बेलाग

पाकिस्तान के पैरोकार कौन?

पाकिस्तान को आसरा बाकी दुनिया से नहीं, भारत में बचे वंशवादी राजनीति के अंखुओं से है। भारत में पाकिस्तानी टुकड़ों पर पलते, लार टपकाते उन कथित आंदोलनकारी गिरोहों से है, जो ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा बुलंद करते हैं।..

'सुराज' आया 'सुषमा' चली गईं

अपनी चार दशक से ज्यादा लंबी यात्रा में महिला नेत्री के तौर पर पहली बार के कई कीर्तिमान बनाने वाली वह अनूठी लो आज एकाएक बुझ गई है। सुषमा का अर्थ ही है उजास, दीप्ति, चमक। जिस तरह कोई तीली बुझने से पहले किसी दिए को प्रदीप्त कर जाती है सुषमा जी का जीवन वैसा ही तो है...

कौन हैं ये लोग?

मुंबई हमले का सबसे कुख्यात चेहरा याद है! अजमल आमिर कसाब। याद कीजिए छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर सीसीटीवी में आई फोटो में इस्लामी आतंकी के एक हाथ में कलावा और दूसरे में मशीनगन चमक रही थी! लव जिहाद के मामलों में पहचान बदलकर प्यार का ढोंग रचाने और बाद में 'शिकार' को इस्लाम में घसीटने के इतने मामले खुले हैं कि अब गिनती से बाहर हैं।..

कौन हैं ये लोग?

लव जिहाद के मामलों में पहचान बदलकर प्यार का ढोंग रचाने और बाद में ‘शिकार’ को इस्लाम में घसीटने के इतने मामले खुले हैं कि अब गिनती से बाहर हैं..

गैंग ऑफ वा(मपंथ) से(कुलर) पुर

झारखंड में ऐसा क्या था कि चोरी के संदेह में 'सोनू' को पीट रही भीड़ को 'हिन्दू' और सोनू को 'तबरेज' बताना जरूरी था, मगर भिवाड़ी में भीड़ के मुस्लिम होने और पिटते-पिटते जान गंवाने वाले हरीश जाटव की हिन्दू अनुसूचित जाति की पहचान छिपाना जरूरी हो गया!..

उतर रहा है नकाब आहिस्ता-आहिस्ता

लड़की के पिता ने भी यह साफ कहा कि उनकी आपत्ति लड़के की बड़ी आयु को लेकर है, जाति पर नहीं। ऐसे में सवाल उठता है कि प्रत्यक्ष तौर पर भाजपा को लक्षित कर परोक्ष रूप से 'हिन्दू' को लांछित करने की मंशाओं के पीछे लक्ष्य क्या है?..

समाज के सामने आने दो सच

यह दुराग्रही प्रवृत्ति का ही नतीजा है कि राहुल गांधी आज कचहरी-कचहरी जा रहे हैं, जमानत पा रहे हैं और बाहर आकर सच की लड़ाई का झूठा नारा लगा रहे हैं। अगर उनके आरोपों में दम था तो उन्हें टिके रहना चाहिए था। राहुल गांधी की जमानत इस बात का 'सर्टिफिकेट' है कि वे लोक को जो पाठ पढ़ा रहे हैं, वह कितना थोथा है।..

कर्ज और मजहबी उन्माद में दबा ‘कप्तान’

सवाल पाकिस्तान की बदहाली और गफलत का नहीं, ‘उम्मत’ और ‘जिहाद’ की उस ‘लत’ का है जिसे सीने से लगाए रखते हुए वह अर्थव्यवस्था को मझधार से निकालने के लिए प्र्रगतिशील दुनिया की मदद चाहता है। क्या यह संभव है?..

आरोपी तो आरोपी होता है, हिन्दू या मुसलमान नहीं

झारखंड के सरायकेला में हुआ ताजा प्रकरण स्तब्ध करने वाला है। यहां पुलिस हिरासत में जिस तबरेज अंसारी की मौत हुई वह चोरी के आरोप में भीड़ द्वारा पीटे जाने के बाद यहां लाया गया था।..

