करनाल में किसानों का धरना समाप्त, 10 दौर की वार्ता के बाद बनी सहमति

    दिनांक 11-सितंबर-2021
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 मनोज ठाकुर
करनाल में पांच दिनों से जारी किसानों का धरना समाप्‍त हो गया है। प्रशासन के साथ 10 दौर की वार्ता के बाद प्रदर्शनकारी आंदोलन खत्‍म करने को तैयार हुए। जैसे-तैसे किसान नेताओं ने अपनी इज्‍जत बचाई। सरकार 28 अगस्‍त को लाठीचार्ज की जांच के बाद ही अधिकारी के खिलाफ होगी कार्रवाई।
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प्रशासन के साथ बातचीत करते किसान नेता 
किसान नेताओं और प्रशासन के बीच वार्ता सफल रही। इसके बाद करनाल में पांच दिन से चला आ रहा गतिरोध समाप्त हो गया। समझौता उन शर्तों पर हुआ, जो सरकार की ओर से पहले ही स्पष्ट कर दी गई थी। एक मृतक किसान सुशील काजला को मुआवजा, दो परिजनों को नौकरी मिलेगी। साथ ही, बसताड़ा टोल प्लाजा घरौंडा में 28 अगस्त को पुलिस लाठीचार्ज मामले की जांच सरकार सेवानिवृत्‍त जज से करवाएगी, जांच एक माह में पूरी कर रिपोर्ट सरकार को सौंपी जाएगी। जब तक जांच चलेगी, तब तक आईएएस आयुष सिन्हा अवकाश पर रहेंगे। इसके अलावा, लाठीचार्ज में घायल किसानों को 2-2 लाख रुपये का मुआवजा सरकार की ओर से दिया जाएगा।
ये वही शर्तें हैं, जो सरकार पहले ही दिन से मानने को तैयार थी। इसके बाद भी किसान आंदोलन की आड़ में पांच दिन करनाल को एक तरह से बंधक बना कर रखा गया। शुक्रवार शाम को सरकार की ओर से अतिरिक्‍त मुख्‍य सचिव देवेंद्र कुमार विशेष तौर पर करनाल पहुंचे। उन्होंने किसानों के प्रतिनिधियों से बातचीत की। शाम को लगभग दोनों पक्षों में समझौता हो गया था। शनिवार को जिला सचिवालय में किसान प्रतिनिधियों व प्रशासनिक अधिकारियों की संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में एसीएस देवेंद्र कुमार ने मांगों को माने जाने का ऐलान किया। उन्होंने बताया कि शुक्रवार देर रात दोनों ही पक्षों के बीच सकारात्मक माहौल में बातचीत हुई। देर रात ही मांगों को लेकर लगभग सहमति बन चुकी थी, लेकिन किसान प्रतिनिधियों ने सुबह 9 बजे तक समय की मांग की थी ताकि संयुक्त किसान मोर्चा के अन्य प्रतिनिधियों से बातचीत कर सलाह-मशविरा किया जा सके।
दबाव के आगे नहीं झुकी सरकार
हालांकि आंदोलन की आड़ में सरकार पर दबाव बनाने की पूरी कोशिश हुई। इसके बाद भी सरकार झुकी नहीं। प्रशासन ने कानून व्यवस्था भी बनाए रखी। लेकिन सरकार ने आम आदमी के हित में कदम उठाते हुए एक बार फिर से आंदोलनकारियों से बातचीत की। सरकार की ओर से पहले दिन तय कर लिया था कि बिना जांच के आईएएस अधिकारी आयुष सिन्हा के खिलाफ कार्यवाही नहीं होगी। इस निर्णय पर बातचीत के अंतिम समय तक सरकार के प्रतिनिधि डटे रहे। निर्णय भी वहीं हुआ कि पहले जांच होगी। जांच में जो निकल कर आएगा इसके बाद आगे की कार्यवाही होगी। एसीएस देवेंद्र कुमार ने बताया कि निश्चित ही लोकतंत्र में इस तरह से किसी अधिकारी पर कार्यवाही नहीं हो सकती। पहले जांच ही होनी चाहिए। सरकार की मंशा साफ है किसी के साथ भी ज्यादती नहीं होने दी जाएगी। वह चाहे अधिकारी हो या फिर आम आदमी।
