नहीं डालेंगे हथियार अफगानिस्तान के कार्यवाहक राष्ट्रपति सालेह, अंगरक्षक से कहा—'घायल हो जाऊं तो मार देना गोली'

    दिनांक 06-सितंबर-2021   
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अमरुल्लाह सालेह स्वयं पंजशीर में एक बेहद सुरक्षित ठिकाने पर हैं। वे वहीं से तालिबान के विरुद्ध संघर्ष का बीड़ा उठाए हुए हैं और रेसिस्टेंस फोर्स की अगुआई कर रहे हैं
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अमरुल्ला सालेह  (फाइल चित्र)

अफगानिस्तान
पर तालिबान के बंदूक के जोर पर कब्जे से पहले वहां के उपराष्ट्रपति और अब 'कार्यवाहक' राष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह तालिबान के सामने हथियार डालने को बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं। इतना ही नहीं वे 'रेसिस्टेंस फोर्स' के लड़ाकों को भी जोश दिलाए हुए हैं। ब्रिटेन के डेली मेल अखबार में उनका लिखा आलेख स्पष्ट करता है कि आईएसआई उनकी 'पराजय' होने की जितनी चाहे झूठी खबरें उड़वाए, लेकिन असलियत यही है कि पंजशीर अभी तक अजेय है।

अमरुल्लाह सालेह स्वयं पंजशीर में एक बेहद सुरक्षित ठिकाने पर हैं। वे वहीं से तालिबान के विरुद्ध संघर्ष का बीड़ा उठाए हुए हैं और रेसिस्टेंस फोर्स की अगुआई कर रहे हैं। यह बल फिलहाल बिना किसी बाहरी मदद के उसका निडरता से मुकाबला कर रहा है। सालेह ने एक बार फिर से साफ किया है वे तालिबान के आगे हथियार नहीं डालेंगे। हालांकि ऐसी खबरें भी कुछ जगह दिखाई दी हैं जो बताती हैं कि तालिबान ने पंजशीर घाटी पर फतह पा ली है, लेकिन रेसिस्टेंस फोर्स ने ऐसी खबरों को दुष्प्रचार कहकर इनका खंडन कर दिया है।  

सरकार से कोई समर्थन न मिलने की सूरत में सालेह ने अहमद मसूद से बात की थी। आगे की योजना बनाई थी। फिर उन्होंने अपने मुख्य अंगरक्षक को कुरान पर हाथ रख कर कसम खिलाई थी कि 'हम लोग पंजशीर जा रहे हैं। सब सड़कों पर तालिबान का कब्जा है। हम लड़ाई लड़ेंगे। उसमें अगर में घायल होता हूं तो मेरे सिर में दो बार गोली मार देना।'

बताते हैं उन्होंने अपने अंगरक्षक को साफ हुक्म दे दिया है कि अगर तालिबान से लड़ते हुए वह घायल होते हैं, तो उनके सिर में गोली मार देना। सालेह ने ब्रिटेन के दैनिक डेली मेल में एक लेख लिखा है। इसमें उन्होंने एक बार फिर खुद को अफगानिस्तान का कार्यवाहक राष्ट्रपति लिखा है। पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी के देश छोड़कर भाग जाने पर सालेह का कहना है कि वे मानते हैं कि जो नेता देश छोड़कर चले गए, उन्होंने वतन के साथ धोखा किया है। उल्लेखनीय है कि पिछले महीने तालिबान के काबुल पर कब्जा होने पर बजाय उससे लड़ने के वे देश छोड़कर भाग गए, या भूमिगत हो गए।

उन्होंने लिखा है कि जिस रात को तालिबान काबुल पहुंचा था, तब उन्हें वहां के पुलिस प्रमुख ने फोन करके बताया कि था जेल में बलवा होने लगा है, तालिबानी कैदी भाग खड़े होना चाहते हैं। तब सालेह ने गैर-तालिबानी बंदियों को एकजुट करके उसके विरोध का हुक्म दिया था। उन्होंने लेख में लिखा, ‘जेल में स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अफगान विशेष बल को तैनात किया गया था।

सरकार से कोई समर्थन न मिलने की सूरत में सालेह ने अहमद मसूद से बात की थी। आगे की योजना बनाई थी। फिर उन्होंने अपने मुख्य अंगरक्षक को कुरान पर हाथ रख कर कसम खिलाई थी कि 'हम लोग पंजशीर जा रहे हैं। सब सड़कों पर तालिबान का कब्जा है। हम लड़ाई लड़ेंगे। उसमें अगर में घायल होता हूं तो मेरे सिर में दो बार गोली मार देना।' सालेह ने लिखा है कि वे कभी भी तालिबान के सामने घुटने नहीं टेकेंगे।