हिंदुत्व के सत्यान्वेषण के उद्घोषक स्वामी विवेकानंद

    दिनांक 04-जुलाई-2021
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डॉ. अरविंद कुमार शुक्ल
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सन 1993 में एक अमेरिकी राजनीतिक, वैज्ञानिक सलाहकार और शिक्षाशास्त्री सैमुअल फिलिप्स हटिंगटन ने "सभ्यताओं का संघर्ष "(क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन) के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उन से 100 वर्ष पूर्व एक भारतीय संन्यासी स्वामी विवेकानंद अमेरिका की ही धरती शिकागो के कम्युनिटी हॉल में, भाइयों एवं बहनों के स्नेह पूर्ण संबोधन के साथ और ओजस्वी वाणी में कहते हैं कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया। हम केवल सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं करते हैं, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं, जिसने सभी धर्मों और सभी सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी। मुझे गर्व है कि हमने अपने दिल में इज्राएल की वह पवित्र यादें सजीव रखी हैं जिनमें उनके पवित्र स्थलों को रोमन हमलावरों ने तहस-नहस कर दिया था और उन्होंने भारत में शरण ली। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ, जिसने पारसी मत के लोगों को शरण दी।

और अंत में यह संन्यासी कहता है कि यह शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से, और मनुष्यों के बीच की सभी दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।

आज 4 जुलाई को इसी संन्यासी स्वामी विवेकानंद जी के पुण्यस्मरण का अवसर है। उनके कार्यों को तीन शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है - विचार, प्रचार और संचार।

सर्वप्रथम स्वामी विवेकानंद जी हिंदू धर्म पर सम्यक् विचार करते हैं, उसके सिद्धांतों पर विचार करते हैं, तार्किक विचार करते हैं और विज्ञान और प्रायोगिकता के स्तर पर विचार करते हैं। तब हिंदुत्व और वेदांत का डिम डिम घोष करते हैं। हिंदू धर्म के विरुद्ध फैलाए जाने वाले मतिभ्रम को तोड़ते हुए कहते हैं कि यह ऋषि कौन थे? वात्स्यायन कहते हैं, जिसने यथाविहित धर्म की प्रत्यक्ष अनुभूति की है, केवल वही ऋषि हो सकता है, वह जन्म से म्लेच्छ ही क्यों ना हो। इसीलिए जारजपुत्र वशिष्ठ, धीवरतनय व्यास, दासी पुत्र नारद प्रभृति ऋषि कहलाते थे।

वे कहते हैं कि सच्ची बात यह है कि सत्य का साक्षात्कार हो जाने पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं रह जाता।

वेदों के संदर्भ में संकीर्ण विचारों का खंडन इस उल्लेख के साथ करते हैं

"यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः।

ब्रह्माराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वीय चारणाय।

वे वेद विरोधियों को ललकारते हैं कि "वेद में ऐसा कोई प्रमाण दिखला सकते हो, जिससे यह सिद्ध हो जाए कि वेद में सब का अधिकार नहीं है। पुराणों में इस तरह की बातें हैं, किंतु वेद स्वामी है, पुराण अनुचर तो क्या अनुचर स्वामी को आज्ञा दे सकता है।"

वे शुभ स्वप्न का आह्वान करते हुए कहते हैं कि मैं वह दिन देखना चाहता हूं जब प्रत्येक घर में गृह देवता शालिग्राम के समक्ष स्त्रियां वेद-अर्चना करें। वे कहते हैं कि अवतारवाद का वास्तविक अर्थ है मनुष्य पूजा हिंदू धर्म दीन दलितों के सेवा का संदेश है। वह हिंदू धर्म में नवजीवन के संचार के लिए सभी प्रकार के जड़ता और दुराग्रह को छोड़कर, हिंदू धर्म को संगठित करने का आह्वान करते हैं "ब्राह्मणों को जन्मोत्सव तथा वंशगत अभिमान छोड़ना होगा, म्लेच्छ शासन के लंबे काल के कारण ब्राह्मणत्व निष्प्राण हो गया है, अतः तुम्हें अग्नि परीक्षा देकर उसे प्रमाणित करना होगा। पददलित जनता को उसके अधिकार देकर गले लगा कर साथ-साथ चलने का बल देना है।

