मैदान, पठार, रेगिस्तान, चट्टान, हिमाच्छादित पर्वत, नदी-नाले, झील और जंगल आदि सभी प्रकृति का फैला हुआ साम्राज्य हैं। प्रकृति ने मानवता को जीवन की आवश्यकतानुसार अथाह प्राकृतिक संसाधन दिये हैं और उनका दोहन कर उपभोग करने का अधिकार भी। मनुष्य के बुद्धिजीवी प्राणी होने के कारण उसका यह अधिकार है कि वह प्रकृति के असीमित भण्डार का दोहन एवं उपभोग करे किन्तु उसका यह कर्तव्य भी है कि वह दोहन किए गए संसाधनों की भरपाई के लिए निरंतर प्रयास करता रहे। किन्तु मनुष्य ने ऐसा किया नहीं। संसाधनों का दोहन तो खूब हुआ किन्तु उनकी भरपाई नहीं की गई।

इसी कारण सम्पूर्ण विश्व में पर्यावरण की स्थिति बेहद असंतुलित होती जा रही है। पानी की समस्या इतनी गंभीर हो चुकी है कि बड़े-बड़े शहर जल की कमी के कारण डार्क जोन में पहुंच चुके हैं। अन्तराष्ट्रीय संस्था वर्ल्ड लाइफ फंड की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 100 शहर ऐसे हैं जिन्हें वर्ष 2050 तक जल संकट के गंभीर खतरे का सामना करना पड़ेगा। इन 100 शहरों में पचास शहर चीन के एवं 23 भारत के हैं। भारत के शहरों में पुणे, ठाणे, वडोदरा, राजकोट, कोटा, नासिक, जबलपुर, हुबली, धारवाड़, नागपुर, जालंधर, धनबाद, भोपाल, सूरत, दिल्ली, अलीगढ़, लखनऊ, कन्नूर, श्रीनगर, कोलकाता, मुंबई, कोझिकोड, विशाखापट्टनम चिन्हित किए गए हैं जो डार्क जोन में हैं। 2050 तक इन शहरों को कई खतरों का सामना करना पड़ेगा जिनमे जल की कमी,बाढ़ और प्रदूषण मुख्य हैं।

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व्यर्थ जा रहा है वर्षा जल
भारत में हर वर्ष 4,000 घन किमी पानी बरसता है, किंतु इसमें उपयोग के लायक सिर्फ 1140 घनकिमी जल ही है। इसमें 690 घन किमी सतही जल व 450 घन किमी भूजल है। नलकूपों की बेतहाशा वृद्धि से भूजल स्रोत पर दबाव बढा है। अत्यधिक भूजल दोहन से पृथ्वी की कोख में उपलब्ध यह संसाधन खत्म होने के कगार पर है। यदि आंकड़ों की बात करें तो देश के 5,723 खण्डों में से 4,078 सुरक्षित कहे जा सकते हैं। 839 अतिदोहित की श्रेणी में आ चुके हैं। सबसे ज्यादा खराब स्थिति राजस्थान की है जहां भूजल विकास की स्थिति 1984 में 35 प्रतिशत के आसपास थी जो 2008 तक बढ़कर 137 प्रतिशत तक हो गई। प्रदेश के 237 खण्डों में से मात्र 30 ही सुरक्षित कहे जा सकते हैं। 164 खंड अतिदोहित की श्रेणी में आ चुके हैं। पूरे देश में कृषि व उद्योग में भी भूजल का अत्यधिक उपयोग होने से भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। इससे भूजल गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है। जल संकट को देखते हुए जल संरक्षण के साथ-साथ इसमें आमजन की भागीदारी भी आवश्यक हो गई है। भारत की 40 मिलियन हेक्टेयर जमीन बाढ़ प्रभावित है, वहीं दूसरी ओर कुल 68 प्रतिशत क्षेत्र सूखा प्रभावित है। जल दोहन की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने तथा जल प्रबन्ध को प्राथमिकता देकर भविष्य के लिए जल को सहेज कर रखना आवश्यक हो गया है। इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने परंपरागत जल स्रोतों की सुधि लें और उन्हें पुनर्जीवित करें।