जरूरी है एक देश-एक चुनाव

सत्रहवीं लोकसभा के पहले सत्र में मेजों की थपथपाहट में भविष्य के भारत की गूंज सुनी जा सकती है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पूर्व में भी हुए हैं, आगे भी होंगे ही, किंतु हर बार के मुकाबले इस अभिभाषण की खास बात यह रही कि सरकार के जिन कार्यों का इसमें उल्लेख हुआ उनमें भरोसा जगाने वाले आंकड़े और पारदर्शिता की कहानियां भी थीं। नदी, पर्यावरण, रोजगार, महिला सशक्तिकरण या विकास... अभिभाषण में यदि आने वाले कल के लिए उम्मीदें संजोई गई हैं तो उनका आधार ठोस-फलीभूत योजनाओं का ताना-बाना है।..

रायसीना के धुंधलके की रोशनी में

23 मई, 2019 की ये धुंधलाती शाम है। जिस वक्त रायसीना की उठान के तले राष्ट्रपति भवन के अहाते में नई सरकार का मंत्रिमंडल और इरादे आकार ले रहे थे, भारत की राजनीति में कइयों के दिल डूब रहे थे। दिलों का ये डूबना सत्ता की छीजन के कारण पैदा हुआ है और इसके लिए वे खुद जवाबदेह हैं जिन्होंने लंबे समय तक देश की राजनीति को एकध्रुवीय बनाए रखा। जो पार्टी आजादी से पहले सामाजिक भावनाओं का मंच होती थी, उसके जरिये न केवल राजनीति को एकध्रुवीय बनाया गया बल्कि उस पार्टी को भी एक परिवार की जागीर बना दिया गया।..

मोदी और शाह के नेतृत्व में भाजपा की विनम्र, विराट विजय

जातिवाद, विभाजक, विद्वेषी राजनीति को नकारकर जनता ने विकास की राह पर बढ़ते भारत में फिर जताया विश्वास. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राजग ने लोकसभा चुनाव जीतकर दर्ज किया इतिहास।कुनबे और कोटरियों में पलने वाली राजनीति को जनता ने सिरे किया परास्त..

विचारधारा और समर्पण

माहौल चुनावी है। सो, जिन्हें कभी श्रीराम काल्पनिक लगते थे, अब उन्हें भी राम से लेकर रामधारी सिंह दिनकर तक, तमाम नैतिक-सांस्कृतिक संदर्भ याद आ रहे हैं।..

भारत की नयी उठान

लोकतंत्र के महापर्व की प्रक्रिया के चौथे चरण में पहुंचते-पहुंचते इस उत्सव की आधी परिक्रमा पूरी हो चुकी है। कुल लोकसभा सीटों में बहुमत तय करने की दृष्टि से जरूरी आंकड़ा ईवीएम मशीनों की तिजोरी में बंद हो चुका है। इसके साथ ही विश्व परिदृश्य से भविष्य में उत्तरोत्तर मजबूत होते भारत के संकेत उभरने लगे हैं। ..

शैतानी फितूर

गत रविवार, 21 अप्रैल को श्रीलंका के 3 पांच सितारा होटलों—शंग्री-ला, सिनामन ग्रेंड और किंग्सबरी—के अलावा कोलंबो के एक अतिथि गृह तथा एक घर में विस्फोट हुआ, किन्तु यह बात अधूरी और सिर्फ आतंकी हमले के दायरे में सिमटी रह जाएगी जब तक इस तथ्य को खास तौर पर रेखांकित न किया जाए कि 21 अप्रैल को श्रीलंका की राजधानी कोलंबो का सेंट एंथोनी चर्च, पश्चिम तटीय कस्बे का सेंट सेबेस्टियन चर्च और पूर्वी कस्बे बट्टीकलोआ का सेंट माइकल चर्च खून से नहा गए।..

