तो अब मशीनी पत्रकार भी आने वाले हैं?

    दिनांक 14-सितंबर-2021
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 बालेन्दु शर्मा दाधीच

खबरों की दुनिया में एक नयी क्रांति आ रही है। पत्रकारों की जगह अब सॉफ्टवेयर बॉट्स खबरें लिख रहे हैं। यह खबरें कुछ सीमित क्षेत्रों से जुड़ी हैं और खास पैटर्न की हैं। फिलहाल यह काम अर्निंग
रिपोर्टों तक सीमित है
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चीन की सिन्हुआ खबर एजेंसी में वर्चुअल न्यूजरीडर के प्रयोग के बाद लगता है कि तकनीक मीडिया से जुड़े दूसरे मोर्चों पर भी दखल देने की तैयारी में है। इसका एक बड़ा उदाहरण है ऐसे सॉफ्टवेयर बॉट्स जो खबरें लिखने में सक्षम हैं। सक्षम ही क्यों, उन्होंने बाकायदा खबरें लिखना शुरू भी कर दिया है और ये खबरें पाठकों तक पहुंचने भी लगी हैं। आॅटोमैटेड इनसाइट्स नाम की अमेरिकी कंपनी तो हर साल अरबों की संख्या में ऐसी खबरें तैयार कर रही है।

फिलहाल तसल्ली की बात शायद यह है कि यह सब विकसित देशों, खास तौर पर अमेरिका में हो रहा है। ब्लूमबर्ग, एसोसिएटेड प्रेस, लास एंजिलिस टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट, द गार्जियन (आॅस्ट्रोलिया), वॉल स्ट्रीट जर्नल और डो जॉन्स जैसे मीडिया संस्थान किसी न किसी रूप में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बिग डेटा, मशीनी मेधा का इस्तेमाल करने लगे हैं। कहीं मशीनी रिपोर्टर आ गए हैं तो कहीं डेस्क स्टोरी तैयार करने वाले रोबोट और कहीं पत्रकारों को खबरें और लेख तैयार करने में सहयोग देने वाले बॉट्स (रोबोटिक सॉफ्टवेयर)। और ऐसा नहीं है कि यह महज प्रयोग के स्तर पर हो रहा है। मशीनी रिपोर्टरों, विश्लेषकों और संपादकों ने कुछ अखबारों और खबर एजेंसियों की तरफ से किए जाने वाले कवरेज को कई गुना बढ़ा दिया है। कुछ मामलों में तो एक दर्जन गुना। जैसे कि एसोसिएटेड प्रेस, जो कि कुछ महीने पहले तक हर तिमाही में कंपनियों की आय से जुड़ी सिर्फ 300 अर्निंग रिपोर्ट जारी किया करती थी, आज मशीनी पत्रकारों की मदद से औसतन 3,700 रिपोर्टें जारी कर रही है। न्यूयॉर्क टाइम्स, जिसने यह ब्यौरा जारी किया है, भी खबरें लिखने के लिए तो नहीं लेकिन कुछ दूसरे मामलों के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करने लगा है, जैसे कि पाठकों की निजी पसंद-नापसंद के आधार पर न्यूजलैटर तैयार करके भेजना और पाठकों से मिली टिप्पणियों के जवाब देना।

मुझ जैसे इनसान को आज भी इस बात पर यकीन करने में दिक्कत महसूस हो रही है कि क्या कोई सॉफ्टवेयर, एल्गोरिदम या तकनीक इनसान की ही तरह खबरों का विश्लेषण कर सकती है और इनसान जैसी ही पाठकों के समझने लायक भाषा में कोई रचना तैयार कर सकती है। जब हम इन मशीनी रिपोर्टरों और लेखकों की बनाई सामग्री पर नजर डालते हैं तो वे कुछ हद तक एक सेट पैटर्न पर आधारित सी लगती हैं। जैसे ब्लूमबर्ग न्यूज, जो आज ऐसी तकनीकों के जरिए हजारों खबरें तैयार कर रहा है, में यह काम फिलहाल कंपनियों की अर्निंग रिपोर्टों तक सीमित है। जैसे ही कंपनियों के आंकड़े जारी होते हैं, पलक झपकते ही ब्लूमबर्ग का 'साइबॉर्ग' नामक सिस्टम उनका विश्लेषण करके सेकेंडों में उन्हें खबरों का रूप दे देता है। ये खबरें तुरंत संपादकों को भेज दी जाती हैं जो निर्णय लेते हैं कि इनमें कोई बदलाव, सुधार या विस्तार तो नहीं करना है। और उसके बाद ये खबरें ब्लूमबर्ग के विभिन्न मीडिया माध्यमों पर चली जाती हैं। बोझिल आंकड़ों पर आधारित ये ऐसी खबरें हैं जो आम तौर पर किसी सामान्य रिपोर्टर या संपादक के लिए बड़ी माथापच्ची और बोरियत का विषय बन सकती हैं। कुछ मीडिया संस्थानों में इनका प्रयोग खेलों और मौसम की खबरों के लिए भी किया जा रहा है। एसोसिएटेड प्रेस की ऐसी खबरों को पढ़कर भी आप नहीं पहचान पाएंगे कि इन्हें किसी रोबोट ने लिखा है। इस कामयाबी की वजह शायद यही है कि कंपनियों की आय, खेल और मौसम जैसी खबरें एक तयशुदा खांचे में लिखी जाती हैं। असली चुनौती तब सामने आएगी, जब मशीनी रिपोर्टरों को राजनैतिक विश्लेषण, साहित्यिक समीक्षाएं और भविष्य की तसवीर का आकलन करने का काम मिलेगा। धीरे-धीरे ऐसे प्रयोग खबरों की मिलती-जुलती प्रकृति वाले अन्य क्षेत्रों में भी होंगे, जैसे- चुनाव नतीजे, खेती के भाव-ताव, दुर्घटनाएं आदि। वाशिंगटन पोस्ट के रोबोट रिपोर्टर को ही लीजिए। 'हैलियोग्राफ' नाम के इस रिपोर्टर ने इस अखबार के लिए पिछले ओलिंपिक खेलों के साथ-साथ पिछले चुनावों का भी कवरेज किया था। इस प्रयोग की बदौलत अखबार ने ग्लोबल बिग्गी अवार्ड्स में पुरस्कार भी जीता था।

घूम-फिरकर फिर वही सवाल आ खड़ा होता है कि क्या ऐसी खबरें लिखने वाले मशीनी पत्रकार इनसानी पत्रकांरों की नौकरियों के लिए खतरा बन जाएंगे? खुद इन संस्थानों के पत्रकारों ने तो कहा है कि उन्हें ऐसा नहीं लगता। बल्कि बॉट्स के जरिए उनका काम आसान हुआ है, तैयार सामग्री मिलने से उनका समय बच रहा है और इस बचे हुए समय का इस्तेमाल वे बेहतर खबरें तैयार करने में कर रहे हैं। 
  (लेखक सुप्रसिद्ध तकनीक विशेषज्ञ हैं)