विरोध पर टिकी विचारधारा हमेशा हारती है

    दिनांक 09-जुलाई-2021
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 अविनाश त्रिपाठी
महाभारत के दो ऐसे चरित्र जिन्हें अलग-अलग कारणों से ही सही लेकिन उनकी जन्म देने वाली मां ने त्याग दिया। राजपरिवार से संबंध रखने के बावजूद दोनों का बचपन सामान्य जनों के बीच बीता

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कर्ण तो फिर भी राज प्रासाद में पला। परशुराम जैसे गुरू से सीखा लेकिन फिर भी वो सारा जीवन अपनी वास्तविकता को लेकर उपजी हीनता से आजाद नहीं हो पाया। उसने अपना सारा यश और योग्यता को कुंठा में बदल दिया। उसका सारा जीवन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन की प्रतिछाया बन कर रह गया जिस पर वो जितनी बार सामने आया हर बारा हारा। और अंत में अपना सारथी की मक्कारी के चलते उसी रथ का पहिया निकालते हुए मारा गया जिससे खुद की पहचान से अलग करने के लिये सारा जीवन लड़ता रहा ।
वहीं कृष्ण ने सारे बचपन गाय चराईं और गोपाल कहलाए। उन्होंने वन में मिले मयूर पंख को सिर पर धरा और अपना इस ग्वाले वाले जीवन को हीनता का परिचायक नहीं बनने दिया। जब वो द्वारिकधीश हुए तब भी एक सादे से मयूर पंख को अपने सिर का ताज बनाया, अपने वजूद से कभी नाता नहीं तोड़ा। उन्होंने सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर से प्रतिस्पर्धा नहीं की इसलिये अर्जुन सारा जीवन उनके आगे हाथ जोड़े खड़ा रहा। उन्होंने अपनी बचपन की वास्तविकता को राज मुकुट से हटाने की कोशिश नहीं की इसलिये धर्मराज युधिष्ठिर ने स्वयं भगवान वेद व्यास और भीष्म के होते हुए भी राजसूय यज्ञ में एक गाय चराने वाले की अग्र पूजा की।
संसार में कोई भी प्रतिक्रियावादी होकर पनप ही नहीं सकता। जितनी विचारधारा किसी के विरोध पर, बदले लेने पर टिकी हैं उनका हाल देखिए। उन्होंने तानाशाही, नरसंहार के अलावा संसार को कुछ नहीं दिया। किसी को पूंजीवादी और बर्जुआ से धरती मुक्त करानी है किसी को काफिर को ईमान वाला बनाना है। इन सबकी हालत देखिए ये सारे कर्ण की तरह बस कुंठा में जी रहे हैं। 10 कम्युनिस्ट पार्टी और 70 जिहादी संगठन बन गए।
मगर 95 वर्षों के बाद भी संघ एक ही है। अगर संघ किसी की प्रतिक्रिया या नफरत में बना होता तो 20-30 साल में फिदाइन हमलावर तैयार करके हिन्दू अलकायदा बन चुका होता और अब तक खत्म हो जाता। 30 हजार शिशु मंदिर न बन पाते। 95 सालों से तप करके, खुद को गला-गला कर एक-एक कदम आगे न बढ़ रहा होता। परिवारों की पीढ़ियां एक ही ध्येय को न जी रही होती।
कुछ दुश्मन बनाए जाते और नफरत करना सिखा दिया जाता लेकिन इससे कुछ भी सृजन नहीं होता। प्रतिक्रियावाद कुछ सृजन नहीं करता वो सिर्फ कुंठा को जन्म देता है।
जब ये कहा जाता है ये ईश्वरीय कार्य है तो इसका अर्थ ही ये है कि एक और नरसंहार और तानाशाह देने वाली विचारधारा नहीं बनानी। हिन्दू चिंतन से जन्मा ऐसा समाज खड़ा करना है जो आंखों में आंखें डालकर पूछे कैसे ईश्वर का एक रूप या एक ही किताब सच्ची हो सकती है। मेरा मार्ग मुझे नर्क का अधिकारी कैसे बनाता है। समान पूर्वज होते हुए भी तुम्हारे लिये तुम्हारी पहचान शर्म का विषय क्यों है।
सिर्फ कुछ परिवार के बच्चे ही पीएम सीएम क्यों बन सकते हैं।
जब यहीं रहना था जो एक तिहाई देश काटकर अलग क्यों बनाया।
भारत हिन्दू राष्ट्र है इस बात में किसी को आपत्ति क्यों है।
समाज बस खड़ा हो कर 'न दैन्यं न पलायनम्' की हूंकार तो करे सामने अगर इच्छा मृत्यु का वरदान लिये भीष्म भी हुए तो धाराशाही हो जाएंगे।
इस समाज से ये हूंकार कराना ही संघ का काम है। जो कृष्ण ने करवाई थी। इसलिए जो भी सोचते हैं संघ हिन्दू अलकायदा की तरह दिखे। उन्हें हमेशा बस निराशा ही हाथ लगेगी ।
क्योंकि ये ईश्वरीय कार्य है
जिहादी नहीं, मिशनरी नहीं, लाल क्रांति नहीं...
( अविनाश त्रिपाठी के फेसबुक वाल से )