उद्योगीकरण से चौपट पर्यावरणीय संतुलन
भारत में जब हरित क्रांति की शुरुआत हुई थी, उस समय रासायनिक खाद और कीटनाशकों के प्रयोग से उत्पादन बढ़ाना समय की मांग थी। कुछ समय के बाद इस बात का आभास होने लगा कि जिन रसायनों को हम लाभकारी मान रहे हैं, वे भूमिगत जल का अनावश्यक दोहन कर रहे हैं। सामान्य से दस गुना से ज्यादा पानी की खपत करा रहे हैं। यह ठीक उसी तरह है जैसे हम जब एलोपैथिक दवा खाते हैं तो प्यास ज्यादा लगती है। इसके साथ ही ये रसायन जमीन की उर्वरा शक्ति को भी बांझ बना रहे हैं। जब से कृषि का मशीनीकरण प्रारम्भ हुआ, तब से बैलों से खेत जोतने के स्थान पर ट्रैक्टर से खेतों की जुताई प्रारम्भ हो गई। लोगों ने बैल रखने बंद कर दिए। बैल कम होने का प्रभाव गायों के पालन पर पड़ा। गोवंश आधारित खेती से ध्यान हटने के कारण इन पशुओं की कटान बढ़ गई। मांसाहार की प्रवृत्ति बढ़ी, विचारों में आक्रामकता बढ़ी, झगड़े-फसाद बढ़े। यानी कि सम्पूर्ण पर्यावरणीय चक्र दूषित हो गया। जो गाय, गंगा और गांव भारतीय सभ्यता का आधार रहे थे, वह चौपट हो गया। इससे व्यवस्था का केंद्र बिन्दु जलचक्र प्रभावित होता चला गया।

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परंपरागत कृषि बनाम भूजल दोहन
गाय, गंगा और गांव भारत की संस्कृति का आधार रहे हैं। जैसे-जैसे हमने विकास के नाम पर इन तीनों को दरकिनार करना शुरू किया, हमारा पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ गया। हर चीज में मुनाफा देखने वाली पाश्चात्य संस्कृति ने मुनाफे के खेल में भारतीय संस्कृति पर सीधा हमला किया। हर उस चीज को निशाना बनाया, जिससे उनके मुनाफे को नुकसान हो सकता था। गाय का पर्यावरण संतुलन में बड़ा योगदान है। गाय के पूजनीय पशु होने के पीछे कई वैज्ञानिक कारण निहित हैं। गाय को देवी मानने वाले देश का बीफ निर्यात में पहले नंबर पर होना पर्यावरण असंतुलन का प्रथम आधार बना। गाय के गोबर एवं गोमूत्र में असंख्य जीवाणु होते हैं। गोमूत्र एवं गोबर आधारित खेती में जल की आवश्यकता बहुत कम होती है। भारत के परिवेश में सिर्फ वर्षा जल ही खेती के लिए पर्याप्त होता रहा है। जब रसायनों का प्रयोग शुरू हुआ, तब पानी की ज्यादा जरूरत महसूस हुई। इसकी पूर्ति के लिए हमने भूजल निर्गत किया। आज रसायनों के इस्तेमाल के बाद से भूमिगत जल समाप्ति की ओर है।

जल की अंतिम परत पर हैं हम
जमीन के अंदर तीन परतों में पानी पाया जाता है। प्रथम और द्वितीय परतों का पानी हम खत्म कर चुके हैं। इस समय हम तीसरी परत का पानी पी रहे हैं। इसको ऐसे समझा जा सकता है कि आज से तीस साल पहले 10-20 फुट पर पानी मिल जाता था। तब हम पहली परत का पानी पीते थे। उसके बाद 60-80 फुट पर पानी मिलने लगा। वह दूसरी परत का पानी था। वर्तमान में 100 फुट से नीचे जाकर पानी की बोरिंग होती है। यह तीसरी परत का पानी है। यह अंतिम परत है जिसके 2030 के बाद खत्म होने की संभावना है। भारत के नौ राज्यों में भूजल का स्तर खत्म होने की खतरनाक स्थिति पर है। उपलब्ध जल का नब्बे प्रतिशत इस्तेमाल हो चुका है। सरकारी आंकड़े को देखें तो 1947 में भारत के प्रति व्यक्ति के पास जल उपलब्धता 6042 घन मीटर थी। 2011 में यह घटकर 1545 घन मीटर रह गई है। भारत में सिंचाई में 80 प्रतिशत हिस्सा नदी, नहरों और भूजल से पूरा होता है। बाकी 20 प्रतिशत में वर्षा जल, तालाब जल एवं अन्य उपलब्ध संसाधन हैं। 

