अल्लाह-हू-अकबर से जाट गुस्से में, बाकी बिरादरी भी लामबंद

    दिनांक 10-सितंबर-2021   
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मुजफ्फरनगर की तथाकथित महापंचायत में राकेश टिकैत द्वारा नारा ए तकबीर, अल्लाह हू अकबर उछाला, अब उसकी प्रतिक्रिया दिखने लगी है। जाट समाज की समझ से पहले ही उनका आंदोलन बाहर था, आंसुओं से उपजी सहानुभूति भी हवा हो चुकी है और अब तो इस मुस्लिम परस्ती को लेकर जाट समाज में गुस्सा है.
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पश्चिम उत्तर प्रदेश
में एक कहावत है, स्याना गादला (यानी गंदा पानी) पीता है...इस तरो, उस तरो, जिस तरो के साथ रोज टीवी पर नमूदार होने वाले राकेश टिकैत के बारे में हम पहले भी जिक्र कर चुके हैं. उनकी हकीकत ये है कि उनके पांव के नीचे जमीन नहीं है, कमाल ये कि उन्हें यकीन नहीं है. आप सिर्फ कौरवी (पश्चिम यूपी की खड़ी हिंदी का नाम) बोलकर अपने आप को जमीन से जुड़ा साबित नहीं कर सकते. ये देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री देने वाली धरती है. इसको समझ पाना अगर इतना आसान होता, तो कनाड़ा व खालिस्तानी फंडिग से पोषित किसान वेशधारी राकेश टिकैत दो चुनाव में जमानत न गंवाते. दिल्ली की सीमा पर बैठकर बिग बॉस टाइप प्रायोजित टीवी कार्यक्रम करना अलग बात है, और पश्चिम यूपी की दलदली राजनीतिक जमीन पर पैर रखना अलग. मुजफ्फरनगर की तथाकथित महापंचायत में उन्होंने जो नारा ए तकबीर, अल्लाह हू अकबर उछाला, अब उसकी प्रतिक्रिया दिखने लगी है। जाट समाज की समझ से पहले ही उनका आंदोलन बाहर था, आंसुओं से उपजी सहानुभूति भी हवा हो चुकी है और अब तो इस मुस्लिम परस्ती को लेकर जाट समाज में गुस्सा है. करेले पर नीम ये कि टिकैत के जाट—मुस्लिम गठजोड़ खड़ा करने के विफल प्रयास के जवाब में पश्चिम यूपी की तमाम गैर जाट बिरादरी भी लामबंद हो गई है.

मुजफ्फरनगर की महापंचायत का सर्कस बनाने दिल्ली से पहुंचे तमाम मीडिया हाउस को ये पता चल चुका होगा, सबक भी मिल चुका होगा कि टिकैत के साथ कौन लोग हैं. ये वे लोग हैं, जिनके टेंटों में बलात्कार होते हैं. जहां किसान आंदोलन में जाने वाले शख्स की हत्या हो जाती है. ये वे लोग हैं, जिन्होंने दिल्ली बार्डर के इर्द-गिर्द की आबादी में बहन-बेटियों का बाहर निकलना मुश्किल कर दिया है. ये वही लोग हैं, जिनकी नशेबाजी के वीडियो पूरे इंटरनेट पर तैर रहे हैं. किस तरह टिकैत के मनोविक्षिप्त समर्थकों ने महिला पत्रकारों को नोचा, यह कैमरे पर पूरा देश देख चुका है. क्या यह किसानों की महापंचायत में हो सकता है ? राकेश टिकैत के पिता ने मेरठ से लेकर दिल्ली तक तमाम सफल आंदोलन किए. सरकारों को झुका दिया. देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री को उन्हें मनाने के लिए सिसौली तक जाना पड़ा था. लेकिन कई बार महीनों तक चले आंदोलनों में किसी महिला के साथ कभी बेअदबी नहीं हुई. इसलिए कि चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के साथ किसान था. अब सवाल ये उठता है कि राकेश टिकैत के साथ कौन हैं ? मुजफ्फरनगर महापंचायत को असल में टिकैत के हमसाया मुस्लिम नेताओं ने अपनी इज्जत का सवाल बना लिया था. मोहम्मद जौला जैसे जाट विरोधी दंगे के मास्टर माइंड मंचासीन तो थे ही, भीड़ जुटाने में भी अव्वल थे. इसी का नतीजा था कि ये पहली ऐसी किसानों की पंचायत थी, जिसमें ट्रैक्टर ट्रालियों की कतार नहीं थी. आधी भीड़ मुस्लिम थी. हम इस बात से कतई इंकार नहीं करते कि मुसलमान किसान नहीं हैं. लेकिन सांप्रदायिक गणित की नजर से ये अहम बात थी. मुसलमानों के जुटान की वजह से ही स्थानीय हिंदू किसान मोटे तौर पर इस महापंचायत से दूर रहा.

