एजेंडा खड़ा करने के लिए मीडिया की ‘फिक्सिंग’

    दिनांक 14-सितंबर-2021
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जो महिला पत्रकार किसान नेता को ट्रैक्टर पर घुमा रही थी, किसान महापंचायत में वही घोषित हो गई ‘गोदी मीडिया’, उससे अभद्रता पर प्रेस की आजादी के पैरोकार खामोश
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बीते
कुछ सप्ताह से जिस कथित किसान महापंचायत का मीडिया में बहुत शोर था, वह मीडिया तक ही रह गई। पंचायत के नाम पर हुई इस रैली में न किसान दिखे, न किसानों के मुद्दे। उनके स्थान पर राजनीतिक भाषणबाजी, चुनावी शक्ति प्रदर्शन और पत्रकारों पर हमले हुए। प्रेस की आजादी की डींगें हांकने वाले पत्रकारों ने मुजफ्फरनगर में अपने साथियों पर हुए हमलों पर चुप्पी साध ली। वे जानते थे कि यह एक तरह की फिक्सिंग है। आजतक चैनल की जो महिला पत्रकार कुछ दिन पहले कथित किसान नेता को ट्रैक्टर में बिठाकर घुमा रही थी, कथित किसान नेता के समर्थकों ने उसे ही ‘गोदी मीडिया’ घोषित कर दिया। जनता भी हैरान है कि किसानों की आड़ में चल रहे इस प्रायोजित आंदोलन का महिमामंडन करने वाला उक्त मीडिया समूह रातोंरात कैसे ‘गोदी मीडिया’ बन गया। और ‘गोदी मीडिया’ का यह कैसा चैनल है जिसने अपनी ही महिला संवाददाता के साथ हुई अभद्रता के समाचार को दबा दिया? इससे भी बड़ी बात यह कि मीडिया के एक वर्ग विशेष ने इस हमले पर खुलकर प्रसन्नता जताई। न ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ पर चोट हुई, न ‘लोकतंत्र खतरे में’ पड़ा।

उधर ब्रिटिश करदाताओं के पैसे से चलने वाला बीबीसी पूरी तरह से तालिबान और पाकिस्तान के बचाव में उतर पड़ा है। चैनल की वीडियो रपटों में तालिबान के लिए ‘सेना’ और पंजशीर के लिए ‘आतंकी’ जैसे संबोधन प्रयोग किए जा रहे हैं। पंजशीर पर हमले में पाकिस्तानी सेना की भूमिका को पश्चिमी मीडिया ने पूरी तरह अनदेखी कर दिया। बीबीसी पर तालिबान विरोधी गुट के प्रवक्ता फहीम दश्ती की हत्या में तालिबान की सहायता करने के आरोप भी पर लग रहे हैं। चैनल ने उनके सैटेलाइट फोन का नंबर सार्वजनिक कर दिया, जिसके बाद फहीम दश्ती ड्रोन हमले में मारे गए। भारतीय मीडिया का एक बड़ा वर्ग है जो तालिबान के साथ पूरी सहानुभूति रखता है। कभी तालिबान के विरुद्ध कुछ बोलना पड़ जाए तो ये साथ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम लेना नहीं भूलते। स्वयं नहीं ले पाते तो जावेद अख़्तर जैसे छद्म उदारवादियों की सहायता ली जाती है।

उधर, कुछ अमेरिकी विश्वविद्यालयों के तत्वावधान में ‘डिस्मेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ नाम के सेमिनार पर भारतीय मीडिया लगभग मौन साधे हुए है। संभवत: इसलिए क्योंकि इस कार्यक्रम में कई कथित सेकुलर बुद्धिजीवियों, बड़े व्यापारिक समूहों और मिशनरी तंत्र का नाम सामने आ रहा है? नागपुर में कुछ मुस्लिम महिलाएं ‘विश्व हिजाब दिवस’ मनाने के लिए कुछ गैर-मुस्लिम अवयस्क लड़कियों को लेकर एक पार्क में पहुंचीं। वहां पर वे उन्हें हिजाब और बुर्का पहनने के लाभ बता रही थीं। स्थानीय लोगों ने इस पर आपत्ति की और उन्हें समझा-बुझाकर वापस भेज दिया। इंडियन एक्सप्रेस ने जो समाचार छापा, उसके साथ हाथों में तलवार लिए लोगों को दिखाया गया। जबकि इस चित्र का उस घटना से कोई लेना-देना नहीं था। हिंदू धर्म की गलत छवि बनाने का यह खेल भारतीय मीडिया बहुत सहज ढंग से करता रहता है।

उत्तर प्रदेश में चुनाव जैसे-जैसे पास आ रहा है, वहां से जुड़े झूठे समाचार भी बढ़ रहे हैं। लगभग हर चैनल पर विपक्षी प्रवक्ता यह कहते मिल जाएंगे कि उत्तर प्रदेश में बीते 5 वर्ष में 1,000 से अधिक ब्राह्मणों की हत्या हुई है। कोई उनसे यह नहीं पूछता कि यह आंकड़ा कहां से आया? सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने का यह खेल हर जाति और समुदाय के बीच खेला जा रहा है। मीडिया इसमें पूरी तरह भागीदार है।

छत्तीसगढ़ में एक सरकारी विद्यालय में कृष्ण जन्माष्टमी के दिन व्रत रखने पर कई छात्र-छात्राओं को पीटा गया। यह समाचार राष्ट्रीय तो दूर, स्थानीय समाचार पत्रों में भी अधिक जगह नहीं पा सका। देश के कुछ शहरों में जन्माष्टमी की शोभा यात्राओं पर पथराव के छिटपुट समाचार भी आए। अधिकांश समाचार संस्थानों में यह अलिखित नियम है कि हिंदुओं पर होने वाले हमले ‘छोटी-मोटी घटनाएं’ हैं, जबकि अन्य मजहबों पर हमले का झूठ गढ़कर भी कई दिन तक हल्ला मचाया जा सकता है। कोरोना काल में आयुर्वेद के महत्व को पूरे विश्व ने स्वीकार किया, लेकिन सेकुलर मीडिया का एक वर्ग अपनी औपनिवेशिक सोच से बाहर नहीं आ सका है। 'द टेलीग्राफ' ने छापा कि परीक्षणों में पाया गया है कि आयुष-64 नाम की दवा कोरोना की रोकथाम में प्रभावी नहीं है। जबकि परिणाम इसके बिल्कुल उलट हैं। समझा जा सकता है कि ऐसी फेक न्यूज क्यों और किनके लिए छपवाई जाती हैं।