जनमत के संकेत

लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम भले 23 मई को घोषित हों किन्तु यह साफ है कि यह नतीजे वर्ष 2014 की तुलना में ज्यादा रोचक रहेंगे। इस रोचकता का कारण राजनीति के वे संदेश हैं जो बस गूंजने ही वाले हैं।..

कांग्रेस ने हमेशा वोट बटोरने के लिए बाबासाहेब के नाम का प्रयोग किया है

आज बाबा साहेब आंबेडकर की जयंती है। देश में चुनाव का माहौल है। एक दूसरे पर आरोपों और प्रत्यारोपों दौर जारी है। किन्तु खतरे की बात यह है कि आज बाबासाहेब के नाम को आगे रखकर कुछ स्वार्थी राजनैतिक गुट और उनके गुर्गे नफरत के अलाव सुलगाए बैठे हैं।..

नाम की आंधी और गड्डी में बंधे गांधी

चुनाव के दौरान आरोप-प्रत्यारोपों की बरसात कुछ लोगों को दिलचस्प लगती है तो कुछ को बोझिल। मतदान की तिथि नजदीक आते-आते कई बार तथ्यहीन आरोप स्तरहीन बहस का अंधड़ भी खड़ा कर देते हैं, किन्तु नहीं भूलना चाहिए कि राजनीतिक दलों की यह रस्साकशी ही मतदाताओं को सही को चुनने और गलत को बुहारने का अनमोल अवसर देती है। किसी दल या राजनेता के नाम से बड़ा यह अवसर अंतत: मतदाता को सबसे ऊंचे स्थान पर स्थापित करता है।..

मनोहर पर्रिकर एक अनथक योद्धा

गोवा जैसे छोटे राज्य में पर्यावरण का नाश करने पर तुले खनन माफिया से लोहा लेना हो या मत-पंथ और भाषा की विभाजक राजनीति को परास्त करने की बड़ी चुनौती, संगठन को प्रभावी बनाना हो या प्रशासन को जवाबदेह और पारदर्शी, उन्होंने जो काम हाथ में लिया, पूरा कर दिखाया।..

स्वार्थ के टुकड़े

फरवरी 2016 में ये नारे लगाने वाले, नारे लगाने वालों के पक्ष में जेएनयू पहुंच जाने वाले और इस सबकी पृष्ठभूमि में आधी रात को न्यायालय खुलवाने वाले खुद टुकड़े-टुकड़े हैं मगर एक खास कदमताल में काम करते हैं।..

खूंटे से कांग्रेस बंधी है, जनता नहीं

भारत विश्व का सबसे युवा देश और सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इन दो स्थापित तथ्यों के साथ एक बात और जोड़ लें-इस विशाल लोकतंत्र का सबसे बुजुर्ग दल फिर से जवान होने को बेताब है। कांग्रेस में राहुल के लिए राह बनाते हुए सोनिया गांधी का अध्यक्ष की गद्दी से सरकना इसका कथित संकेत था और प्रियंका वाड्रा की ‘एंट्री’ के साथ इसकी मुनादी हो गई है।..

गांधी बहाना, राजनीतिक निशाना

गत 30 जनवरी को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से एक खबर आई। यह छोटी-सी खबर तेजी से सुलगी और राजनीतिक तंदूर की आग तेज हो गई। खबर किसी भगवावस्त्रधारी नेत्री द्वारा गांधी जी के पुतले को गोली मारने की थी। इस हरकत में शामिल लोग गांधी जी के बारे में क्या और कितना जानते हैं, कहना कठिन है।..

