इतिहास और साहित्य की तीर्थ नगरी

    दिनांक 15-सितंबर-2021
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अनिल अग्निहोत्री

मंदसौर की तहसील सीतामऊ में महाराजकुमार डॉ. रघुबीर सिंह ने अपने इतिहास प्रेम को अमर करने के लिए अपनी निष्ठा और समर्पण से दुर्लभ पुस्तकों से सुसज्जित एक शोध संस्थान का निर्माण किया। इस शोध संस्थान में छब्बीस हजार से अधिक पुस्तकें संग्रहित हैं। ग्रंथागार में 5,458 पांडुलिपियां और यूरोप के उल्लेखनीय संग्रहालयों में सुरक्षित पांडुलिपियों के लगभग एक लाख पृष्ठों की माइक्रोफिल्म प्रतियां भी सुलभ हैं
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श्री रघुबीर लाइब्रेरी की इमारत

इतिहास मात्र तिथियों और सन्, संवतों का दस्तावेज नहीं होता और न ही घटनाओं का वृत्तान्त। वह अपने आप में एक समूचे काल खण्ड की राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक भावभूमि के साथ ही भौगोलिक विरासत का भी लेखा-जोखा होता है जो कालांतर में अपने अतीत में झांकने और उसे समझने का सुअवसर प्रदान करता है। प्रजातंत्र के पूर्व राजशाही का शासन, उसकी कुटिल नीतियां, साम्राज्य विस्तार की बलवती महत्वाकांक्षाएं, ये सभी प्राचीन इतिहास का अंग रही हैं। सेनाओं का कूच करना, अस्त्र-शस्त्रों से रणांगण को सज्जित करना, संधि और समझौतों हेतु पत्राचार करना, गरीब मजदूरों के श्रम से विशालकाय किलों का निर्माण करना सत्तापिपासु राजाओं और मुस्लिम शासकों का प्रिय शगल रहा है। यही कारण है कि राजशाही और लोकशाही के मध्य एक विभेदक रेखा खींचने पर हमें ज्ञात होता है कि राज सत्ताएं कभी दयालु नहीं रहीं, बल्कि निर्ममता की पराकाष्ठा से ओत-प्रोत तथा विस्तारवादी चिंतन के प्रति सर्वाधिक ध्येयनिष्ठ रहीं।

इतिहास रचना और इतिहास लिखना, मूलत: ये दोनों पृथक-पृथक विधाएं हैं। इतिहास वही रचते हैं जिनकी शिराओं में शौर्य और पराक्रम का रक्त प्रवाहित होता है। वही इतिहास दीर्घजीवी होता है जिसमें सत्य का साकार हो, अत्युक्ति का अहंकार नहीं। इतिहास को तथ्य और प्रामाणिकता से अनुप्राणित होना चाहिए। इतिहास लेखन की सबसे बड़ी शर्त उसकी निष्पक्षता है। दुर्भाग्य यह रहा कि स्वतंत्रता के बाद हमें इतिहास के उस पक्ष से रू-ब-रू कराया गया जो इतिहास कभी था ही नहीं। लेकिन सीतामऊ में बना एक संस्थान इस मायने में अद्भुत है।

पाठक सोच रहे होंगे कि आखिर यह सीतामऊ कहां है? और वहां ऐसा क्या है जिसे साहित्य और इतिहास की तीर्थ नगरी के रूप में अलंकृत किया जाता है! दरअसल, यह छोटी-सी तहसील सीतामऊ मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में अवस्थित है। यहीं पर है नटनागर शोध संस्थान के अंतर्गत स्थापित रघुबीर लाइब्रेरी एवं शोध संस्थान। यहां साहित्य और इतिहास के दुर्लभ और प्रामाणिक ग्रंथों को जिस तरह सहेज कर रखा गया है, वह निश्चित रूप से प्रशंसनीय है।

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सीतामऊ के महाराजकुमार डॉ. रघुबीर सिंह इतिहासवेत्ता होने के साथ-साथ साहित्यकार भी थे। वे मेरे स्मरण में तब आये जब मैं कक्षा नवम् का छात्र था और पाठ्यक्रम में उनका 'ताज' निबंध था। उस निबंध को पढ़ने के बाद मेरे मानस पटल पर डॉ. रघुबीर सिंह वर्षों तक अपना स्थान बनाये रहे। मार्मिक एवं सजीव चित्रण से युक्त ‘ताज’ निबंध आज भी मेरी स्मृति की धरोहर है।

