जलांदोलन : आओ साथ चलें

    दिनांक 15-सितंबर-2021
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डॉ. मीना कुमारी जांगिड़

इस गांव और उसके आसपास सैकड़ों लोग समर्पित भाव से कुछ ऐसा काम कर रहे हैं कि बरसकर तेजी से बह जाने वाला पानी वहां कुछ थम सके। तेजी से हवा के साथ उड़ने वाली मिट्टी वहीं रुक सके। और गांव के उजड़े ओरण, उजड़ी खेती फिर से लहलहा उठे। पिछले चार-पांच दशक से आधुनिक विकास की नीतियों ने यहां के जीवन की जिस लय को, संगीत को बेसुरा किया है, उसे फिर से सुरमय बनाने वालों की टोली है- सुंदरपुरा गांव में - आओ साथ चलें
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आओ साथ चलें की टोली द्वारा पुनर्जीवित जलाशय के पास लोकगीत गाता स्थानीय भोपा

यह कहानी है एक ऐसी संस्था की जो अपने नाम को चरितार्थ करते हुए गांवों में जल संरक्षण ही नहीं, बल्कि जल संवर्धन का एक साइलेंट आंदोलन चला रही है। इस संस्था को काम करते देख, आसपास के गांवों के लोग इस आंदोलन से यूं ही जुड़ते चले जा रहे हैं। और ये गांव हैं राजस्थान के सूखे शेखावाटी इलाके में। यों तो रंगीला राजस्थान लोकगीतों से पटा पड़ा है, लेकिन इस क्षेत्र का एक बहुत ही लोकप्रिय और सरस लोकगीत है...कुण जी खुदाया कुवा बावड़ी, कुण जी खुदाया समद तालाब... हर लोकगीत की तरह लोकज्ञान और लोक संस्कृति को परोसते हुए।

खंडहर बने जलाशयों को सुधाने का मिशन
यह लोकगीत बीते युग में पारम्परिक जलाशयों की गाथा सुनाता है। ऐसे लोगों की यशोगाथा जिन्होंने अपने गांवों में पीने के पानी की कमी नहीं होने दी, उधर लोग गीत तो गुनगुनाते रहे, लेकिन उसका संदेश भूल गए। ये लोकगीत बीते जमाने की बात हुई तो जलाशय भी खंडहर शेष होने लगे। आज की युवा पीढ़ी नई धुनों के साथ पुराने लोकगीतों को बड़े ही चाव से सुनती है। थिरकती भी है पर उसका दिल नहीं धड़कता। लेकिन दिल्ली से दो सौ किलोमीटर दूर स्थित कोटपुतली के एक गांव में कुछ उत्साही लोगों ने तय किया, ‘आओ साथ चलें’। दिल्ली में रह रहे, इस गांव सुदरपुर के निवासी विष्णु मित्तल ने अपने पुराने मित्रों का हाथ थामा और निकल पड़े गांव के खंडहर हो चुके जलाशयों की हालत सुधारने। सुदरपुर को सुंदरपुर बनाने।

आज से चार साल पहले बनी यह छोटी-सी टोली, आज यहां के आसपास के क्षेत्र में अपने काम को खुद करने का वातावरण बना रही है। अपने काम में है अपना पाणी, अपनी घास, अपना चारा, अपना ओरण, अपना लक्ष्य, अपना स्वाभिमान। विष्णु मित्तल की पढ़ाई-लिखाई यहीं हुई। उसके बाद चार्टेड अकाउंटेंट बनने के बाद भी गांव से मोह छूटा नहीं। माता-पिता, बचपन के संगी-साथी वहीं रहते थे। शरीर दिल्ली में, लेकिन आत्मा सुदरपुर में ही बसती थी। बचपन में जिस गांव के तालाब किनारे अठखेलियां की हों, बरगद के पेड़ की छांह में गांव के बुजुर्गों से समाज के किस्से सुने हों, आज उसी गांव में जलाशयों की सुधबुध लेने वाला कोई नहीं। आगौर भी ऊबड़-खाबड़, बंजर भूमि में तब्दील होकर धीरे-धीरे अतिक्रमण का शिकार होने लगा। गांव के पास की पहाड़ियां जैव विविधता लिये होती थीं, आज हरियाली के नाम पर केवल कुछ रुटीन पेड़-पौधे। कुओं का जलस्तर दिनोदिन गिरता ही जा रहा था। यदि कुछ हो रहा था तो गांव से शहरों की ओर पलायन। अब इस पलायन को कैसे रोका जाए, गांव में चारों ओर खुशियां पुन: कैसे लौटाई जाएं, यह यक्ष प्रश्न था इस टोली के सामने।