हताशाओं का गठबंधन

सारी घटनाएं इतिहास में दर्ज नहीं होतीं। कुछ बातें समाज अपनी स्मृति में लिखता है। सामाजिक अवचेतन की ये अलिखित बातें लिखित इतिहास से ज्यादा गहरी होती हैं। ऐसी ही एक घटना—जिस समय यह देश संस्कृति की धारा में आस्था भरी डुबकियां लगा रहा था (और राज्य सरकार द्वारा की गई व्यवस्थाओं की प्रशंसा कर रहा था), विश्व विस्फारित-मंत्रमुग्ध भाव से उस ‘संस्कृति कुंभ’ को ताक रहा था (और केंद्र सरकार ने प्रवासी भारतीय दिवस के तार इससे जोड़ दिए थे) उस समय विकल्प की धारा होने का दम भरने वाली राजनीति कहां थी!..

मजहब की दीवार, अहमदिया लाचार

अहमदिया मुसलमानों को अन्य मुस्लिम फिरकों द्वारा न तो स्वतंत्र रूप से बोलने का अधिकार दिया जा रहा है और न ही लिखने का। कोई दुस्साहस करता है तो उसे सजा दी जाती है। यहां तक कि अहमदियाओं को मुसलमान ही नहीं माना जा रहा ..

जल न जाए ‘हाथ’!

अंग्रेजी नए साल पर आतिशबाजी देखकर एक सवाल सैकड़ों लोगों के मन में आया- क्या पटाखों की बिक्री और समय की पाबंदी सिर्फ दीपावली के लिए थी! सवाल का जवाब पाबंदी लगाने वाले जानें, हम तो यह जानते हैं कि अपने यहां पटाखे छोड़ने की हुड़क कुछ ऐसी है कि इसे लेकर सभी को बचपन में कभी न कभी नसीहत जरूर मिली होगी।..

डर तो है, पर किससे !

भारत आज भी ऐसा देश है जहां शराब पीने वालों के मुकाबले शराब को न छूने वालों की संख्या ज्यादा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शराब की खपत के आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। इसकी पड़ताल करने वाले बखूबी जानते हैं कि इस देश की परंपरा, नैतिकता, भावनात्मकता और आस्थाओं का संगम लोगों को ‘कॉकटेल’ से दूर करता है।..

अजातशत्रु अटल !

अजातशत्रु। जननायक। शिखर-पुरुष...कितने ही विशेषणों से संबोधित कर सकते हैं हम भारतीय राजनीतिक-साहित्यिक-सामाजिक जगत की महाविभूति मुदितमना अटल बिहारी वाजपेयी को। एक लंबा संघर्षमय, समाज-हितमय जीवन। भारतीय राजनीति के फलक पर संसदीय मर्यादा के उच्चतम प्रतिमानों को जीने वाले चंद राजनेताओं में से एक अटल जी को सिर्फ एक राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं देखा जा सकता। कई आयाम समेटे हुए थे वे अपने भीतर।..

संकेत और सबक

क्‍या हार में क्‍या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं। संधर्ष पथ पर जो मिले, यह भी सही वह भी सही।। -शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ (वरदान माँगूँगा नहीं)..

‘क्रिश्चियन’ तोते में अटकी कांग्रेस की जान

इतालवी में ‘सिग्नोरा’ हिन्दी के ‘श्रीमती’ सरीखा संबोधन है। लेकिन किसी सिग्नोरा को घेरने घोटाले का भूत भी इटली से बरास्ता दुबई होते हुए भारत चला आएगा, किसने सोचा था?..

हमारा संविधान और इसके निर्माताओं की भावना

26 नवंबर और 6 दिसंबर— दो ऐसी तिथियां हैं जिनसे भारतीय इतिहास की चार महत्वपूर्ण घटनाएं जुड़ती हैं। 26 नवंबर संविधान दिवस है तो मुंबई हमले की तारीख भी।..