1947 में भारत के स्वतंत्र होने और रियासतों के विलीनीकरण के उपरांत जिन राजा-महाराजाओं ने अपने वैभव सहित पुस्तकालयों को साज-संभाल कर रखा, उनमें महाराजकुमार डॉ. रघुबीर सिंह का नाम प्रथम पंक्ति में आता है। राजघरानों में साहित्य प्रेमी और इतिहासानुरागी प्राय: कम देखने को मिलते हैं-पर सीतामऊ के इन महाराजकुमार ने रियासती राजाओं की सुस्थापित राजसी वैभवपूर्ण शैली की मान्य परम्पराओं से इतर अपने अध्यवसाय, पठन-पाठन और लेखन की अभिरुचि से सीतामऊ में एक ऐसा शोध केंद्र स्थापित किया जो आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है। यही कारण है कि प्राचीन भारत के इतिहास पर वास्तविक शोध कार्य के लिए किसी भी शोधार्थी के लिए इस ग्रंथागार की सहायता अनिवार्यता बन गई है।

नटनागर शोध संस्थान
सीतामऊ (मालवा) स्थित यह शोध संस्थान तीन भागों में विभक्त है। पहला 'केशवदास अभिलेखागार', जो छोटे से प्राचीन किले में स्थित है। केशवदास अभिलेखागार में 19वीं शताब्दी के क्षेत्रीय इतिहास से संबंधित पांडुलिपियां एवं बहियां विद्यमान हैं, जिन्हें आज भी पर्याप्त देखरेख में संभालकर रखा गया है। दूसरी इकाई के रूप में राजसिंह संग्रहालय लदूना है जिसमें भित्तिचित्र, शैल चित्रों सहित प्राचीन सिक्कों तथा ताम्रपत्रों से मनोहारी स्वरूप देकर इसे दर्शनीय बनाने की प्रस्तावना है। तीसरी प्रमुख इकाई है नटनागर शोध संस्थान।

रघुबीर लाइब्रेरी और शोध संस्थान
यह ग्रंथागार महाराजकुमार के निजी राजकीय आवास के एक भाग में स्थित है। अपने स्थापना काल से निरंतर विकसित यह ग्रंथागार मध्यकालीन भारतीय इतिहास पर, विशेषत: 17वीं और 18वीं शताब्दी के इतिहास पर कार्य कर रहे शोधार्थियों के लिए अत्यधिक उपयोगी है। सर जदुनाथ सरकार का यह कथन निस्संदेह शोध संस्थान की सार्थकता को प्रतिबिम्बित करता है -

‘‘स्वतंत्र भारत के इतिहास में जब भी किसी शोध संस्थान की सूची तैयार की जाएगी, 'नटनागर शोध संस्थान' को एक अनिवार्य और सुस्थापित शोध केंद्र के रूप में सम्मिलित करना ही होगा। रघुबीर लाइब्रेरी के उपयोग के बिना देश के प्राचीन इतिहास पर कोई शोध किया जाना संभव नहीं होगा। इस संस्थान की स्थापना का उद्देश्य न केवल संग्रहीत ऐतिहासिक पुस्तकों की सुरक्षा करना है, प्रत्युत उसे अधिकाधिक सुसमृद्ध करना भी है।’’

क्या-क्या है शोध संस्थान में?

वर्तमान में इस शोध संस्थान में छब्बीस हजार से अधिक पुस्तकें संग्रहीत हैं जिसमें से अधिकांश हिंदी, मराठी, फारसी और अंग्रेजी के दुर्लभ ग्रंथ हैं। यहां 5,458 पांडुलिपियां हैं जिनमें इतिहास एवं पुराण, दर्शनशास्त्र, आयुर्वेद, वेद एवं उपनिषद्, संगीत एवं नृत्य, जैन धर्म, गीता और कुरान, ज्योतिष, हिंदी साहित्य, तंत्र-मंत्र और भूगोल से संबंधित हस्तलिखित ग्रंथ हैं। पुस्तकों और पांडुलिपियों के अतिरिक्त ग्रंथागार में ब्रिटिश म्यूजियम लंदन, इंडिया आॅफिस लाइब्रेरी, रॉयल एशियाटिक सोसाइटी लंदन, वाडलियॉन लाइब्रेरी पेरिस और यूरोप के अन्य उल्लेखनीय संग्रहालयों में सुरक्षित पांडुलिपियों के लगभग एक लाख पृष्ठों की माइक्रोफिल्म प्रतियां भी सुलभ हैं। पुणे के पेशवा दफ्तर संग्रह में संग्रहीत फारसी अभिलेखों की लगभग तीस हजार फोटो प्रतिलिपि और माइक्रोफिल्म्स भी संस्थान में संग्रहीत हैं। यहां ब्राह्मी लिपि के पट्ट लेख भी यहां उपलब्ध हैं पर इस भाषा के जानकार इस देश में नहीं बचे हैं।

