अल्लाह-हू-अकबर नहीं, जाट बलवान-जय भगवान

    दिनांक 09-सितंबर-2021   
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ये बताने की जरूरत तो कतई नहीं है कि धरनाजीवी तथाकथित किसान नेता राकेश टिकैत कौन हैं. लेकिन ये जानना अब बेहद जरूरी हो गया है कि टिकैत असल में क्या हैं. क्या वह किसान हैं. नहीं...अकूत संपत्ति के साथ बड़े व्यापारी हैं. क्या वह किसानों के मुद्दे को भुनाते रहे हैं. जी हां...वह दो बार चुनाव लड़कर जमानत जब्त कराते रहे हैं.rakesh_1  H x W

ये बताने
की जरूरत तो कतई नहीं है कि धरनाजीवी तथाकथित किसान नेता राकेश टिकैत कौन हैं. लेकिन ये जानना अब बेहद जरूरी हो गया है कि टिकैत असल में क्या हैं. क्या वह किसान हैं. नहीं...अकूत संपत्ति के साथ बड़े व्यापारी हैं. क्या वह किसानों के मुद्दे को भुनाते रहे हैं. जी हां...वह दो बार चुनाव लड़कर जमानत जब्त कराते रहे हैं. क्या टिकैत वास्तव में कृषि क्षेत्र में सुधार के तीन कानूनों के विरोधी हैं. जी नहीं...ये कानून उनके पिता व सच्चे किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के समय से चली आ रही सुधारों की मांग को पूरा करते हैं. अचानक विरोध में उतरने से पहले, जिस समय ये कानून संसद में बने, टिकैत ने इन्हें अपनी मांगें पूरी होने की जीत बताया था.

सवाल उठने लगे हैं कि फिर टिकैत है क्या. क्या चाहते हैं. पंजाब के आढ़ती वेशधारी किसानों के कृषि कानून विरोधी आंदोलन की शतरंज में वह कहां फिट बैठते हैं. क्या इतने लंबे आंदोलन को खुद वह अपने दम पर चला रहे हैं, या कहीं से फंडिंग हैं. प्रेरणा और बहुत स्पष्ट राजनीतिक प्रेरणा तो नजर आती ही है. साथ ही उनका एजेंडा भी ये साबित करने के लिए काफी है कि ये फंडिंग कम से कम राष्ट्र का भला चाहने वाली ताकतों से नहीं आ रही है. अभी हाल ही में वह इस्लामिक मतांध शासक टीपू सुल्तान की कब्र पर सजदे करते नजर आए. जी हां, यह वही टीपू सुल्तान है, जिसने 50 हजार से ज्यादा हिंदुओं की हत्या की.

10 लाख से ज्यादा हिंदुओं का जबरिया कन्वर्जन कराया. जिसने अपनी तलवार पर लिखवाया कि अल्लाह मुझे इतनी ताकत बख्शे कि मैं इस धरती से काफिरों को नामो-निशां मिटाकर इस्लाम का राज स्थापित कर सकूं. जैसे राकेश टिकैत को टीपू सुल्तान अचानक से प्रिय हो गए हैं, वैसे ही इसे देश में तथाकथित बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, आंदोलनजीवियों, वामपंथियों, एजेंडाधारी इतिहासकारों और मुस्लिम परस्त राजनीति करने वालों के लिए टीपू सुल्तान एक हीरो है. टीपू टिकैत और इस गैंग का हीरो होने की तमाम खासियतों से लैस भी तो था. वह हिंदू विरोधी था. हिंदुत्व का नामो-निशान मिटाना चाहता था.आप कुल मिलाकर इस तरह से समझिए, हर रामद्रोही के लिए टीपू, हैदर अली, औरंगजेब, बाबर, अकबर, जहांगीर, बलबन, मोहम्मद बिन कासिम जैसे आतातायी आक्रांत हीरो हैं.

लेकिन टिकैत के टीपू प्रेम और इस्लाम और पाकिस्तान परस्त भारत विभाजक ताकतों का मोहरा बनने पर अलग से चर्चा करने की जरूरत है. उन तमाम चेहरों को हम जानते हैं और आज किनारे लगा चुके हैं, जो सदियों से हिंदू समाज के विघटन के प्रयास करते रहे हैं. सही शब्दों में कहा जाए, तो ये लोग एक्सपोज हो चुके हैं. इनके बोलने से पहले हर हिंदू को पता होता है कि ये बस विषवमन करेंगे. ये राम को काल्पनिक बताएंगे. ऐसा साहित्य रच डालेंगे, जो हमारे हिंदू धर्मग्रंथों, प्रतीकों और मान्यताओं को चोट पहुंचाता हो. ये ऐसा इतिहास लिख डालेंगे, जिसमें हमारे छत्रसाल, राणा सांगा, महाराणा प्रताप, लचित बरफुकन, राणा कुंभा, गोरा-बादल जैसे हिंदू नायक गायब होंगे और अकबर महान हो जाएगा. अब इस गैंग को नए चेहरों की तलाश है. इसी तलाश में ये गैंग राकेश टिकैत जैसे गुब्बारे फुलाता है.

