विदेशी प्रभाव का मारा भारतीय मीडिया

    दिनांक 06-जुलाई-2021
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मीडिया से सोची-समझी साजिश के तहत भारत से जुड़ी घटनाएं सिरे से गायब

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भारतीय मीडिया पर चीन का प्रभाव किसी से छिपा नहीं है। कोरोना महामारी और लद्दाख में चीन के साथ सैनिक संघर्ष में भारतीय मीडिया के एक वर्ग ने खुलेआम चीन के पक्ष को प्रचारित किया और उनके समर्थन में लेख लिखे। और अब बीते सप्ताह कई अंग्रेजी अखबारों ने बड़े ही जोर-शोर से चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 100वीं वर्षगाँठ मनाई। 'द हिंदू' ने चीन की वामपंथी पार्टी के प्रचार में न सिर्फ़ प्रायोजित परिशिष्ट निकाले, बल्कि संपादकीय लेख भी छापे। इसी प्रकार टाइम्स आॅफ इंडिया और कुछ अन्य समाचार संस्थानों ने भी बड़े-बड़े लेख छापे, जिनका उद्देश्य यह बताना था कि कैसे वामपंथी विचारधारा चीन को विकास के रास्ते पर लेकर चल रही है। इन सभी में भारत के प्रति चीन सरकार के शत्रुतापूर्ण व्यवहार की कहीं कोई बात नहीं की गई। जिस चीन की फैलाई महामारी से पूरा विश्व अभी तक कराह रहा है, उसकी अलोकतांत्रिक सरकार का भारतीय मीडिया में ऐसा महिमामंडन चिंता की बात है। निश्चित रूप से इन अखबारों ने पैसे लेकर ये विज्ञापन और लेख प्रकाशित किए होंगे।

चीन और उसकी वामपंथी सरकार के प्रति इस प्रेम के बीच जब मुख्यधारा के कुछ समाचार पत्र बड़ी ही योजना के साथ भारतीय धर्म और संस्कृति को निशाना बनाते हैं तो समझ में आता है कि वास्तविक समस्या क्या है। हिंदुस्तान टाइम्स ने छापा कि मंदिरों में महिलाएँ पुजारी नहीं होतीं, इसका मतलब हिंदू धर्म पितृसत्तावादी है। जबकि तथ्य यह है कि कई मंदिरों में महिलाएँ ही पूजा-पाठ कराती हैं। जबकि इस्लाम और ईसाई मजहब में अपवाद स्वरूप भी कोई महिला मौलवी या पादरी नहीं मिलती। लेकिन उन पर कोई टिप्पणी नहीं की जाती। टाइम्स आॅफ इंडिया ने महिलाओं के अधिकार से जुड़ी स्त्रीधन की परंपरा पर हमला किया। संपादकीय पृष्ठ पर छपे लेख में स्त्रीधन को दहेज बताने का प्रयास किया, जबकि यह अधिकार है जो मात्र हिंदू समाज अपनी स्त्रियों को देता है।

आए दिन धर्मगुरुओं पर अभद्र टीका-टिप्पणियों से लेकर मिथ्या समाचार फैलाने तक ढेरों उदाहरण मिल जाते हैं। धीरे-धीरे यह रोग विदेशी मीडिया में भी फैल रहा है। उत्तर प्रदेश के मुजफ़्फरनगर में तीसरी शादी करने जा रहे एक मौलवी की बीबी ने चाकू से उसका गुप्तांग काट दिया। अमेरिकी समाचार पत्र न्यूयॉर्क पोस्ट की वेबसाइट ने इसके लिए एक हिंदू साधु की फोटो लगाई। यह कुछ वैसा ही है जैसा भारतीय मीडिया संस्थान आए दिन करते रहते हैं। भारतीय चैनल और अखबार मदरसे में यौन शोषण के समाचारों में मौलवी को साधु और मदरसे को वेद पाठशाला बताते रहे हैं। न तो भारतीय मीडिया यह काम अनजाने में करता था, न ही विदेशी मीडिया को पता है कि मौलवी और साधु में क्या अंतर होता है?
बंगाल में जारी राजनीतिक हिंसा के समाचार दिल्ली के मीडिया से गायब हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का दल वहाँ दौरे पर गया तो उस पर भी हमला हुआ। टाइम्स आॅफ इंडिया ने इसके बजाय तृणमूल कांग्रेस के इस आरोप को समाचार बनाया कि राज्यपाल जगदीप धनखड़ भ्रष्टाचारी हैं। बंगाल हिंसा पर चल रही न्यायिक सुनवाई की रिर्पोटिंग भी अधिकांश चैनलों और अखबारों से लापता है। अपराध की सामान्य घटनाओं में भी जाति का कोण ढूँढ लेने वाला मुख्यधारा मीडिया अभी तक यह पता नहीं कर पाया है कि बंगाल हिंसा का शिकार किस वर्ग के लोग हो रहे हैं।

बीबीसी की इस्लामी आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति जगजाहिर है। पुलवामा में हुए एक हमले के समाचार में बीबीसी ने चरमपंथी शब्द का प्रयोग किया। लंदन में होने वाले किसी सामान्य चाकू हमले को भी बीबीसी एक मिनट में आतंकवादी हमला घोषित कर देता है। भारत के लिए उसकी पत्रकारिता के मानदंड अलग हैं। पिछले सप्ताह बीबीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में भारत के नक़्शे से पूरे जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को गायब कर दिया था। इस सप्ताह यह काम ट्विटर ने किया। उधर, दिल्ली सरकार के विज्ञापनों की नई खेप मीडिया संस्थानों तक पहुँच गई है। कोरोना काल में आॅक्सीजन संकट पर सर्वोच्च न्यायालय की समिति की रिपोर्ट का समाचार जितनी तेजी से आया था उतनी ही तेजी से गायब भी हो गया। दिल्ली का पूरा मीडिया इस रिपोर्ट के विश्लेषण के बजाय केजरीवाल सरकार के बचाव में कूद पड़ा। अब मीडिया का सारा ध्यान यह बताने पर है कि पंजाब में आगामी विधानसभा चुनावों के लिए आम आदमी पार्टी क्या-क्या मुफ़्त में देने का वादा कर रही है। ल्ल