किसान संघर्ष मोर्चा की तानाशाही, कहा जब तक आचार संहिता लागू नहीं होती पार्टियां अपनी रैलियां न करें

    दिनांक 11-सितंबर-2021   
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केन्द्र के तीन कृषि सुधार बिलों के विरोध में राजनीतिक शह पर शुरू हुआ कथित किसान आन्दोलन अब अपने आका दलों को अपनी ताल पर नचाने लगा है। संयुक्‍त किसान मोर्चा ने पंजाब के राजनीतिक दलों के लिए अपनी ओर से आचार संहिता जारी कर आदेश दिया है कि जब तक चुनावी आचार संहिता लागू नहीं होती वे अपनी रैलियां न करें। बेबस सभी दलों ने मोर्चा के इस तानाशाही रवैये को लेकर उसकी हां में हां मिलाना ही बेहतर समझा है।
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नतमस्त हो सभी दल बोले, जी जनाब
मोर्चा का दावा पार्टियों की रैली से कमजोर होता है किसान संघर्ष
केन्द्र के तीन कृषि सुधार बिलों के विरोध में राजनीतिक शह पर शुरू हुआ कथित किसान आन्दोलन अब अपने आका दलों को अपनी ताल पर नचाने लगा है। संयुक्‍त किसान मोर्चा ने पंजाब के राजनीतिक दलों के लिए अपनी ओर से आचार संहिता जारी कर आदेश दिया है कि जब तक चुनावी आचार संहिता लागू नहीं होती वे अपनी रैलियां न करें। बेबस सभी दलों ने मोर्चा के इस तानाशाही रवैये को लेकर उसकी हां में हां मिलाना ही बेहतर समझा है।
पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 के मद्देनजर राजनीतिक दलों ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं और रैलियों व सभाओं की तैयारियों में जुटी हैं। लेकिन अब उनको किसान संगठनों ने बड़ा झटका दिया है। संयुक्त किसान मोर्चा ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब की सियासी पार्टियों के लिए अपनी आचार संहिता जारी कर दी है। किसान मोर्चा ने चुनाव आचार संहिता लागू होने तक पार्टियों को रैलियां नहीं करने को कहा है। किसान संगठनों ने कहा है कि यदि कोई पार्टी ऐसा करती है तो हम समझ जाएंगे कि वह किसान मोर्चे की विरोधी है। इसके साथ ही उनके आयोजन का विरोध होगा।
भाजपा को छोड़ विभिन्न सियासी पार्टियों जिनमें कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल, आम आदमी पार्टी के साथ बैठक के बाद किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा कि बैठक अच्छे माहौल में हुई। हमने अपने काडर से आग्रह किया है कि राजनीतिक पार्टियों का घेराव न करें, लेकिन राजनीतिक पार्टियों को भी यह समझना चाहिए कि चुनाव से छह महीने पहले ही वह अपनी गतिविधियां शुरू करके किसान आंदोलन को नुकसान न पहुंचाएं। यदि किसानों ने विरोध किया तो उसके नुकसान के वह खुद जिम्मेदार होंगे। राजेवाल ने कहा कि राजनीतिक पार्टियां जब रैलियां करती हैं तो हमारे किसानों का ध्यान उस तरफ चला जाता है। यह हमारे लिए नुकसानदायक है।
संयुक्‍त किसान मोर्चा ने पार्टियों को दिए निर्देश
1. घोषणापत्र को कानूनी दस्तावेज बनाएं: राजेवाल ने कहा कि चुनाव से पहले सभी पार्टियां एक दूसरे से बढ़-चढक़र चीजें देने की बात करती है। पंजाब सरकार पहले ही बीस हजार करोड़ रुपये का सालाना ब्याज भर रही है। पार्टियां घोषणापत्र को कानूनी दस्तावेज बनाएं।
2. कृषि कानूनों के विरोध में संसद के सामने धरना दें: पार्टियों ने किसान आंदोलन में सहयोग देने का भी प्रस्ताव दिया, लेकिन राजेवाल ने कहा कि अगर आपको आंदोलन में शामिल होना है तो आप कृषि कानूनों को रद करवाने की मांग पर संसद भवन के सामने धरना दें।
3. भू-रिकॉर्ड देने के लिए किसानों को मजबूर न करें: किसान मोर्चा ने कांग्रेस सरकार की ओर से फसल बेचने के लिए मांगे जा रहे भू-रिकॉर्ड का मुद्दा भी उठाया। राजेवाल ने कहा कि पंजाब में ज्यादातर किसानों के संयुक्त खाते हैं। किसानों को भू-रिकॉर्ड देने के लिए मजबूर न किया जाए।
किसान मोर्चा के विशेष कार्यक्रम के दिन रैली नहीं: शिअद