कॉर्पोरेट संस्कृति का दुष्प्रभाव
जैसे-जैसे देश में कॉर्पोरेट संस्कृति का बढ़ना शुरू हुआ, वैसे-वैसे शहरीकरण प्रारम्भ हुआ। एक ओर रसायनों ने जल स्तर को नीचे किया तो उद्योगीकरण ने ग्लोबल वार्मिंग कर दी। वर्षा चक्र अनियमित हो गया। हमने प्राकृतिक खेती को क्या छोड़ा, प्रकृति ने हमारा साथ छोड़ दिया। जल स्रोत कम होते रहने के कारण गरीब किसान शहरों की तरफ रोजगार की तलाश में पलायन कर गया। ग्रामीण जनसंख्या का पलायन शहरों की तरफ हुआ। इससे धीरे-धीरे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों का संतुलन चरमराने लगा। पिछले सात दशक में ग्रामीण शहरों की तरफ आकर्षित हुए। यह औसत अब लगभग दुगुना होने के कगार पर है। पिछले 70 साल के जनसंख्या औसत की तुलना करें तो 1951 में शहरों में रहने वाली जनसंख्या 17.3 प्रतिशत थी। 2011 में यह औसत 31.16 प्रतिशत  तक पहुंच गया। अमेरिका एवं पश्चिम यूरोप के देशों में शहरी जनसंख्या अब गांव का रुख कर रही है, वहीं भारत में इसका उलटा हो रहा है। ग्लोबल मैनेजमेंट कंसल्टेंसी फर्म मेकंजी की रिपोर्ट के अनुसार 2015 से 2025 के बीच के दशक में विकसित देशों के 18 प्रतिशत  बड़े शहरों में आबादी प्रतिवर्ष 0.5 प्रतिशत  की दर से कम होने जा रही है। पूरी दुनिया में 8 प्रतिशत  शहरों में प्रतिवर्ष 1-1.5 प्रतिशत  शहरी जनसख्या के कम होने का रुझान होना संभावित है।

पेड़ लगाओ, जमानत पाओ वाले एसडीएम मांगेराम 

प्रकृति संरक्षण के कार्य को प्रशासनिक स्तर पर भी किया जा सकता है इसका उदाहरण पेश किया है उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में तैनात एसडीएम मांगे राम चौहान ने। उन्होंने वृक्षारोपण का अनूठा तरीका निकाला है। जब भी कोई आरोपी उनकी अदालत में आता है तब वे जमानत देते समय आरोपी से पांच पेड़ एवं गवाहों से एक-एक पेड़ लगवाते हैं। लेखपाल के माध्यम से उन पेड़ों की जियो मैपिंग करवाते हैं। इससे पेड़ लगाने के बाद भी उनका पोषण सरकारी मशीनरी द्वारा होता रहता है। इसके साथ ही वे पर्यावरण शपथ भी दिलवाते हैं। उनके आॅफिस के बाहर पर्यावरण शपथ लिखी हुई है। जब भी कोई उनसे मिलने आता है तो उसे पहले पर्यावरण शपथ दिलवायी जाती है। मांगेराम के इस कार्य से क्षेत्र के युवा भी प्रेरित हो रहे हैं। कोरोना लॉकडाउन में जब क्षेत्र के युवा घर पर ही थे तो उन्होंने मांगेराम की प्रेरणा से हजारों वृक्ष लगा दिये।
इसी तरह का एक अनूठा व्यक्तित्व है मध्य प्रदेश कैडर के आईएएस उमाकांत उमराव जो अब तक 10,000 से ज्यादा तालाब सरकारी स्तर पर खुदवा चुके हैं। भारत की नौकरशाही में ऐसे ही लोगों की आवश्यकता है जो पर्यावरण संरक्षण का कार्य मौजूदा नियमों के अंतर्गत ही करने की क्षमता रखते हों।