वे कहते हैं की तुम्हारा धर्म क्या केवल छुओ मत! छुओ मत!! मात्र रह गया है।

कर्मकांड को विश्राम दो और ज्ञान कांड का मार्ग प्रशस्त करो।

स्वामी विवेकानंद जी केवल विचार और नवजीवन का संचार ही नहीं करते हैं बल्कि संपूर्ण भारत और विश्व में वेदांत और हिंदुत्व का प्रचार करते हैं। कोलंबो में वे कहते हैं – हां! भारतीय प्रचार की अपनी विशेषता है, इस विषय में मैं पहले भी संकेत कर चुका हूँहमने कभी बंदूक या तलवार के सहारे अपने विचारों का प्रचार नहीं किया।

जाफना में वे कहते हैं केवल वेदांत में ही वह तत्व है जिससे सारे संसार के भाव जगत में क्रांति होगी और भौतिक जगत के ज्ञान के साथ धर्म का सामंजस्य स्थापित होगा। रामनाद में जन समूह को संबोधित करते हुए वे कहते हैं कि हमारी इस पवित्र मातृभूमि का मेरुदंड, मूल भित्ति या जीवन केंद्र एकमात्र धर्म ही है। हजारों वर्ष के वैदेशिक शासन और अत्याचार के बाद भी यह राष्ट्र जीवित है तो इस जीवित रहने का मुख्य प्रयोजन है ईश्वर धर्म और अध्यात्म का परित्याग ना करना।

वे पूरे भारत का भ्रमण करते हैं तथा धर्म और अध्यात्म के वास्तविक मूल्य का प्रचार कर जनजीवन में आई हुई सुषुप्ति को तोड़ नवजागरण की धारा का भगीरथ प्रयास करते हैं। वह भारत में बंगाल के अलावा आसाम, उत्तर प्रदेश, बिहार, मुंबई, मद्रास, रामेश्वरम से लेकर कन्याकुमारी तक व्याख्यान और धार्मिक प्रवचन के माध्यम से हिंदू जनमानस में व्याप्त कुंठा को तोड़ भारतीय राष्ट्रवाद की स्थापना करते हैं। साहस भरते हुए कहते हैं "उत्तिष्ठत जागृत प्राप्यवरान्निबोधत्।

भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म के मूल्यों का प्रचार संयुक्त राज्य अमेरिका के अलावा इंग्लैंड, जापान, चीन, कनाडा, मिस्र, ग्रीस, हंगरी, नेपाल, कस्तूरिया, इटली के विभिन्न नगरों में अपने विभिन्न प्रवासियों के माध्यम से करते हैं। हिंदू धर्म की पताका को पूरे विश्व में स्थापित करने हेतु इस महामानव को युगों-युगों तक याद किया जाएगा। रामकृष्ण मिशन की स्थापना कर वे न केवल आध्यात्मिक और धार्मिक चेतना का जागरण करने का माननीय कार्य करते हैं बल्कि सेवा परमो धर्म के सिद्धांत को प्रायोगिक स्वरूप में स्थापित करते हैं।

विवेकानंद जी की दृष्टि पर हिंदुत्व ही राष्ट्रवाद की आधार भूमि है। वे कहते हैं "तुम्हारे पूर्वजों ने धर्म की रक्षा के लिए सब कुछ पूर्वक सहन किया था, मृत्यु को भी उन्होंने हृदय से लगाया था। विदेशी विजेताओं द्वारा मंदिर के बाद मंदिर तोड़े गए परंतु उस बाढ़ के बह जाने में देर नहीं हुई कि मंदिर के कलश फिर खड़े हो गए। गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर तुम्हें विपुल ज्ञान प्रदान करेंगे, वे जाति के इतिहास के भीतर वह गहरी अंतर्दृष्टि देंगे जो ढेरों पुस्तकों से भी नहीं मिल सकती। देखो कि किस तरह यह मंदिर सैकड़ों आक्रमणों और सैकड़ों पुनरुत्थानों के चिन्ह धारण किए हुए हैं। यह बार-बार नष्ट हुए और बार-बार ध्वंसावशेष से उठकर नया जीवन प्राप्त करते हुए, अब पहले ही की तरह अटल भाव से खड़े हैं। इसलिए इस धर्म में ही हमारे राष्ट्र का मन है, हमारे राष्ट्र का जीवन प्रवाह है। इनका अनुसरण करोगे तो यह तुम्हें गौरव की ओर ले जाएगा, इसे छोड़ोगे तो मृत्यु निश्चित है।

4 जुलाई सन् 1902 को इस महान सन्यासी ने बेलूर मठ में महासमाधि ले ली।