शिअद नेता प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने कहा कि हम संयुक्त मोर्चा के कार्यक्रम के दिन रैली नहीं करेंगे। हमारी लड़ाई राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के साथ है। किसी राज्य में राजनीतिक गतिविधियों को प्रतिबंधित नहीं है। लोगों के पास जाना हमारा अधिकार है। इस पर रोक न लगाई जाए।
किसानों का हर फैसला मानने को तैयार: आप
आम आदमी पार्टी के नेता कुलतार सिंह संधवां ने कहा कि हम किसान संगठनों का हर फैसला मानने को तैयार हैं, लेकिन प्रदेश सरकार को भी रोका जाना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि वह अपने सरकारी कार्यक्रमों के बहाने चुनाव प्रचार करे।
हम किसानों के साथ: कांग्रेस
कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष कुलजीत नागरा ने कहा कि हमने अपना पक्ष रख दिया है। हम किसानों के साथ खड़े हैं। अगला फैसला पार्टी व सरकार के मंच पर बात करके लेंगे। तीन कृषि कानूनों में संशोधन का सबसे पहला कदम कांग्रेस सरकार ने ही उठाया है।
राजनीतिक दलों ने घुटने टेके
पिछले नौ माह से दिल्ली सीमा पर बैठे किसान जत्थेबंदियों ने पंजाब की राजनीतिक पिच पर खेल रहे तमाम नेताओं के घुटने पर ला दिया है। एक तरह से पंजाब की राजनीति पर किसान जत्थेबंदियां हर तरह से हावी हो गई हैं और 2022 के चुनावों में किसानी मुद्दे ही उछलेंगे। वहीं पार्टीबाजी के कारण जमीनी स्तर पर गांवों में किसानों के गुट बंटने लगे हैं। शुक्रवार को चंडीगढ़ में जिस तरह किसानों ने कचहरी लगाकर तमाम दिग्गजों को अपना फरमान सुनाया है, उससे यह बात साफ हो गई है कि पंजाब में किसान यूनियनें राजनीति पर पूरी तरह से हावी हैं। दरअसल, पंजाब के गांवों में कांग्रेस, अकाली दल, आम आदमी पार्टी व बसपा का खासा जनाधार है। 117 विधानसभा सीटों में 89 ऐसी हैं, जहां किसान अहम भूमिका अदा कर सकते हैं, जबकि 28 सीटें ऐसी हैं, जहां किसानों का कोई प्रभाव नहीं है। पंजाब में खेतीबाड़ी की जमीन 7.442 मिलियन हेक्टेयर है, जिसका मालिकाना हक 10.93 लाख लोगों के पास है। इनमें 2.04 लाख (18.7 प्रतिशत) छोटे और सीमांत किसान हैं। 1.83 लाख (16.7 प्रतिशत) छोटे किसान हैं, जबकि 7.06 लाख (64.6 प्रतिशत) किसान ऐसे हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन है। पंजाब की तमाम राजनीतिक पार्टियों के नेताओं की नजर इन किसानों पर है और गांवों में हालात ये बन रहे हैं कि कांग्रेस, अकाली, आप, बसपा के चक्कर में किसान आपस में बंटने शुरू हो गए हैं। जो किसान ट्रैक्टर ट्रालियों में एक साथ दिल्ली बॉर्डर पर जाते थे, वह अपने-अपने गुट के साथ जा रहे हैं।
किसान संगठनों का नक्सली व्यवहार
पंजाब की राजनीति में पहली बार देखने को मिल रहा है कि कोई संगठन राजनीतिक दलों के लिए इस तरह आचार संहिता जारी कर रहा है। इस तरह की उदाहरण देश के नक्सल प्रभावित इलाकों में तो देखने व सुनने को मिल जाती हैं, परन्तु पंजाब के राजनीतिक दलों को इस तरह के अनुभव से पहली बार दो-चार होना पड़ रहा है। पहले किसान संगठन केवल भाजपा का विरोध करते थे, परन्तु अब अकाली दल व कांग्रेस का भी विरोध करना शुरू कर चुके हैं। कुछ दिन पहले ही किसानों ने मोगा में शिअद अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल के कार्यक्रम का विरोध किया और वाहनों से तोडफ़ोड़ भी की थी। किसानों से इस व्यवहार से राजनीतिक दल भयभीत दिखाई दे रहे हैं और उनकी हर उचित-अनुचित बात पर सिर झुकाते दिखते हैं।
शिअद की बढ़त के चिन्तित कांग्रेस व आआपा
विधानसभा चुनावों के चलते चाहे सभी दलों ने तैयारी शुरू कर दी, परन्तु इस दिशा में शिरोमणि अकाली दल आगे चलता दिख रहा है। शिअद न केवल बहुजन समाज पार्टी से गठबन्धन कर चुका है, बल्कि प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में रैलियां व कई स्थानों पर उम्मीदवारों की भी घोषणा कर चुका है। संभव है कि इसी बढ़त को कम करने के लिए कांग्रेस व आआपा किसान संगठनों के कन्धे पर बन्दूक रख कर इस तरह के फैसले करवा रही हो ताकि अकाली दल की बढ़त को रोका जा सके।