सांस्कृतिक स्वतंत्रता का सदियों लम्बा संघर्ष

    दिनांक 15-अगस्त-2021   
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भारत विभाजन के साथ ब्रिटिश बेड़ियां कटने के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में पाञ्चजन्य के इस विशेषांक में हमने भारत के स्वराज्य-संघर्ष के अलग-अलग पड़ावों, अचर्चित आंचलिक मोर्चों, अल्पज्ञात अनूठे बलिदानियों की गाथाएं एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया है.
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला चरण 1857 और फिर उसकी परिणति हम 1947 में देखते हैं।
इन दोनों के बीच जिस एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु पर कुछ इतिहासकारों ने अंगुली रखी है वह है हिंदू- मुस्लिम को अलग-अलग करके देखने-तौलने वाली ब्रिटिश नजर।
 
आज भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम का उल्लेख होता है, तो इसकी तहों में उतरते हुए रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस बात से अंतर नहीं पड़ता कि कितनी पीढ़ियां गुजरीं, अंतर इस बात से पड़ता है कि जिसे हम स्वतंत्रता कहते हैं और 1947 से इसकी गिनती करते हैं, वह वास्तव में ‘स्व’ की लड़ाई थी और जितनी ऊपरी तौर पर दिखती है उससे कहीं ज्यादा पुरानी थी।
 यह ऐसी जंग नहीं है जो जीहुजूर और ताबेदार लड़ रहे हैं।
हमारा सामना एक विकट और संलिष्ट जंग से है।
जो रिलीजन के विरुद्ध है, नस्ल के खिलाफ है।
ये प्रतिशोध की,आशा और अपेक्षा की जंग है।
-विलियम हार्वर्ड रसेल, युद्ध संवाददाता (‘माई डायरी इन इंडिया’)
 
गहरे और पुराने घाव-चोटें ज्यादा टीसती हैं। स्वतंत्रता के लिए भारतीय समाज के लोमहर्षक बलिदान बताते हैं कि आक्रमणों-आघातों से उपजी छटपटाहट बहुत गहरी थी।
पहले आक्रांताओं के विरुद्ध और फिर औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के विरुद्ध। ये एक ऐसा लंबा दुर्धर्ष संघर्ष था जिसमें दुनिया की प्राचीनतम सभ्यता अपनी अस्मिता पर, अपनी पहचान पर हुए हमले के विरुद्ध उठ खड़ी हुई थी। संत-संन्यासी, किसान-जवान, जनजातीय समाज, महिला, बच्चे, बूढ़े .. समाज के सभी वर्ग, जातियाँ कई सामजिक चेतना और सुधार आंदोलन (ब्रह्म समाज, आर्य समाज, सत्यशोधक समाज, थियोसोफिकल सोसाइटी, प्रार्थना समाज, हिन्दू मेला, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इत्यादि) इसमें आहुतियां देते हुए दिखते हैं. माँ भारती के लिए हजारों-लाखों सपूतों का जीवन होम हो जाता है।
आध्यात्मिक, राजनीतिक, समाज को संगठित करने वाले, सुधारने वाले आंदोलन और इनके अग्रणी व्यक्ति अलग-अलग हैं परंतु सबकी अलख, सबकी आवाज, सबका लक्ष्य, सबकी निष्ठा एक ही है, उस ‘स्व’ की प्राप्ति! उस गर्व की पुनर्प्रतिष्ठापना! हर प्रयास, हर उत्सर्ग में यह चाह हर बार दिखाई देती है।
स्वराज - यह शब्द नहीं है, स्वतंत्रता - यह शब्द नहीं है।
 
स्वराज और स्वतंत्रता में गूंजता स्व भारतीय संस्कृति के अंतस में पड़ा हुआ बीज है जो हर संघर्ष में अंगड़ाई लेता है, अंकुरित होता है और बड़ा होता जाता है।
स्वराज की भारतीय अलख के, इस कालखंड की गिनती हम कबसे करेंगे? इतिहासकारों में इस पर मतैक्य नहीं है परंतु जो मानते हैं कि 1947 का मतलब भारत का जन्म नहीं है, वे इस लड़ाई को पीछे से गिनते हैं। वे गुरुनानक जी द्वारा आक्रांताओं की आहट भांपना देखते हैं. सिख गुरुओं का शौर्य और बलिदान देखते हैं। भक्ति आंदोलन का युग -अष्टछाप की अलख और किसानों का रौद्र रूप देखते हैं।
 
एक 1526 से पहले की स्थिति है बाद में 1757 में यूरोपीय शक्तियां आती हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी की शोषणकारी प्रवृत्ति कैसी थी, इस पर बहुत सारे शोध हुए हैं। किन्तु 1857 में सारे समाज को झकझोरने, बहुमत की एकता स्थापित होने के कारणों पर पर्याप्त शोध नहीं हुआ। यह बात अकादमिक अध्ययनों का विषय ही नहीं बनी कि व्यापक विनाश के अध्यायों के पीछे पहले इस्लाम और फिर चर्च रहा जिनके कारण समाज की अस्मिता को गहरा धक्का लगा था और इस साझा अपमान ने भारतीय समाज को विविधताएं होते हुए भी संघर्ष के समय एक साथ ला खड़ा किया।
इतिहासकार और एक खास राजनीतिक व्याख्या करने के लिए प्रतिबद्ध रहे लोगों, भारतीय अस्मिता से षड्यंत्र करने वालों ने 1855 से 1857 की जिस घटना को सिर्फ विद्रोह कहा, वह स्वतंत्रता का पहला व्यापक युद्ध है। उसमें समाज के बड़े भाग का सहभाग है।
 
