चीन : तिब्बती युवाओं की चीनी सेना में भर्ती विवशता या षड्यंत्र!

    दिनांक 07-जुलाई-2021   
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चीन ने तिब्बत पर जबरिया कब्जा किया था जिसे तिब्बत के लोग 70 वर्ष बाद भी भूल नहीं पाए हैं। चीनी युवाओं में सेना के प्रति आकर्षण नहीं रह जाने के कारण चीन ने अब तिब्बती युवाओं को पीएलए में भर्ती करने का अभियान चलाया है, परंतु 20 लाख से ज्यादा की सेना में मात्र 3-4 हजार तिब्बती युवकों की मौजूदगी बताती है कि चीन तिब्बतियों को प्रलोभन देकर भी  भरमा नहीं पा रहा
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7 अक्तूबर, 1950 को चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने जिनसा नदी को पार कर तिब्बत पर चीनी आक्रमण का की शुरुआत। लगभग 14 दिन चली इस आक्रामक कार्रवाई में, जिसमें ‘चमडो की लड़ाई’ अत्यंत महत्वपूर्ण थी, तिब्बत की पराजय हुई और उस पर चीन के आधिपत्य का दौर शुरू हुआ। यह साम्राज्यवाद के विरोध में प्रारंभ हुए ‘लॉन्ग मार्च’ की प्रथम परिणति थी, और तब से आज तक विश्व इसके दुष्प्रभावों को भोगता आ रहा है। चीन की सेना इस क्षेत्र में आक्रामक की भूमिका में थी जो तिब्बतियों की न केवल राजनैतिक सत्ता के विनाश बल्कि उनके धर्म और संस्कृति को भी समूल नष्ट करने के लिए कटिबद्ध थी। इसने उनके परमप्रिय दलाई लामा को स्वदेश छोड़ने के लिए विवश किया और पंचेन लामा के साथ क्या हुआ, आज तक अज्ञात ही है।

इस सबने चीन के शासकों और विशेषकर सेना के प्रति तिब्बत की जनता में घृणा के गहरे भावों को जन्म दिया। परन्तु आज उसी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी में तिब्बती युवकों का भर्ती  होना, चौंकाता है। ‘चाइना तिब्बत न्यूज’ वेबसाइट के अनुसार, कई युवा तिब्बतियों ने 2021 की पहली छमाही में चीनी सेना में भर्ती के लिए आवेदन किया था। चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के लिए यह कोविड -19 आपदा के बाद से पहला भर्ती अभ्यास था। ज्ञातव्य है कि सामान्यत: चीन में सेना के लिए वर्ष में दो बार भर्तियां आयोजित की जाती हैं। उल्लेखनीय है कि विगत वर्षों में चीन पीएलए में तिब्बतियों की भर्ती के लिए लगातार  कड़ी मेहनत कर रहा है, और इसमें शामिल होने के लिए तिब्बती युवाओं को बड़े प्रलोभन दिए जा रहे हैं।

आखिर वजह क्या है?
पीएलए इस समय गहन तनावों से जूझ रही है। संख्या की दृष्टि से यह विश्व की सबसे बड़ी सेना है और जहां इसके गहरे सामरिक और राजनैतिक प्रभाव हैं, वहीं भारी आर्थिक दायित्व भी हैं और चीन विपरीत आर्थिक परिस्थितियों के चलते सेना में जो परिवर्तन कर रहा है, वह इसकी कार्यक्षमता को बुरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं। पिछले वर्ष भारत के साथ लद्दाख में हुए संघर्ष में चीन शायद अपनी इस कमजोरी को भांप चुका है,  जहां चीनी सैनिकों का प्रदर्शन, राजनैतिक और सैन्य नेतृत्व के लिए चिंता का कारण रहा।

एक ओर चीन में आर्थिक दुश्वारियों से निबटने के लिए किए गए उपायों के क्रम में सेना में औसत सेवा अवधि में कमी आई है जिसने सैनिकों को कार्य अनुभव जुटाने के अवसरों से वंचित कर दिया, जिसके द्वारा एक सैनिक और अधिकारी विपरीत परिस्थितियों में लड़ने और अपना मनोबल बनाए रख पाने में सक्षम हो पाते थे। चीन की सेना में मुख्यत: इसके पूर्वी क्षेत्रों, जिनमें से कई क्षेत्र समुद्रतटवर्ती हैं, से सैनिक भर्ती किये जाते हैं और इनमें स्वाभाविक रूप से ऊंचाई वाले इलाकों में स्थित तनाव के क्षेत्रों में प्राकृतिक दबावों का सामना कर पाना अत्यंत कठिन हो जाता है। जैसे चीनी सैनिकों में इस ऊंचाई पर आॅक्सीजन की कमी से पीड़ित होना एक सामान्य सी परेशानी है जो उनकी कार्य क्षमता को प्रभावित करती है।