शहरीकरण से घटा जल स्तर
शहरी क्षेत्रों में बढ़ी आबादी एवं उद्योगों के कारण भारी मात्रा में जल प्रदूषित हुआ। जो जल शेष रहा, वह भारी जनसंख्या बोझ के कारण अपर्याप्त रहा। अमीरी और गरीबी की खाई बढ़ती चली गई। 1990 में असमानता का इंडेक्स 45.18 था, जो 2013 आते-आते बढ़कर 51.36 हो गया। सामाजिक विद्रूपता में हमने कृषि भूमि को विकास के नाम पर पहले अधिग्रहित किया, फिर उस पर बड़ी-बड़ी बिल्डिंग बनाकर उसे विकास का नाम दिया। रियल इस्टेट को औद्योगिक विकास का माध्यम एवं उद्योगों का पर्याय बना दिया गया। इसमें हमने बड़े-बड़े बोरिंग से पानी निकालकर जमीन को खाली करना शुरू कर दिया। योजनाओं को संस्थागत रूप देने के लिए औद्योगिक विकास प्राधिकरणों का गठन किया गया। रसायनों के इस्तेमाल एवं विकास के नाम पर हम भूमिगत जल का लगातार दोहन करते रहे। हमने जितने जल का दोहन किया, उतना जल भूमि में वापस नहीं पहुंचाया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि पर्यावरण असंतुलित होता चला गया। जल स्तर के नीचा होने से घरेलू और कॉपोर्रेट के जल की आपूर्ति तो निर्बाध हुई, जंगल और जानवरों के लिए जल की किल्लत ने पर्यावरण को प्रभावित कर दिया।

प्रकृति संरक्षण का समाधान

इस समस्या के समाधान के क्रम में कुछ छोटी-छोटी बातें महत्वपूर्ण हैं। हम रसायनों के इस्तेमाल को धीरे-धीरे कम करते हुए परंपरागत कृषि की तरफ बढ़ें। इससे जल का दोहन कम होगा। भूमि में वापस जल स्रोतों को भरने के लिए तालाबों को प्रोत्साहित करें। शहरी और ग्रामीण इलाकों में जिन तालाबों पर लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है, उन्हें खाली कराकर उसमें वर्षा जल संचय सुनिश्चित किया जाए। वर्षा जल को तालाबों में संरक्षित करके उसका न सिर्फ कृषि में उपयोग करें बल्कि उसके द्वारा भूमि में वापस जल भंडारण को सुनिश्चित करें। अधिक से अधिक पौधरोपण करें। तुलसी, पीपल, नीम जैसे वृक्षों का ज्यादा से ज्यादा रोपण करें। यह अन्य की तुलना में ज्यादा औषधीय गुण रखते हैं। पर्यावरण में आॅक्सीजन की मात्रा को नियंत्रित करते हैं। जैसे लोग कर्तव्य पारायण होते हैं, वैसे ही हमें स्वयं को प्रकृति-पारायण बनाने पर विचार केन्द्रित करना चाहिए। जैसे-जैसे हम उत्पत्ति के स्रोत को स्वीकृति एवं सम्मान देते हैं, भावनाएं एवं ब्रह्माण्ड की शक्तियां आशीर्वाद के रूप में प्राकृतिक संपदाओं से फलीभूत करने लगती हैं। यह एक प्रकार का प्राकृतिक चक्र है जो यदि नियंत्रित है तो सर्वत्र खुशहाली है और अगर एक बार यह अनियंत्रित हो गया तो इसके भयावह परिणाम की कल्पना आसान नहीं है। प्रकृति अपने साथ हुई क्रूरता का बदला क्रूरतम तरीके से लेती है। कंक्रीट के जंगलों मे रहने वाले हम लोगों की भावनाएं भी कंक्रीट हो गई हैं। किन्तु आज भी कुछ ऐसे लोग समाज में मौजूद हैं जिनके सत्कर्म के कारण प्राकृतिक संतुलन बरकरार है।    
    (लेखक सामाजिक चिंतक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)