उत्तराखंड में 11,000 फीट पर भारत का सबसे ऊंचा जैविक उद्यान

    दिनांक 21-अगस्त-2021   
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उत्तराखंड के चमोली जिले के माणा गांव में शनिवार को 11,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित भारत के सबसे ऊंचाई वाले जैविक उद्यान (हर्बल गार्डन) का उद्घाटन किया गया। इस उद्यान में 40 प्रजातियों के पेड़-पौधे और जड़ी-बूटियां उपलब्‍ध हैं, जिनमें कुछ विलुप्‍त प्राय और विलुप्‍त होने की कगार पर हैं। ये प्रजातियां
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मुख्य वन संरक्षक (अनुसंधान) संजीव चतुर्वेदी के अनुसार, अधिकतम ऊंचाई वाले इस हर्बल पार्क का मुख्य उद्देश्य विभिन्न औषधीय और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण अल्पाइन प्रजातियों का संरक्षण करना और उनके प्रसार और आवास पारिस्थितिकी पर शोध करना है। उत्तराखंड वन विभाग की अनुसंधान शाखा द्वारा माणा वन पंचायत द्वारा दी गई भूमि पर तीन एकड़ क्षेत्र में इस पार्क को बनाया गया है। इसे केंद्र सरकार की प्रतिपूरक वनरोपण निधि प्रबंधन और योजना प्राधिकरण (सीएएमपीए) योजना के तहत तीन वर्षों में विकसित किया गया है। इस उद्यान में भारतीय हिमालयी क्षेत्र में उच्च ऊंचाई वाले अल्पाइन क्षेत्रों में पाई जाने वाली लगभग 40 प्रजातियों में कई विलुप्‍त प्राय और खतरे में होने साथ-साथ अंतराष्‍ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) और राज्‍य जैव विविधता बोर्ड की लाल सूची में भी शामिल हैं। यही नहीं, इनमें कई महत्वपूर्ण औषधीय जड़ी-बूटियां भी हैं।
इस उद्यान को चार हिस्‍सों में बांटा गया है। पहले हिस्‍से में भगवान बद्रीनाथ से जुड़ी प्रजातियां शामिल हैं, जिनमें बद्री तुलसी, बद्री बेर, बद्री वृक्ष और भोजपत्र का पवित्र वृक्ष हैं। दूसरे खंड में अष्टवर्ग प्रजाति के पौधे शामिल हैं, जो हिमालयी क्षेत्र में पाई जाने वाली आठ जड़ी-बूटियों का एक समूह है, जैसे- रिद्धि, वृद्धि, जीवक, ऋषभक, काकोली, क्षीर काकोली, मैदा और महामैदा जो च्यवनप्राश की सबसे महत्वपूर्ण सामग्री हैं। तीसरे हिस्‍से में सौसुरिया प्रजाति के पौधे हैं, जिनमें ब्रह्म कमल शामिल है जो उत्‍तराखंड का राजकीय फूल भी है। सौसुरिया की अन्‍य तीन प्रजातियां फेम कमल, नील कमल और कूट भी यहां उगाई गई हैं। वहीं, चौथे खंड में विभिन्‍न प्रकार की अल्‍पाइन प्रजातियां जिनमें अतिश, मीठाविश, वनककड़ी और चोरू शामिल हैं। ये बहुत महत्वपूर्ण औषधीय जड़ी-बूटियां हैं, जिनकी बहुत मांग है। इसके अलावा, थुनेर के पेड़ भी हैं, जिसकी छाल का उपयोग कैंसर-रोधी दवा बनाने में किया जाता है। यही नहीं, तानसेन और मेपल के पेड़ भी इस उद्यान में पाए जाते हैं। पार्क का उद्घाटन माणा वन पंचायत के सरपंच ने किया।
देश का पहला कवक पार्क मुनस्‍यारी में
इससे पहले पिछले साल जून में कुमाऊं में बर्फ से ढकी चोटियों से घिरे मुनस्यारी में कवक पार्क विकसित किया गया था। राज्य के वन विभाग के अनुसंधान प्रकोष्ठ द्वारा विकसित यह कवक (लाइकेन) पार्क करीब दो एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। इसमें कवक की 80 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। यह देश का पहला कवक पार्क है। स्‍थानीय बोलचाल में कवक को ‘झूला’ या ‘पत्‍थर के फूल’ कहा जाता है। कवक पेड़ों के तनों, दीवारों, चट्टानों और मिट्टी पर उगते हैं। बता दें कि दुनियाभर में कवक की 20,000 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। भारत में 2,714 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें करीब 600 प्र‍जातियां उत्‍तराखंड के मुनस्‍यारी, बागेश्‍वर, पिथौरागढ़, रामनगर और नैनीताल में पाई जाती हैं।