श्रम साधना में लोक का साथ

विष्णु मित्तल ने ‘कुण जी खुदाया कुवा बावड़ी’ लोकगीत के मर्म को समझा। शुरूआत हुई गांव की बसावट की तह तक जाने की। जलाशय, जो गांव के बसने से पूर्व तैयार किए गए थे। अनेक श्रीमंतों ने इस पारम्परिक जलप्रणाली को स्थापित कर सदियों तक सुचारु बनाए रखा था। ये जलाशय गांव का आधार थे। मित्तल को लगा, गांव के इन जलाशयों को हर कीमत पर बचाना चाहिए। उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ गांव की आधारभूत व्यवस्था को लेकर वहां के किसानों से बातचीत करना शुरू किया और गांव में जगह-जगह टोलियां बनाकर लोगों को इस काम में जोड़ने की कोशिश में जुट गए।

सबसे पहले तो इस टोली ने अपने लोगों को समझाया कि गांव में जल प्रबंधन की जिÞम्मेदारी आज सरकार की ही नहीं है, यह काम तो हमेशा से समाज स्वयं करता आया है। इनके विनाश से पहला असर गांव को ही भोगना पड़ रहा है। उनके परदादा ने गांव में एक बावड़ी बनवाई थी। उन्होंने सबसे पहले उसी के जीर्णोद्धार का जिम्मा अपने कंधों पर लिया। पैसा तो स्वयं लगाया, लेकिन श्रमसाधना में सभी को जोड़ा। यह बावड़ी अकेले उनके उपयोग में नहीं आने वाली थी। इससे तो पूरे गांव का जल स्तर उठने वाला था।

लेकिन यह काम व्यक्तिगत न लगे, इसलिए उन्होंने गांव के पोखर को भी उसका मूल रूप लौटा देने का दायित्व अपने कंधों पर ले लिया। पोखर की पाल पर बने मंदिर में समस्त गांववालों को जुटाया। बुजुर्गों से उसकी विशिष्टता को समझा। उसके आगौर की छानबीन की। उसके किनारे पहले उगने वाले पेड़-पौधों के बारे में जाना। आज के युग की वास्तविकताओं का भी जायजा लिया। फिर एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की तरह उनका तुलन पत्र बनाया, योजना बनाई,वित्तीय आवश्यकताओं व संसाधनों का आकलन किया गया।

स्थानीय लोग, स्थानीय सोच, स्थानीय साधन
जन, जल, जंगल, जानवर, जमीन की बात रखने के लिए एक बैठक रखी गई। आसपास और कुछ दूर के अनुभवी लोगों को गांव में आने का न्योता दिया गया। मुख्य राजमार्गों से दूर छोटा-सा गांव, हाथ में न कोई साधन, न कोई विशेष संपर्क। लेकिन जज्बा था कुछ करने का। कोई तीन साल पहले, पहली बैठक हुई। लोगों ने अपने मुहल्ले, तालाब, कुओं, बीहड़ की स्थिति की बात की। कहां, क्या उजड़ गया है, कहां क्या रोका जा सकता है आदि बातें एक-दूसरे के सामने रखीं। जो घटनाएं पिछले कुछ दशकों से घट रही थीं, उनका मौन तो टूटा। बैठक के बाद मंदिर के पास वाले तालाब के आगर की कुछ मिट्टी निकाली गई।
सबके ध्यान में आ गया कि यह किसी अकेले के बस की बात नहीं है। सबने तय किया— आओ साथ चलें। बातों-बातों में इसी नाम से संस्था भी बन गई।

