आत्महत्या-आंकड़ों में छिपी सचाई

    दिनांक 10-सितंबर-2021
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प्रो. ब्रज भूषण

34 प्रतिशत आत्महत्या पारिवारिक कारणों से होती है। मानसिक बीमारी की वजह से महज 7 प्रतिशत लोग ही अपनी जान लेते हैं। इसलिए 15 से 44 आयुवर्ग के बीच परिवार को मजबूती के साथ खड़ा होना पड़ेगा।
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आत्महत्या एक विश्वव्यापी समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुसार हर साल लगभग आठ लाख लोग आत्महत्या करते हैं। हालांकि वैश्विक स्तर पर आत्महत्या की वजह से कुल मृत्यु का महज 1.4 प्रतिशत मौतें ही होती हैं, पर इन आंकड़ों में कई अन्य बातें भी छिपी हैं, जिन्हें हमें देखने-समझने की जरूरत है। खासतौर पर इस कोरोना काल में। ये आंकड़े कितने भयावह हैं वह ऐसे समझिये कि हर 40 सेकेंड में दुनिया के किसी कोने में कोई अपनी जान लेता है और लगभग इसी समयावधि में 20 लोग ऐसा करने का प्रयास करते हैं। हालांकि डब्लूएचओ ने आत्महत्या को स्वास्थ्य सम्बंधित सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (एसडीजी) का हिस्सा बनाया है, पर यह सर्वविदित है कि मानसिक स्वास्थ्य को हम उतना महत्व नहीं देते जितना शारीरिक स्वास्थ्य को।

हमारे देश में भी आत्महत्या का प्रतिशत ज्यादा है। आबादी अधिक होने की वजह से जब आप इस प्रतिशत को सटीक संख्या में बदलेंगे तो भौचक्के रह जायेंगे। 2005 से अभी तक के आँकड़े बताते हैं कि आत्महत्या दर में उतार चढ़ाव होते रहे हैं और ये एक प्रतिशत की मामूली वृद्धि से लेकर छह प्रतिशत की कमी तक देखी गयी है। आज हम इन्हीं आँकड़ों को परत दर परत खोलेंगे और उनसे कुछ सीखने का प्रयास करेंगे।

भारत में आत्महत्या करने वाले 34 प्रतिशत लोग 15 से 44 वर्ष के बीच होते हैं। 15 से 29 साल के बीच बच्चे हाई स्कूल और उच्च शिक्षा के बीच कहीं होते हैं। यानी आत्महत्या की रोकथाम का प्रयास स्कूलों और कॉलेजों में मुकम्मल तरीके से करने होंगे। फिर 30 से 44 साल के लम्बे अंतराल में व्यक्ति नौकरी, प्रोन्नति और घर गृहस्थी में व्यस्त रहता है। अतः सामुदायिक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के साथ ही परिवार और रिश्तों पर विशेष ज़ोर देने की आवश्यकता है। दूसरी बात यह कि पूरी दुनिया में इस तरह की मौतों का 79 प्रतिशत आर्थिक रूप से कमजोर देशों में होती हैं। इससे जाहिर है कि जीने की जद्दोजहद इसका एक प्रमुख कारण हो सकता है। अतः सरकार और समाज के स्तर पर हर किसी के लिए आजीविका का इंतजाम इस दिशा में एक प्रमुख कदम होगा।

शैक्षणिक संस्थानों में आत्महत्या की ख़बरें आये दिन अखबारों में छपती रहती हैं। आँकड़ों में छिपी एक सचाई यह भी है कि ज्यादातर आत्महत्याएं ज़हर खाने या फांसी लगा लेने से होती हैं। लगभग 80 प्रतिशत घटनाओं में इन्हीं दोनों में से किसी एक का इस्तेमाल होता है। मुझे लगता है इस पर दो तरफ़ा वार करने की आवश्यकता है। एक तरफ नशीले और ज़हरीले पदार्थों की बिक्री को नियमित किया जा सकता है, खास तौर पर शिक्षा संस्थानों और छात्रावासों के आसपास। दूसरी तरफ पंखों से जुड़ी मामूली परिवर्तन पर कंपनी से संवाद किया जा सकता है। मसलन, अगर एक ख़ास भार से ज्यादा अगर पंखे या उसके हुक के ऊपर पड़े तो वह स्वतः नीचे आ जाये। छात्रावासों में, घरों में और उन तमाम जगहों पर जहां इन आयु वर्ग के लोग रहते हैं, इसे अनिवार्य बनाया जा सकता हैं। इससे फांसी लगाने में इस्तेमाल होने वाले कम से कम एक साधन पर तो अंकुश लगेगा। मामूली से प्रतीत होने वाले इन परिवर्तनों से हम आत्महत्या की संख्या को कुछ हद तक नीचे तो ला ही सकते हैं।