ग्रंथागार में महाराजकुमार के निबंध संग्रह 'शेष स्मृतियां' (जिसमें ‘ताज’ निबंध भी संग्रहित है) की मूल पांडुलिपि भी विद्यमान है। और सबसे अधिक आश्चर्य और गौरव की बात तो यह है कि महाकवि 'प्रसाद' की कामायनी और महीयसी महादेवी वर्मा रचित दीपशिखा कृतियां उनकी ही हस्तलिपि (पांडुलिपि) में साहित्य के अध्येताओं के लिए अमूल्य रत्न के रूप में देखने के लिए यहां उपलब्ध हैं। संस्थान को और अधिक सुसम्पन्न बनाने के लिए ग्वालियर अंचल के सुप्रसिद्ध इतिहासकार स्व. डॉ. हरिहर निवास द्विवेदी के सम्पूर्ण ग्रंथागार का इसी संस्थान में संविलयन भी हो गया है।


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संस्थान में नियमित रूप से आने वाली पत्र-पत्रिकाओं में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी लंदन, एशियाटिक सोसाइटी कोलकाता, बंगाल पास्ट एंड प्रेजेंट, दि इंडियन हिस्टोरिकल आदि प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं। संस्थान में उपलब्ध ग्रंथों की सामग्री की जानकारी बहुत ही संक्षेप में यहां अंकित की गई है तथापि बहुतेरे दुर्लभ ग्रंथों के कारण यह संस्थान आज भी इतिहास के छात्रों के लिए शोध स्थली बना हुआ है। संस्थान में अकादमिक गतिविधियों के रूप में प्राय: एकाध वर्ष के अंतराल से इतिहास की राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जाता रहा है। वर्ष 1984 से प्रारंभ हुए क्रम में अभी तक यहां 18 राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन संस्थान द्वारा किया जा चुका है जिसमें देश के ख्यातनाम इतिहासवेत्ताओं की सहभागिता रही है। संस्थान ने अभी तक अपने प्रकाशन से उन्तीस पुस्तकें भी प्रकाशित की हैं। शोध पत्रिका 'शोध साधना' का भी संस्थान से प्रकाशन होता रहा है जो निश्चित ही संस्थान की उपलब्धियों का आख्यान है।

निष्कर्ष की परिदृष्टि
किसी भी संस्थान की सफलता के लिए दूरदृष्टि, कठिन परिश्रम, निष्ठा और समर्पण मुख्य तत्व होते हैं। महाराजकुमार इतिहासविद् होने के साथ-साथ दूरद्रष्टा भी थे। उन्हें अपने बाद संस्थान के सफल संचालन के लिए किसी एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो तन-मन से अहर्निश अपनी सेवाएं दे सके। इस मोती की तलाश में उन्हें स्व. डॉ. मनोहर सिंह जी राणावत मिले जिन्होंने महाराजकुमार के साथ लगभग बीस वर्ष कार्य कर तथा उनके निधनोपरांत भी अपनी कर्मनिष्ठा से संस्थान को उपलब्धियों के शिखर तक पहुंचाया। कोरोना काल मे हृदयाघात से उनका देहगमन होने के कारण रिक्तता की प्रतिपूर्ति के रूप में डॉ. रेखा द्विवेदी निदेशक के रूप में संस्थान का कार्यभार देख रही हैं और उन्हें भी सहयोगी के रूप में डॉ. सहदेव सिंह चौहान जैसे मणि मिले हैं जो पलक झपकते ही पुस्तकालय से संदर्भित ग्रंथ और संबंधित पृष्ठ की वांछित जानकारी शोधार्थी को उपलब्ध करा देते हैं। संस्थान में अनुवादकों सहित पर्याप्त कर्मचारी हैं पर वर्तमान परिस्थितियों में अब इनका दायित्व बढ़ गया है। संस्थान की गतिविधियां सुचारु रूप से चलती रहें, यही सफलता का उद्देश्य भी है।

महाराजकुमार डॉ. रघुबीरसिंह के निधनोपरांत उनके पुत्र कृष्ण सिंह जी राठौर, जो मध्य प्रदेश शासन में पुलिस महानिदेशक रह चुके हैं, इस संस्थान के संरक्षक रहे और अब उनके बाद उनके पुत्र राजा श्री पुरंजयसिंह जी इस संस्थान के संरक्षक के रूप में कार्यभार देख रहे हैं। यह संस्थान मध्य प्रदेश सरकार द्वारा अनुदानित है। यहां सभी भाषाओं के अनुवादकों सहित शोधार्थियों के रहने के लिए एक सर्व-सुविधा युक्त अतिथि-गृह भी है। इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए निस्संदेह सीतामऊ (मालवा) एक तीर्थ नगरी काशी जैसी है जो प्राचीन भारत की एक लम्बी, लिखित और दुर्लभ इतिहास की विरासत को अपने-आप में समाए हुए है। अवसर मिले तो एक बार अवश्य जाना चाहिए और यह समझना चाहिए कि किस तरह एक महाराजकुमार ने अपने इतिहास प्रेम को अमर करने के लिए अपनी निष्ठा और समर्पण से दुर्लभ पुस्तकों का यह गंथागार निर्मित किया है।