अयोध्या और आस

अयोध्या - केवल शब्द नहीं, पूरा आख्यान है। इस शब्द का अर्थ है : अ-युध्य। अर्थात् जिससे युद्ध नहीं किया जा सकता, जिससे बैर नहीं पाला जा सकता। जिसे जीतना नितांत असंभव है।इतिहास साक्षी है कि इस अयोध्या को जीतने के लिए बर्बरतम प्रयास हुए। श्रीरामचरितमानस के रचयिता महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने दोहाशतक में लिखा—मंत्र उपनिषद् ब्राह्मनहुँ बहु पुरान इतिहास।जवन जराये रोष भरि करि तुलसी परिहास।।सिखा सूत्र से हीन करि, बल ते हिंदू लोग।भमरि भगाये देश ते, तुलसी कठिन कुजोग।।बाबर बर्बर आइके, कर लीन्हे करवाल।हने ..

संवैधानिक साख पर ‘एक्टिविस्ट’ घात

न्यायपालिका, विधिपालिका, कार्यपालिका और खबरपालिका, वे चार स्तंभ हैं जिन पर लोकतंत्र का पूरा भवन खड़ा है। क्या हो यदि इन खंभों में जरा भी कमजोरी, दरार या डगमगाहट आ जाए! भारतीय लोकतंत्र के लिए यह सवाल इसलिए ज्यादा प्रासंगिक है क्योंकि विश्व का सबसे विशाल लोकतंत्र चौतरफा खतरों के लिए पर्याप्त रूप से खुला है। दागियों के राजनीति में प्रवेश से लेकर क्षेत्रवाद-परिवारवाद का दंश झेलती रही विधिपालिका! नौकरशाही की सुस्त-भ्रष्ट कार्यकथाएं! सेना द्वारा सरकार के तख्तापलट जैसी झूठी-मनगढ़ंत खबरें परोसता और ‘राडिय..

आखिर क्यों बिसराया गया नेताजी को ?

कुछ लोग इतने महान होते हैं कि होने न होने के सुराग तक ठंडे पड़ जाने के दशकों बाद भी वे देश की स्मृति को सुगंधित करते रहते हैं। ऐसे लोगों में एक अग्रणी नाम है- नेताजी सुभाष चंद्र बोस।..

राह भविष्य के भारत की

विजयादशमी पर सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का उद्बोधन ठीक वैसा ही था जैसी कि इसकी पहचान है। सामयिक मुद्दों को समग्रता से समेटे, धुंधले-उलझाऊ मुद्दों पर पर्याप्त स्पष्ट-मुखर और एक महान प्रेरक आह्वान से गूंजता हुआ।..

आवाज बुलंद करने का समय

पहाड़ी ढलानों वाले चीड़ के जंगलों में भी आग इतनी तेजी से नहीं फैलती जितनी कि अशरीरी विश्व के 'वर्चुअल' वन में। छोटे से हैशटैग की सुलगती तीली कब, कहां, कितने विकराल अग्निकांड को जन्म देगी, कहा नहीं जा सकता। हाल में पुरुषों द्वारा उत्पीड़न की शिकार महिलाओं की मुखर होती आवाजें, 'मी टू' (# MeToo) अभियान की दिन पर दिन तेज होती लपटें इस बात का उदाहरण हैं। मीडिया के ऊंचे और असरदार आरोपों के नीचे हैं.. रजतपट के उजले चेहरे यकायक काले पड़ गए हैं.. जिनकी कभी तूती बोलती थी उनकी इज्जत की कुर्की सोशल मीडिया के ..

'राफेल' या रा..फेल

अपनी हर बात के लिए 'मोदी की गलती' को जिम्मेदार ठहराने वाले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी आजकल खासे उत्साह में (या कहिए हवा में) हैं। राफेल पर राहुल की कलाबाजियां कांग्रेस के लिए यह खुश करने वाली बात होनी चाहिए थीं मगर हैरानी कि अध्यक्ष की तेजी ने सिपहसालारों का सिरदर्द बढ़ा दिया है।वायुसेना उपप्रमुख, एअर मार्शल आर. नांबियार के यह कहने के बाद कि वर्तमान राफेल सौदा पहले किए जा रहे सौदे से बेहतर है, हालांकि, अब इस मुद्दे पर राजनीति की गुंजाइश नहीं बची। किन्तु क्योंकि फिलहाल, राफेल, राहुल की नई गेंद है। ..