दिल्ली के स्टूडियो में बैठकर पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति पर ज्ञान बांटने वाले स्वयंभू राजनीतिक विश्लेषकों को दूर-दूर तक यहां के चुनावी गणित का अंदाजा नहीं है. राष्ट्रीय लोकदल के तमाम गठबंधनों के बावजूद भारतीय जनता पार्टी पश्चिम यूपी की जाट बहुल सीटों पर जीतती रही है. इस जीत का गणित बहुत सीधा और सपाट है. जाट बहुल सीटों पर वोटिंग का पैटर्न अलग है. मुसलमान और जाट एकजुट होकर वोट कर लें, ये असंभव सी बात है. 2013 के जाट विरोधी दंगे के बाद तो ये नामुमकिन है. एक अलग पहलू ये कि जाट बहुल सीटों पर अधिकतर बिरादरी राष्ट्रीय लोकदल, या फिर उसके साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ने वाली पार्टी के खिलाफ एकजुट होकर वोट करती हैं. ऐसा रालोद, सपा, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी की मुस्लिम खुशामद वाली राजनीति के जवाब में होता है. मुजफ्फरनगर की पंचायत में नारा ए तकबीर ने तो खैर इस बार पूरी बिसात ही पलट डाली है. पहले जब टिकैत ने गुलाम मोहम्मद जौला के पैर छुए थे, तो उसको लेकर भी जाट समाज में खासी प्रतिक्रिया हुई थी. इस बार तो अल्लाह हू अकबर को लेकर बहुत ज्यादा नाराजगी नजर आ रही है. इसी का नतीजा है कि टिकैत और किसान यूनियन के हैंडल से सोशल मीडिया पर सफाई दी जा रही है कि टिकैत ने सिर्फ अल्लाह हू अकबर का ही नारा नहीं लगाया, बल्कि साथ-साथ हर-हर महादेव का भी नारा लगाया था. इस बीच 2013 के दंगों से खार खाए तमाम मुस्लिम उलेमा और मौलवी बिलों से निकल आए हैं. सोशल मीडिया पर इस तरह के तमाम वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिसमें मुस्लिम उलेमा कह रहे हैं कि हम दंगे को भूले नहीं हैं. एक मौलवी का दावा है कि 250 से ज्यादा मस्जिदों पर जाटों ने कब्जा कर रखा है. उसने मांग रखी है कि टिकैत पहले इन मस्जिदों को खाली कराएं. साथ ही उसने साफ कर दिया है कि टिकैत अल्लाह हू अकबर कहते रहें, लेकिन हम कभी हर-हर महादेव नहीं बोलेंगे. कवाल, मलकपुर और अन्य दंगा प्रभावित इलाकों में तो इस कदर नाराजगी है कि राकेश टिकैत पैर तक नहीं रख सकते.

इसी बीच 10 सितंबर यानी शुक्रवार को एक और बड़ी खबर आ गई. 2013 के जाट विरोधी दंगे से पहले भड़काऊ भाषण देने के मामले में तमाम मुस्लिम नेताओं पर 13 सितंबर को आरोप तय होंगे. इस मामले में पूर्व सांसद कादिर राणा, सईदुज्जमां, पूर्व विधायक नूर सलीम राना, पूर्व विधायक मौलाना जमील, सलमान सईद, असद जमां, मुशर्रफ कुरैशी, नौशाद कुरैशी, अहसान कुरैशी, और सुल्तान मुशीर आरोपी हैं. ये वे मुस्लिम नेता हैं, जिन्होंने मुजफ्फरनगर में जाट विरोधी दंगा फैलाया था. खास बात ये है कि इनमें से कई अब राकेश टिकैत के खैरख्वाह हो चुके हैं. मुजफ्फरनगर की पंचायत में भी परदे के पीछे से इनमें से कई नेता काम कर रहे थे. इन नेताओं पर आरोप तय हो जाने का मतलब है कि जो ताकतें राकेश टिकैत को आगे करके किसानों के नाम पर खेल रही हैं, उन्हें जोरदार झटका लगेगा. किसान यूनियन के पुराने नेताओं में भी पंचायत के बाद से बहुत ज्यादा नाराजगी है. पंचायत में जिस तरीके से पंजाब के धनाढ्य आढ़ती और मुस्लिम नेता हावी रहे, उससे किसान यूनियन के पुराने कार्यकर्ता बहुत ज्यादा आहत हैं. कुल जमा नतीजा ये है कि जिस पंचायत को लेकर कांग्रेस, सपा और बसपा बहुत खुश थे, वही असल में उन्हें पश्चिम यूपी में सबसे ज्यादा चोट दे चुकी है. इस पंचायत के नतीजे आपको बहुत जल्द नजर आएंगे.