टाइम्स के बुलावे पर आए विलियम हार्वर्ड रसेल की पुस्तक ‘माई डायरी इन इंडिया’ के विषय में ध्यान देने वाली बात है कि पुस्तक का शीर्षक 1857 के स्वतंत्रता आंदोलन को विद्रोह नहीं बताता। बाद में मिशेल एडवर्ड ने पुस्तक का शीर्षक बदल कर ‘माई इंडियन म्यूटिनी डायरी’ कर दिया। अपनी डायरी में रसेल लिखते हैं कि जब से यह दुनिया बनी, किसी भी जगह पर, किसी भी साल में, किसी भी नस्ल में या किसी भी कौम में इतनी ताकत और हिम्मत नहीं रही कि अंग्रेजों को इतनी कड़ी टक्कर मिली हो जितनी यहां दी गई। ऐसा लोहा कही नहीं बजा जितना 1857 में भारत में बजा है।
 
रसेल को समझ आ गया था कि 1857 का संघर्ष विद्रोह नहीं है, राष्ट्रव्यापी आंदोलन है। 2 फरवरी, 1858 को उसकी स्वीकारोक्ति है कि अगर हमें इससे निबटना है तो उस राष्ट्रीय एकता से निबटना पड़ेगा जो 1857 में स्थापित हो गई है।
 
स्वदेशी, साहित्य, राष्ट्रीय शिक्षा, कला, संस्कृति, कोई क्षेत्र ऐसा नहीं था जहां पर स्वतंत्रता की यह छटपटाहट, यह अलख-एकता नहीं दिखती हो। अगर हम सामाजिक सुधारवादियों की बात करें तो उनकी भी एक बड़ी शृंखला है। स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, अरबिंदो घोष के आह्वान हैं। रियासतों की भूमिका है. आत्मबलिदान की कहानियां हैं, सशस्त्र संघर्ष हैं, समुदाय और जाति के आधार पर बांटने के षड्यंत्र हैं। फिर आगे इसी कड़ी में ब्रिटिश सरकार को स्थायित्व देने के उपकरण के रूप में कांग्रेस का जन्म होता है (काफी बाद उसका स्वरूप बदला) और इन सबके बीच में संघ की समाज रक्षक, शौर्यपूर्ण भूमिका है जिसका उल्लेख ही नहीं होता।
 
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला चरण 1857 है और फिर उसकी परिणति हम 1947 में देखते हैं।
इन दोनों के बीच जिस एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु पर कुछ इतिहासकारों ने अंगुली रखी है वह है हिंदू- मुस्लिम को अलग-अलग करके देखने-तौलने वाली ब्रिटिश नजर। यह अलग-अलग की फांक कैसे आगे बढ़ती है, वह समझ में आता है कि तत्कालीन भारत के ‘सचिव’ मार्ले द्वारा वायसराय मिंटो को लिखे पत्र में- सच तो ये है कि मैं एक पश्चिमी व्यक्ति हूं, पूर्वी नहीं हूं लेकिन यह रहस्य आप किसी के सामने खोलना नहीं वरना मैं बर्बाद हो जाऊंगा। मैं समझता हूं कि मैं मुसलमानों को पसंद करता हूं।
 
तुष्टिकरण और पक्षपात का जो बीज अंग्रेजों के मन में पड़ा था वही आगे जाकर राष्ट्रीय एकता के लिए फांस बना। इससे हिंदू-मुसलमान का जो छिटकाव हुआ, उसी के आधार पर लोगों की राजनीतिक लिप्साएं बढ़ीं और भौगोलिक-राजनीतिक तौर पर देश का विभाजन हुआ। इसी के कारण एक तरफ जिन्ना और एक तरफ नेहरू दिखाई देते हैं।
 
गांधी जी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन इस मंशा से किया कि मुसलमान भी स्वतंत्रता संघर्ष में जुड़ेंगे तो यह आंदोलन दम पकड़ेगा, इसका आधार व्यापक होगा। परंतु गहराई से विचारे बिना तथा सर्वसहमति के बगैर उठाए गए इस कदम से साम्प्रदायिकता को बढ़ावा मिला। मनोवैज्ञानिक पक्ष और ऐतिहासिक पक्ष, दोनों को समझने में चूक हुई और उसकी यंत्रणा इस देश ने, समाज ने भोगी।
 
बहरहाल, भारत विभाजन के साथ ब्रिटिश बेड़ियां कटने के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में पाञ्चजन्य के इस विशेषांक में हमने भारत के स्वराज्य-संघर्ष के अलग-अलग पड़ावों, अचर्चित आंचलिक मोर्चों, अल्पज्ञात अनूठे बलिदानियों की गाथाएं एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया है. कोई विशेषांक कितना ही बड़ा क्यों न हो, सदियों के सांस्कृतिक संघर्ष को समेटने के लिए बहुत छोटा है किन्तु फिर भी, हमारा यह प्रयास आपको कैसा लगा! अवश्य अवगत कराएं।
@hiteshshankar