राकेश टिकैत के पैरों के नीचे न तो जमीन है और न ही जनाधार. खुद चुनाव लड़कर जमानत जब्त करा चुके हैं. मुजफ्फरनगर के निवासी टिकैत का जो गृह क्षेत्र है, उसके लोकसभा और विधानसभा चुनाव में वह घर-घर जाकर भी भाजपा के उम्मीदवार को जीतने से न रोक सके. और अब तो भारत विरोधी गैंग का हीरो बन चुके हैं, लेकिन अपने घर में ये हालत है कि जिला पंचायत जैसा छोटा चुनाव उनका प्रतिनिधि उन्हीं के क्षेत्र से हार गया. तो ऐसे हालात में मुजफ्फरनगर में महापंचायत करने का उद्देश्य समझ आता है. लेकिन उसी पंचायत में उन्होंने मंच से नारा गया, अल्लाह हू अकबर.

अब टिकैत जिन हाथों में खेल रहे हैं, ये उम्मीद करना तो बेमानी है कि उन्हें इसका मतलब पता नहीं होगा. मतलब है, अल्लाह सबसे बड़ा है. ये नारा ए तकबीर है. वैसे तो इसका इस्तेमाल मुअज्जिन अजान के समय लोगों को नमाज के लिए बुलाने के वास्ते करते हैं. लेकिन इस नारा ए तकबीर का इस्लामिक इतिहास पूरी तरह रक्तरंजित है. हर इस्लामिक आक्रांता इसी नारा ए तकबीर पर सवार होकर निकला है. इसी नारा ए तकबीर की गूंज के बीच भारत भूमि पर इस्लामिक आक्रांताओं से हमारे पूर्वजों का संघर्ष हुआ है. इसी नारा  ए तकबीर का नतीजा लाखों हिंदुओं की हत्या है. यह भले ही अजान का हिस्सा हो, लेकिन अतीत और वर्तमान बताता है कि ये मुसलमानों के लिए युद्धघोष का काम करता रहा है.

राकेश टिकैत जाट समाज से आते हैं. पश्चिम उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में फैले जाट समाज को कृषि प्रधान और कट्टर राष्ट्रभक्त माना जाता है. जिनके दिन की शुरुआत राम-राम से होती है. फिर उसी जाट समाज की बालियान खाप के चौधरी परिवार के एक सदस्य का नारा ए तकबीर लगाने का क्या उद्देश्य हो सकता है. और क्या वह उम्मीद करते हैं कि मुजफ्फरनगर के मोहम्मद जौला (2013 के जाट नरसंहार वाले दंगे का मास्टर माइंड) के साथ मंच पर गले मिलेंगे, पैर छुएंगे, और जाट समाज कवाल कांड को भूल जाएगा. मलकपुर में हुए नरसंहार को भूल जाएगा. भूल जाएगा सदियों से चले आ रहे इस्लामिक आक्रांताओं के साथ अपने संघर्ष को. संदिग्ध फंडिंग के दम पर देश व हिंदू विरोधी गैंग की कठपुतली बने राकेश टिकैत अगर ये सोचते हैं कि इस तरह की मुस्लिम परस्ती से वह किसी राजनीतिक दल के लिए 2022 के चुनाव में मुफीद माहौल बना लेंगे, तो मुगालते में हैं.

जाट का मतलब सिर्फ खाप नहीं है. जाट का मतलब सिर्फ किसान यूनियन नहीं है. जाट का मतलब इससे कहीं आगे है. जाट का मतलब है अन्याय और आक्रांता के खिलाफ धर्मयुद्ध. ये सिलसिला गोकुल जाट से शुरू होता है, महाराजा सूरजमल से होते हुए जाट रेजीमेंट के शौर्य तक पहुंचता है. ये रागनियो में जिंदा है, जो आज भी गांव-गांव सुनी जाती हैं. स्वांग में ये इतिहास दोहराया जाता है. जाट समाज कभी अपनी राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारियों से विमुख नहीं हुआ. चाहे वह हरित क्रांति हो या फिर सीमा पर जंग. लेकिन जिहादियों के प्रेम में अंधे राकेश टिकैत और उनके कुछ पिछलग्गुओं को ये याद दिलाना जरूरी हो गया है.

अगर पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसी सड़क पर सुबह चार बजे दर्जनों लड़के दौड़ लगाते नजर आएं, तो समझ लीजिएगा कि जाटों का कोई गांव आस-पास है. ये दौड़ सेना में भर्ती की तैयारी होती है. ये है जुनून. दशकों पहले शहर में आकर व्यापारी हो गए राकेश टिकैत इस बात नहीं समझेंगे कि जाट रेजीमेंट का सिंहनाद है, जाट बलवान, जय भगवान. इसी नारे को लेकर एक जाट जवान दुश्मन की गोली का सामना कर जाता है. जाट रेजीमेंट अपने शौर्य के लिए सबसे ज्यादा वीरता पदकों से शोभित रेजीमेंट में से एक है. जाट समाज के लिए सामने ये प्रश्न ही नहीं है कि वह किसी संदिग्ध फंडिंग पर जिहादियों के सौजन्य से पल रहे राकेश टिकैत के सुर में सुर मिलाए. उन्हें पता है, जाट बलवान, जय भगवान.