चीन में सेना में शामिल होना सम्मानजनक नहीं
इसके साथ चीन में सेना में शामिल होना एक सम्मानजनक पेशा नहीं रह गया है। पिछले दो दशकों में, अर्थात् 1980 के दशक की शुरुआत से सन् 2000 के दशक के प्रारंभ तक, पीएलए ने आम तौर पर अपने कर्मचारियों के वेतन भत्तों में वृद्धि करने में जो उत्साहहीनता दिखाई है, उसी का परिणाम है कि नागरिक अर्थव्यवस्था की तुलना में आज सेना में काम करने वालों को बहुत कम लाभ प्राप्त हो रहे हैं। इसने न केवल पीएलए के लिए भर्ती और प्रतिधारण में उस अर्थव्यवस्था के साथ प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल बना दिया, बल्कि सेना के भीतर भ्रष्टाचार के प्रसार और कानून के शासन की कमी जैसे अन्य कारकों ने सेना की सेवा को बेहद अनाकर्षक रूप दे दिया है।

लॉन्ग मार्च के समय के माओ के जोशीले नारे अब अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं और चीन के युवाओं में साम्यवाद के प्रति अरुचि लगातार गहन होती जा रही है। अब चीन में इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि चीन में आ रही इस कमी की भरपाई कुछ हद तक तिब्बत जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर भर्ती के जरिए पूरी की जाए। चाइना मिलिट्री आॅनलाइन की जनवरी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 18 जनवरी को बीजिंग में नेशनल कॉन्सक्रिप्शन वर्क पर अंतर-विभागीय संयुक्त सम्मेलन का पहला प्लेनम आयोजित किया गया था। इसे जनरल वेई फेंघे, जो देश के रक्षा मंत्री और सर्व-शक्तिशाली केंद्रीय सैन्य आयोग (सीएमसी) के सदस्य भी हैं,  ने संबोधित किया था। इसमें जो तथ्य सामने आये,  उससे स्पष्ट था कि बीजिंग अपनी सैन्य भर्ती की कमियों से पूरी तरह अवगत है; और उनमें से एक अत्यंत गंभीर कमी पीएलए में 'अल्पसंख्यक' सैनिकों की अनुपस्थिति है।

कितनी सफल?

पीएलए ने इस नवगठित सैन्य यूनिट, जिसे स्पेशल तिब्बत आर्मी यूनिट नाम दिया गया है, को सिक्किम और भूटान के बीच रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चुंबी घाटी, जो तिब्बत आॅटोनोमस रीजन  (टीएआर) में यातुंग काउंटी के अंतर्गत आती है, में तैनात किया है। चीन की 20 लाख से ज्यादा संख्या वाली सेना में तिब्बत के सैनिकों की संख्या तीन से चार हजार के बीच ही है जो यह भी दिखाता है कि तमाम प्रयासों के बाद भी इसे उत्साहजनक परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं।

यह पहले से ही स्पष्ट है कि यह बल मुख्यत: भारत के विरुद्ध ही लक्षित है। परन्तु क्या यह उपाय भारत के विरुद्ध सफल हो पायेगा, यह चीन के लिए अत्यंत संदेहास्पद है। नि:संदेह तिब्बती अच्छे सैनिक सिद्ध हुए हैं परन्तु भारत के साथ संघर्ष की स्थिति में तिब्बती सैनिक कितने सक्षम साबित होंगे, यह नहीं कहा जा सकता। वह आॅक्सीजन की कमी को सहने में बेहतर हो सकते हैं, पर मानवीय भावनाओं पर चीन किस तरह जोर चला सकता है। तिब्बती आबादी में अधिकांश के रिश्तेदार भारत में निर्वासन में रह रहे हैं। दलाई लामा, बौद्ध धर्म और अपनी संस्कृति और इतिहास और परम्परा में उनका अगाध विश्वास है और चीन को सैन्य बल और प्रलोभन इसे नजरअंदाज नहीं करवा सकते।

आंखों में धूल झोंकने के प्रयास
चीन तिब्बत और शिनजियांग जैसे क्षेत्रों को बलपूर्वक रौंदता आ रहा है, परन्तु इसके बाद भी इस क्षेत्र के लोगों ने उसे स्वीकार नहीं किया है। अब ऐसी स्थिति में चीन की एक दुविधा यह भी है कि विश्व को कैसे दिखाया जाए कि तिब्बती उसके पक्ष में हैं, जो वे वास्तव में हैं नहीं। बीजिंग तिब्बत की तथाकथित शांतिपूर्ण मुक्ति के 17-सूत्रीय समझौते की 70वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी कर रहा है, वह समझौता जिसके मूल में सैन्य दमन था। अब वह तिब्बत के लोगों की आँखों में धूल झोंकने के नए प्रयासों को आरम्भ करने जा रहा है जिसमें इस सैन्य अतिक्रमण की बात को नकार कर चीन-तिब्बत की चिरकालीन एकता के ढोल पीटे जाएंगे और तिब्बत के युवाओं का चीनी सेना में प्रवेश, तिब्बत द्वारा चीन के शासन की सहर्ष स्वीकृति के रूप में प्रस्तुत किया जाना है ताकि वह दलाई लामा और निर्वासन में चल रही तिब्बत की सरकार की वैधानिकता को नकार सके जैसा वह पिछले सात दशक से करता आया है।