कोविड-19 के दौर में मानसिक स्वास्थ्य

भारत का पहला कोविड-19 केस 30 जनवरी, 2020 को सामने आया और मार्च 25 से तीन अलग-अलग चरणों में लॉकडाउन लगाया गया। इस काल खंड में आत्महत्याओं के मामलों में क्या कोई बदलाव आया ? आपको 5 ऐसे अकादमिक शोध पत्र मिल जाएंगे, जिनमें इसका अध्ययन हुआ है। भारतीय सन्दर्भ में महिमा पाणिग्रही और उनके सहयोगियों द्वारा इसी साल प्रकाशित एक शोध में कई चीज़ें खुलकर सामने आईं। पहला तो ये कि इस काल खंड में उन्हें आत्महत्या से सम्बद्ध कुल 1856 आलेख मीडिया में मिले। दूसरा यह कि आइसोलेशन, क्वारंटाइन, किसी से आमना-सामना न होना, कोरोना पॉजिटिव होने के बाद भेदभाव का अनुभव और तनाव आत्महत्या के मुख्य कारण थे। ये शोध बताते हैं कि कोविड-19 प्रभावित लोगों में से आधे को अलग-अलग तरह की मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी हुई। मसलन 40 प्रतिशत लोगों की नींद प्रभावित हुई जबकि 34 प्रतिशत को तनाव और चिंता हुई। लगभग 70 प्रतिशत से कुछ ज्यादा लोगों ने माना कि उनके मानसिक सेहत पर कुछ न कुछ प्रतिकूल असर तो पड़ा ही है। और सबसे बड़ी बात यह कि आत्महत्या करने वालों में 64 प्रतिशत अपने डॉक्टर (फिजिशियन) के संपर्क में थे। यानी, केवल चिकित्सीय सुविधा पर ध्यान केंद्रित करने की हम एक कीमत चुका रहे हैं। हमें मानसिक स्वास्थ्य पर अलग से ध्यान देने की आवश्यकता है।


अगर आप विभिन्न प्रकार की दवाइओं पर ध्यान दें, ख़ासतौर पर एंटी डिप्रेस्सेंट पर, तो एक अलग तस्वीर सामने आती है। वैश्विक स्तर पर एंटी डिप्रेस्सेंट दवाओं का बाजार 2019 के 14.3 बिलियन डॉलर से बढ़ कर 2020 में 28.6 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया। इसके लिए कोविड महामारी को एक प्रमुख कारण माना जाता है। ऐसी उम्मीद है कि इस महामारी के बाद यह माँग कम होगी पर फिर भी 2023 तक यह 19 बिलियन डॉलर का बाज़ार होगा। यह महज एंटी डिप्रेस्सेंट दवाओं की बात हो रही है। अगर आप एंटी सायकोटिक, मूड स्टेबलाइजर, एंटी एंग्जायटी, हिप्नोटिक, और एंटी सब्सटांस यूज़ दवाओं को एक साथ जोड़ दें तब तो ये आंकड़ा सातवें आसमान पर होगा।

हम सबने कोरोना काल में वैक्सीन, दवा और ऑक्सीजन की कमी की तमाम खबरें पढ़ीं। पर क्या आपको मालूम है कि चिंता (एंग्जायटी) और अवसाद (डिप्रेशन) के मामलों में जबरदस्त उछाल की वजह से पूरी दुनिया में एंटी डेप्रेस्सेंट की भयानक कमी हो गयी। जून 2020 में कनाडा में इसकी भारी कमी हो गयी जो इस साल अगस्त तक बने रहने की संभावना है। कमोबेश पूरी दुनिया का यही हाल है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मैं बार-बार क्यों इसे अदृश्य चुनौती की संज्ञा दे रहा हूँ।


तो क्या करें हम

सिक्के का एक पक्ष यह भी है कि 34 प्रतिशत आत्महत्या पारिवारिक कारणों से होती है। मानसिक बीमारी की वजह से महज 7 प्रतिशत लोग ही अपनी जान लेते हैं। इसलिए 15 से 44 आयुवर्ग के बीच परिवार को मजबूती के साथ खड़ा होना पड़ेगा। मेरी समझ से हम इस समस्या की भयावहता को देख ही नहीं पा रहे हैं। हम अदृश्य लक्षणों को परख ही नहीं पाते हैं। अभी के हालात में सरकार के स्तर पर त्वरित कार्रवाई की उम्मीद के साथ-साथ हमें अपने सामाजिक-आध्यात्मिक कड़िओं को भी मजबूत बनाने की आवश्यकता है। इसमें स्वास्थ्य सेवा से जुड़े लोगों की बजाय सामाजिक चेतना और सामुदायिक सेवा से जुड़े लोगों की अहम भूमिका है। इस प्रकार परिवार, समाज, शैक्षणिक संस्थान, स्वास्थ्यकर्मी, आदि एक साथ मिलकर इसका मुकाबला कर पाएंगे। अभी कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की कमी से निपटने के लिए अगर एक नेशनल टास्क फोर्स बन सकता है तो मानसिक स्वास्थ्य की अदृश्य समस्याओं के लिए विभिन्न स्तर पर ऐसा क्यों नहीं हो सकता ?

लेखक श्री देव राज चेयर प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष, मानविकी और समाज विज्ञान विभाग
आई.आई.टी. कानपुर में हैं।