स्थापना के समय ही कुछ बातें तय की गई थीं। अपने क्षेत्र में पर्यावरण संवर्धन का जो काम करना है, उसमें यहीं के लोग तथा देसी सोच व साधन हों। मित्तल ने गांव के लोगों को भरोसा दिया कि वे वित्तीय संसाधनों की कमी नहीं होने देंगे। आज तीन साल बाद भी गांव के लोग इस बात को कहते हैं कि गांव के सपूत ने अपनी बात का मान रखा।
लेकिन मित्तल ने गांववालों से यह वादा लिया कि वे सब काम आमराय से करेंगे। समय-समय पर बैठक की जाएगी। और सब काम मिल-जुलकर किए जाएंगे। बैठक कभी मंदिर, तालाब किनारे तो कभी गोचर में, तो कभी गांवों के स्कूल में या पंचायत भवन में। बैठक के स्थान के सार्वजनिक होने से सभी लोग इसमें शामिल हो सकते हैं। स्त्री-पुरुषों के साथ बच्चों को भी जोड़ा गया। यहां होने वाली चर्चाएं घास, जंगल, पाणी, खेती पर ही होती रही हैं। आज तो यहां पर्यावरण संवर्धन बच्चों के जीवन का अंग बन चुका है।

साधन छोटे, साध्य बड़े
‘आओ साथ चलें’ संस्था ने छोटे-छोटे साधनों से बड़े साध्य को साधने की लम्बी यात्रा शुरू की। एक के बाद एक चौपाल होने लगी है। खंडहर में तब्दील हो चुके जोहड़, बावड़ियां पुनर्जीवित होने लगी हैं। पांच तालाबों का पुनर्निर्माण किया जा चुका है। छठे का काम चालू हो गया है। उनके पायतन को ठीक किया गया है ताकि जल अच्छे से तालाब तक पहुंच सके। जलाशय और पेड़ एक-दूसरे का आधार रहे हैं। उसी लोक विज्ञान को समझते हुए उपयुक्त प्रकार के पेड़ जोहड़ के किनारे लगाए गए हैं, तो आगौर में लगीं अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियां व झाड़ियां, ताकि पायतन को मजबूती भी मिले तो जल में औषधीय गुण भी आ सके। एक तालाब लगभग पांच एकड़ में फैला हुआ है। आज एक बारिश से तालाब, बावड़ियों का पानी न केवल पीने के काम में आने लगा है अपितु गांव का भू-जल स्तर भी बढ़ने लगा है। इसी प्रकार, उत्साही युवकों की इस टोली ने पानी के साथ साथ वन, ओरण की परम्परा के महत्व को भी समझा।

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जलाशय के पास बैनर लिये आओ साथ चलो की टोली

तालाब का पायतन पहाड़ी तक फैला था लेकिन अस्त-व्यस्त। बारिश के समय पहाड़ी का पानी इधर-उधर यूं ही बहकर बर्बाद होता रहता था। इस पानी को सही दिशा देकर उसे सहेजना जरूरी समझा गया जिससे तालाब में जल की उपलब्धता सालभर बनी रहे। साथ ही पहाड़ी को हरा-भरा रखने के लिए वृक्षारोपण कराया गया। इस कार्य के लिए एक अद्भुत प्रयास किया गया जिससे कि वृक्षारोपण भी हो तो लोगों को रोजगार भी मिलें। गांव की महिलाओं को दस-दस पेड़ लगाने की जिÞम्मेदारी सौंपी गई। मासिक मेहनताना भी तय किया गया। इसी प्रकार केशव वाटिका में भी हर साल सैकड़ों की संख्या में पेड़ लगाए जा रहे हैं जिससे पशु-पक्षियों को स्वच्छंद विचरण के साथ भरपूर घास मिल सके। विकेंद्रित व्यवस्था के महत्व को समझते हुए अलग-अलग क्षेत्र की समुचित देख-रेख हेतु व्यक्तियों की नियुक्ति भी की गई है

