इतिहास

जयंती विशेष: सुदर्शन जी कहते थे समाज तब सुखी होगा जब प्रकृति के साथ उसका तालमेल ठीक होगा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक स्व. कुप्.सी. सुदर्शन भारतीय दर्शन के वाहक थे। वे प्रकृति के शोषण के विरोधी थे और कहते थे कि प्रकृति से उतना ही लो जितने की जरूरत है, तभी यह पृथ्वी समस्त जीवों की सेवा कर पाएगी- राजेंद्र कुमार चड्डाराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक श्री कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन का जन्म 19 जून, 1931 को रायपुर (वर्ततान में छत्तीसगढ़ राज्य) में हुआ था। मूल रूप से कर्नाटक के एक गांव कुप्पहल्ली के निवासी अपने पिता सीतारमैया के वन विभाग में कार्यरत होने के कारण सुदर्शन जी

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हिंदू साम्राज्य दिवस पर विशेष : हिंदुत्व के गौरव छत्रपति शिवाजी महाराज

छत्रपति शिवाजी जैसे आदर्श शासक और संगठक विश्व के इतिहास में दूसरे नहीं मिलते हैं। उन्होंने एक राजा के तौर पर निष्पक्ष शासन किया और एक सेनापति के नाते हर सैनिक का ऐसा मनोबल बढ़ाया कि पलक झपकते ही दुश्मन ढेर हो जाते थे। आज हिंदू साम्राज्य दिवस है। आज ही के दिन शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था। सन् 1674 में ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी को शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ था, जिसे आनंदनाम संवत् का नाम दिया गया। महाराष्ट्र में पांच हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित रायगढ़ किले में एक भव्य समारोह हुआ था। महाराष्ट्र में यह दिन "शिवा

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प्रथम स्‍वतंत्र्य समर की 162वीं वर्षगांठ पर विशेष : बलिदानियों की अनसुनी कहानियां

आज देश 1857 के महासमर की 162वीं वर्षगांठ मना रहा है। पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े भारत का यह पहला सामूहिक और योजनाबद्ध प्रयास था, जब उसने अंग्रेज की सत्‍ता को खुली चुनौती दी। आजादी की इस पहली लड़ाई के योद्धा ब्रिटिश हुकूमत से मुकाबला कर गए, लेकिन उसके बाद जयचंदी इतिहासकारों से हार गए। अनेक इतिहासकारों ने इस महासमर को सैनिक विद्रोह तो कुछ ने कुछ रजवाड़ों का आक्रोश बता कर इसकी महिमा को खंडित करने का कुत्‍सित प्रयास किया। खासकर जब हरियाणा के संदर्भ में चर्चा होती है तो तथाकथित इतिहासकारों की लेखनी कुंद दिखाई

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'भारत के ही मूल निवासी हैं आर्य, हरियाणा व उत्तर थे सभ्यता के मुख्य केंद्र'

वामपंथियों इतिहासकरों ने भारत के इतिहास को हमेशा गलत तरीके से प्रस्तुत किया। अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीय इतिहास को विकृत करने का काम शुरू हुआ। वामपंथी इतिहासकारों ने यह थ्योरी गढ़ी कि आर्य भारत में मूल निवासी नहीं थे। वे बाहर से आए थे। अब खुदाई में मिले अवशेषों और विज्ञान ने भी प्रमाणित कर दिया है कि आर्य यहीं के मूल निवासी थे।आर्यों को मध्य एशिया का मूल निवासी बताने वाली थ्योरी अब पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है। इतिहास की खोजों से साबित हो चुका है कि आर्य भारत के ही मूल निवासी थे और उनका मुख्य केंद्र उत

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पुण्यतिथि पर विशेष: स्वतन्त्रता आंदोलन में उग्रवाद के प्रणेता लोकमान्य तिलक

भारतीय स्वतन्त्रता के आन्दोलन में कांग्रेस में स्पष्टतः दो गुट बन गये थे। एक नरम तो दूसरा गरम दल कहलाता था। पहले के नेता गोपाल कृष्ण गोखले थे, तो दूसरे के लोकमान्य तिलक। इतिहास में आगे चलकर लाल-बाल-पाल नामक जो तिकड़ी प्रसिद्ध हुई, उसके बाल यही बाल गंगाधर तिलक थे, जो आगे चलकर लोकमान्य तिलक के नाम से प्रसिद्ध हुए।महात्मा गांधी के आंदोलन को सफल बनाने में सबसे बड़ा योगदान तिलक का ही था असहयोग आंदोलन के लिए जब एक साल के भीतर एक करोड़ रुपये जमा करने का लक्षय रखा गया तो गांधी जी ने तिलक की पुण्यतिथि पर कोष को नाम

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'जिहाद' मुंशी प्रेमचंद की कहानी - खजानचंद ने मृत्यु को स्वीकार किया पर नहीं बना मुसलमान

मुंशी प्रेमचंद बहुत पुरानी बात है। हिंदुओं का एक काफिला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश से भागा चला आ रहा था। मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे। धार्मिक द्वेष का नाम न था। पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाती थी। बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे। शासन की कोई व्यवस्था न थी। हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी। आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था। जान का बदला जान था, खून का बदला खून; इस

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सावरकर ने बंटवारे पर पहले ही चेताया था कांग्रेसी नेताओं ने नहीं सुनी

1940 में जब सिंध को मुंबई प्रांत से अलग कर दिया गया, तब सावरकर ही थे जिन्होंने चेताया था कि पाकिस्तान की नींव पड़ गई है, अब बंटवारा रोकना कठिन होगा। गांधीजी और नेहरू ने तो कहा था कि पाकिस्तान उनकी लाश पर बनेगा।पर सात वर्ष बाद वे गलत साबित हुए और सावरकर सही ...स्वातंत्र्यवीर सावरकर वह राष्ट्रवादी विभूति थे जिन्होंने आजादी के बाद के कालखण्ड में समाज को एकजुट रखने में भरपूर योगदान दिया। आज आवश्यकता है उनके दीर्घकालिक और तार्किक राष्ट्रवाद के प्रकाश में भीमा-कोरेगांव, जातिवादी दंगों और पत्थर गढ़ी जैसी घटनाओं पर र

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सिनौली में उभरी सरस्वती कालीन सभ्यता, वामपंथी झूठ की खुली पोल

विश्व के पुरातन व गौरवशाली भारतीय इतिहास को ब्रिटिश इतिहासकारों ने विकृत करने का चरम प्रयास किया, लेकिन उनका विकृत सिद्धांत अब दम तोड़ चुका है। उत्तर प्रदेश के बागपत के सिनौली में अभी तक हुए उत्खनन से साबित हुआ है कि सरस्वती नदी के किनारे विकसित हुई सभ्यता ही वैदिक सभ्यता थी, जिसे वामपंथियों ने सिंधु घाटी सभ्यता नाम दिया था। खुदाई में निकले सारे पुरावशेषों ने हमारे वेदों में लिखी बातों को सिद्ध कर दिया है कि आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे और विश्व की सबसे प्राचीन और विकसित सभ्यता भारत की ’वैदिक सभ्यता’ थी।

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