ये हैं तालिबान के ‘प्रवक्ता’

    दिनांक 09-सितंबर-2021
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सेकुलर पत्रकार तालिबान के प्रवक्ता की तरह कर रहे काम
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मानवीय संवेदनाएं वामपंथ और इस्लाम के वैश्विक गठजोड़ का सबसे प्रभावी हथियार हैं। ये अपने विस्तारवादी एजेंडे के लिए मानवता के मूलभूत गुणों का दुरुपयोग करते हैं। इस काम में मीडिया उनका उपकरण है। इनके लिए तालिबान के अत्याचारों से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि विश्व के सभ्य देश अपने यहां पर शरणार्थियों को प्रवेश दे रहे हैं या नहीं। काबुल हवाई अड्डे पर हुए आतंकी हमलों में कितने बच्चे या सामान्य नागरिक मारे गए किसी ने नहीं गिना। लेकिन जैसे ही अमेरिकी सेना ने आतंकी ठिकानों पर बम गिराए, विश्व भर के चैनल और अखबारों में यह समाचार प्रमुखता से छा गया कि एक बच्चे की मृत्यु हुई है। समाचार पत्रों में पहले पन्ने पर रोते बच्चों के छपे। भारतीय मीडिया भी इसका अपवाद नहीं है। पत्रकारों के वेश में बैठे वामपंथ और इस्लाम के सिपाहियों ने तत्काल माहौल बनाना शुरू कर दिया कि भारत सरकार को उन्हें शरण देनी चाहिए।
 
टाइम्स आॅफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स जैसे अंग्रेजी अखबार ही नहीं, दैनिक भास्कर जैसे समाचार पत्र भी तालिबान के प्रवक्ता की तरह दिखाई देते हैं। इस अखबार ने छापा कि कैसे अफगानिस्तान के मुसलमान वहां से भागकर आने वाले हिंदुओं और सिखों की दुकानों को खुला रखे हुए हैं। यह वह झूठ है जो कश्मीरी पंडितों को लेकर भी खूब गढ़ा गया था। इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही की विकास दर 20 प्रतिशत से अधिक रही। पर अधिकांश चैनलों और समाचार पत्रों ने इसे वैसा तूल नहीं दिया, जैसा तब दिया था जब यह नकारात्मक रही थी। बीबीसी हिंदी ने लेख छापा कि ‘‘जीडीपी में उछाल चिंताजनक है।’’ इसी वेबसाइट ने कुछ सप्ताह पहले चीन की विकास दर के 18 प्रतिशत रहने पर उसका स्तुतिगान किया था और लिखा था कि भारत को चीन से सीखना चाहिए।
 अमेरिका के कुछ राज्यों में कोविड-19 की तीसरी लहर से बड़ी संख्या में लोगों की जान जा रही है। विशेष रूप से फ़्लोरिडा में अस्पतालों में बिस्तर और आॅक्सीजन का संकट पैदा हो गया है। कब्रिस्तानों में जगह नहीं मिल रही। जो वैश्विक मीडिया भारत में श्मशान घाटों के चित्र छाप रहा था, वह अमेरिका में हो रही त्रासदी के समाचार तक नहीं दिखा रहा। कोरोना के बहाने भारत पर भद्दी टिप्पणियां करने वाला न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार अपने देश में मची तबाही पर ऐसे चुप है मानो कुछ हुआ ही नहीं।

अमेरिका की तरह केरल में कोविड संक्रमण को लेकर भारतीय मीडिया बिल्कुल चुप है। जब सोशल मीडिया पर थोड़ी भद पिटी तो प्रायोजित लेख छापे जाने लगे। टाइम्स आॅफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स ने बताया कि केरल में मृत्यु दर बहुत अधिक नहीं है, जबकि यह राष्ट्रीय औसत से कई गुना अधिक है। ब्रिटेन की वामपंथी समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने केरल सरकार की प्रशंसा में एक लेख प्रकाशित किया, जिसे चीन की टेलीकॉम कंपनी हुवेइ ने प्रायोजित किया था। यह किस तरह का गठबंधन है। ऐसी ही विदेशी शक्तियों द्वारा पाले-पोसे जा रहे कुछ भारतीय पत्रकार ‘गोदी मीडिया’ की शिकायत करते देखे जाते हैं।

टाइम्स आॅफ इंडिया समेत कुछ अखबारों ने छापा कि दिल्ली विश्वविद्यालय ने दो दलित लेखकों की कहानियों को अंग्रेजी साहित्य के पाठ्यक्रम से दिया है। यह नहीं बताया कि क्यों हटार्इं। कांग्रेस के समय से पढ़ाई जा रही इन कहानियों में सेना को लेकर आपत्तिजनक बातें कही गई थीं। क्या ऐसी कहानी विवि के पाठ्यक्रम में होनी चाहिए?

मुंबई हवाई अड्डे पर अभिनेता सलमान खान को सुरक्षा जांच के लिए रोकने वाले अर्धसैनिक बल के जवान को सरकार परेशान कर रही है, इस फर्जी खबर को टाइम्स आॅफ इंडिया और द न्यू इंडियन एक्सप्रेस समेत कई अखबारों ने छापा। हमारी जानकारी के अनुसार यह ‘पेड न्यूज’ थी, इसके लिए ‘शुल्क’ का भुगतान किसने किया, यह मीडिया संस्थानों के संपादकों को ही पता होगा।

मुख्यधारा मीडिया के पक्षपात के बीच सामान्य लोगों के लिए सोशल मीडिया ही आशा की एकमात्र किरण है, लेकिन वहां पर भी वामपंथी-इस्लामी गठबंधन हावी हो चुका है। बीते सप्ताह ट्विटर पर ‘मेघ अपडेट्स’ नाम के समाचार हैंडल को हटा दिया गया। कारण कुछ भी नहीं बताया गया। गूगल कंपनी का यूट्यूब पूरी तरह हिंदू-विरोधी सामग्री का अड्डा बन चुका है। यहां पर ‘सबलोकतंत्र’ नाम के एक लोकप्रिय चैनल को भी बिना किसी स्पष्ट कारण के हटा दिया गया। दूसरी तरफ हिंदू देवी-देवताओं पर अश्लील टिप्पणियां करने वाले दर्जनों चैनल यूट्यूब पर बिना रोक-टोक चल रहे हैं।