महामारी में भी हरसंभव मदद
वक्त के साथ संस्था का भी विस्तार हुआ। गांव में किसानों के साथ बैठकर नित नई योजनाएं बनाई जाने लगीं। वन्य क्षेत्र में रहने वाले वन्य प्राणियों के लिए भोजन-पानी की भी व्यवस्था शुरू की गई। वहीं महामारी के समय मदद का दायरा भी काफी बढ़ाया गया। जहां भी, जैसी जरूरत हुई, वहां हरसंभव मदद पहुंचाई गई जिसमें मुफ़्त दवा वितरण, राशन वितरण, उपचार की व्यवस्था, कन्यादान इत्यादि शामिल है।

कहते हैं, अच्छे मन से अच्छा कार्य शुरू किया जाए तो दो हाथ में और दो हाथ जुड़ते ही जाते हैं। कोटपुतली के सरकारी अस्पताल में महामारी के समय मरीजों के साथ आए उनके तीमारदारों के लिए भोजन मिलने की समस्या बढ़ गई थी। मुख्य कारण लॉकडाउन में आसपास के होटल, ढाबों का बंद हो जाना था। वहीं इस अवधि में अनेक लोग बेरोजगार हो चुके थे जिनके लिए इलाज के साथ दो वक्त की रोटी का जुगाड़ बहुत ही विकट समस्या बन चुकी थी। संस्था ने यहां भी एक नया प्रयोग किया। आज जन्मदिन मनाना भी बड़े उत्सव का रूप ले चुका है। इन सब मित्रों ने मिल कर तय किया कि हम अपना जन्मदिन अस्पतालों में एक वक्त का भोजन करवाकर मनाएंगे। देखते ही देखते इस पुण्यकार्य से सैकड़ों लोग जुड़ने लगे। सुफल यह कि आज कोटपुतली के अतिरिक्त देश की राजधानी के तीन बड़े अस्पतालों में तीमारदारों को भोजन कराया जा रहा है।

जुनून के साथ चुपचाप काम का हिसाब

संस्था के खर्च, इतने बड़े कार्यों के लिये किए धन संग्रह भी कुछ पक्के नियमों के साथ। जितनी आवश्यकता, उतना संग्रह। जितना संग्रह, उतना काम। साधनों को जुटाने और इन्हें किफायत से खर्च करने का असर दूसरों पर भी पड़ता है। इस संस्था में अनेक व्यक्ति बिना किसी आमदनी और खर्च के संस्था के कार्य करते हैं। संस्था रजिस्टर्ड है।

संस्था द्वारा यह काम बहुत ही धीरज के साथ खड़ा किया गया है। इसमें लक्ष्य संख्या, आंकड़ों, संसाधनों, पैसे-रुपयों का नहीं, बस जुनून के साथ चुपचाप काम का हिसाब रखा गया है। गांव में बाहर के लोग, कुछ मित्र, शुभ चिंतक भी आते रहते हैं। बड़े ही आत्मीय भाव से स्वागत होता है। तालाब के किनारे रावणहत्थे के साथ गीत गाता लोकगायक बैठकों को नए ढंग से रंग देता है। ढोलक की थाप, नगाड़ा, मंदिर की घंटी, गांव में गूंजने लगती है। पानी से लबालब तालाब, वन में उभरती हरियाली, जंगल में जगह-जगह पूड़ियां, मौसमी साग-सब्जिÞयां खाते बंदर, पक्षियों का चहकना आज फिर से गांव में आई नई दुलहन के मन में उत्सुकता भर देता है- ‘कुण जी खुदाया कुवा बावड़ी कुण जी बंधाया वाव तालाब।’
(थार मरुस्थल में पारंपरिक जल संरक्षण पर हाल ही लेखिका की एक पुस्तक प्रकाशित हुई है)