धर्म संस्कृति

बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष: बाबासाहेब ने कहा था मार्क्स नहीं भगवान बुद्ध के सिद्धांत सही

भगवान बुद्ध के विचार व सिद्धांत आधुनिक युग में सबसे अधिक प्रासंगिक माने जा रहे हैं। सारी दुनिया में भगवान बुद्ध के विचारों की प्रासंगिकता पर बड़े-बड़े विमर्श के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। स्वतंत्र भारत के संविधान के सूत्रधार डॉ.भीमराव आम्बेडकर ने 14 अक्टूबर, 1956 में बौद्ध धर्म स्वीकार कर बुद्ध मत के अनुयायी बनें। डॉ.आम्बेडकर के साथ बहुत सारे लोगों ने भी अपने को बौद्ध धर्म का अनुयायी मान लिया। आज लाखों की संख्या में भारत में अनुसूचित जाति के लोग हैं और वह स्वयं को बौद्ध धर्म का अनुयायी मानते हैं।

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अक्षय तृतीया विशेष: शस्त्र और शास्त्र के अनूठे समन्वयक भगवान परशुराम

अक्षय तृतीया की पावन तिथि को इस धराधाम पर अवतरित भगवान परशुराम ऐसी ही अमर विभूति हैं जिनके प्रतिपादित सिद्धांत आज भी अपनी प्रासंगिकता रखते हैं। अपने युग की सबसे बड़ी धार्मिक क्रांति के पुरोधा भगवान परशुराम की मान्यता थी कि स्वस्थ समाज की संरचना के लिए ब्रह्मशक्ति और शस्त्र शक्ति दोनों का समन्वय आवश्यक है। पौराणिक परंपरा के अष्ट चिरंजीवियों (अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, भगवान परशुराम तथा महर्षि मार्कण्डेय) की कड़ी में गिने जाने वाले महर्षि परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अ

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गढ़मुक्तेश्वर में हुआ था महाभारत में मारे गए योद्धाओं का पिंडदान

प्राचीन काल से ही नदियों किनारे लगने वाले मेलों का भारतीय संस्कृति में बहुत महत्व है। कुंभ और अर्द्धकुंभ के साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लगने वाले क्षेत्रीय मेलों की भी अपनी महत्ता है। कार्तिक पूर्णिमा पर वेस्ट यूपी में गंगा नदी पर कई भव्य मेलों का आयोजन होता है। इनमें हापुड़ जनपद के गढ़मुक्तेश्वर में कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले गंगा मेले का संबंध महाभारत काल से है। बताया जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद सम्राट युधिष्ठिर ने युद्ध में मारे गए असंख्य लोगों की आत्मा की शांति के लिए गढ़मुक्तेश्वर में गंगा नदी

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