किसान नेताओं की चिंता
संयुक्त किसान मोर्चा के नेता भी करनाल की मोर्चाबंदी को लंबा नहीं खींचना चाहते थे।
उन्हें पता था कि यहां ज्यादा दिन तक भीड़ जुटाई नहीं जा सकती। इसलिए वह भी इस कोशिश में थे कि किसी तरह से सरकार उनकी कुछ बात मान लें, जिससे वे सम्मानजक तरीके से यहां से चले जाएं। इसकी दूसरी वजह यह भी रही कि करनाल में किसान नेता भी समझ गए थे कि वह फंस गए हैं। इसलिए धीरे-धीरे योगेंद्र यादव, राकेश टिकैत और अन्य नेता यहां से चले गए थे।
10 दौर की बातचीत के बाद बनी सहमति
किसानों पर लाठीचार्ज के बाद चल रहे गतिरोध थामने के लिए किसान प्रतिनिधियों राकेश टिकैत, गुरनाम सिंह चढूनी, योगेंद्र यादव, बलबीर राजोवाल सहित अन्य किसान नेताओं की प्रशासन के साथ 7-8 सितम्बर को करीब 6 घंटे तक 6 दौर की बातचीत चली, बातचीत बेनतीजा निकली। फिर भी बातचीत का दौर जारी रहा, जिला सचिवालय के बाहर पक्का मोर्चाबंदी होती रही। मांगे न माने जाने के बाद किसान नेताओं ने साफ ऐलान कर दिया था कि वे करनाल के प्रशासनिक अधिकारी के साथ बातचीत नहीं करेंगे।
किसानों के नाम पर राजनीति
किसान नेता हरबंस सिंह ने बताया कि किसान हित की आड़ में यहां राजनीति हो रही है। कुछ लोग सरकार का विरोध करने के लिए इस तरह का उपद्रव कर रहे हैं। करनाल शहर पांच दिन तक एक तरह से बंधक बना रहा। आम आदमी को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। कानून व्यवस्था बना रखने के लिए तीन दिन इंटरनेट बंद रखे गए। इस वजह से लोगों को भारी दिक्कत आ रही थी। इसके बाद भी उपद्रव करने वाले बाज नहीं आ रहे थे।
विदेश से आया यहां भी फंड
सेक्टर-13 निवासी गगन चोपड़ा व राकेश जुनेजा ने बताया कि ऐसा लग रहा है कि धरने स्थल पर बड़ी मात्रा में बाहर से पैसा आ रहा है। यहां हर चीज उपलब्ध थी। पक्के टेंट तक लगा दिए गए थे। इससे यह संकेत मिल रहा है कि विदेश में बैठी समाज विरोधी ताकत इस आड़ में अपना खेल कर रही है। वह समाज को तोड़ने की कोशिश कर रहे है। यह एक गहरी सजिश हो सकतती है। जिसकी जांच होनी चाहिए।
राजनीति की जमीन तैयार करने की कोशिश
जिस तरह से गुरनाम सिंह चढूनी बार बार चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं, इससे उनकी मंशा पर सवाल उठ रहा है। क्‍या वे कृषि कानूनों को आधार बना कर अपने लिए राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। वे कुरूक्षेत्र से चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन बुरी तरह से हार गए थे। अब उनकी कोशिश है कि किसानों के दम पर खुद को राजनेता के तौर पर स्थापित किया जाए। करनाल में जो धरना था, इसमें बार-बार उनके समर्थन चुनाव लड़ने की वकालत करते नजर आए। इससे भी साफ है कि इस आंदोलन में जो दिख रहा है, वह कुछ और है और जो किया जा रहा है वह अलग है।