फाइजर वैक्सीन हो रही असफल, 6 महीने में 80 प्रतिशत तक घट रही हैं एंटीबॉडी

    दिनांक 07-सितंबर-2021   
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प्रोफेसर डेविड कैनेडे के अनुसार, टीकाकरण के छह महीने बाद चिकित्सालय के 70 प्रतिशत मरीजों के खून को जांचने पर पता चला कि उनमें कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने वाली एंटीबॉडी बहुत कम थीं
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प्रतीकात्मक चित्र 
अमेरिका को अब एक अलग ही चिंता सताने लगी है। बहुत भरोसे के साथ उसने जिस फाइजर वैक्सीन को कोरोना के विरुद्ध अचूक रामबाण माना हुआ था, वह एक नए अध्ययन में असफल साबित होती दिख रही है। इसकी दोनों खुराकें लेने के छह महीने बाद ही लोगों में 80 प्रतिशत तक एंटीबॉडी कम पाई गई हैं।
अमेरिका में केस वेस्टर्न रिजर्व विश्वविद्यालय और ब्राउन विश्वविद्यालय की अगुआई में हुए ताजा अध्ययन में एक स्थानीय चिकित्सालय में रह रहे 120 मरीजों और 92 स्वास्थ्य कर्मियों के खून के नमूनों के साथ यह अध्ययन हुआ था। इसी के नतीजों को देखकर वैज्ञानिक नई चिंता में पड़ गए हैं।
अध्ययनकर्ताओं ने 'ह्यूमोरलर इम्युनिटी' की जांच की ताकि सार्स-कोव-2 वायरस के विरुद्ध शरीर की प्रतिरोधक क्षमता का अंदाजा ले सकें। यही वायरस है जिससे कोरोना महामारी होती है। अध्ययन से पता चला है कि टीके की दोनों खुराकें लेने के छह महीने के बाद, लोगों की 80 प्रतिशत एंटीबॉडी कम हो गईं।
मरीजों के खून को जांचने पर पता चला कि उनमें कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने वाली एंटीबॉडी बहुत कम थीं। कैनेडे का कहना है कि अब संबद्ध संस्थान विशेष रूप से बड़ी उम्र के लोगों के लिए बूस्टर खुराक लेने की सिफारिश का समर्थन कर रहे हैं। केस वेस्टर्न रिजर्व विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डेविड कैनेडे के अनुसार, टीकाकरण के छह महीने बाद चिकित्सालय के 70 प्रतिशत मरीजों के खून को जांचने पर पता चला कि उनमें कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने वाली एंटीबॉडी बहुत कम थीं। कैनेडे का कहना है कि अब संबद्ध संस्थान विशेष रूप से बड़ी उम्र के लोगों के लिए बूस्टर खुराक लेने की सिफारिश का समर्थन कर रहे हैं।
कुछ दिन पहले ही एक अध्ययन में सामने आया था कि फाइजर और एस्ट्रोजेनेका वैक्सीन कोरोना वायरस के अल्फा म्यूटेंट की तुलना में डेल्टा म्यूटेंट के विरुद्ध उतनी कारगर नहीं हैं।