साफ बात असर गहरा

 दुनिया में हमारा कोई शत्रु नहीं है। अगर कोई शत्रु है भी तो अपने को बचाते हुए उन्हें साथ लेकर चलने की आकांक्षा रखते हैं। ये वास्तव में हिन्दुत्व है— डॉ. मोहन भागवतभविष्य का भारत : संघ का दृष्टिकोण, नाम से दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित तीन दिवसीय आयोजन को ऐतिहासिक मानने के कई कारण हैं।इनमें सर्वप्रमुख है- ऐसे विशाल सार्वजनिक मंच से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक द्वारा विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों पर संघ के मत को समाज जीवन की विभिन्न विभूतियों के सामने स्पष्ट तौर पर रखना। किन्तु ..

खेलेंगे, कूदेंगे, बनेंगे नवाब

पुराने वक्त में कहा जाता था- पढ़ोगे, लिखोगे, बनोगे नवाब। खेलोगे, कूदोगे, होगे खराब।।..

कैसा हो मीडिया?

मैं मृत्यु से भी उतना नहीं डरता, जितना झूठ से डरता हूं। —वेदव्यास (महाभारत, वन पर्व, 302/6) पाञ्चजन्य और भारतीय जनसंचार संस्थान द्वारा झूठी खबरों की विस्तृत पड़ताल (अंक 1 जुलाई, 2018) की पहल मीडिया से जुड़े विविध पक्षों को इस मुद्दे पर सचेत और जागरूक करने में सफल रही, ऐसा लगता है।..

हिन्दी संस्कृति का समुद्रपारीय मंथन

 विदेश मंत्रालय द्वारा मॉरीशस सरकार के सहयोग से मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुई में आयोजित 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन को कई कारणों से याद किया जाएगा। पहला कारण भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की देहयात्रा पूरी होने से उपजी गहरी शोकांतिका थी। स्वाभाविक ही था कि इसके बाद उद्घाटन कार्यक्रम का उत्सवी उल्लास अनन्य हिन्दी-प्रेमी अटलजी की गहन-गरिमामय स्मृतियों में खो गया।‘काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं..’ की हुंकार भरने वाले राष्ट्रनायक के देहावसान का संयोग देखिए। अंत समय में ..

सियासत के 'समुद्र' में अटल प्रकाश स्तंभ

 देश के 72 वें स्वतंत्रता दिवस पर विविध आयोजनों की उत्सवी चमक को दुख में बदल देने वाली पहली खबर अखिल भारतीय आयुविज्ञान संस्थान से आई! अटल जी की तबियत बिगड़ी..। शाम होते-होते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अटल जी के स्वास्थ्य का हाल लेने एम्स पहुंच गए। देश के पूर्व प्रधानमंत्री, पाञ्चजन्य के प्रथम संपादक और सर्वप्रिय जननेता अटल बिहारी वाजपेयी 11 जून से सांस लेने में दिक्कत और गुर्दे के संक्रमण के उपचार के लिए ‘एम्स’ में थे। अगले रोज दोपहर तक आशंकाओं के बादलों ने पूरे देश और खासकर दिल्ली ..

बंटवारे का दर्द और संघ-समर्पण

15 अगस्त को दो तरह से देखा जा सकता है, एक- जिस दिन भारत को ब्रिटिश राज से मुक्ति मिली। दूसरा- वह दिन जब इस महान राष्ट्र को अलग-अलग हिस्सों में काट-बांट दिया गया।..

कालजयी सोच वाले महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद

प्रेमचंद को उनकी जयंती (31 जुलाई) के अलावा भी बार-बार याद किया जाना जरूरी है क्योंकि वह उस लोक, उस तंत्र, उस सुराज तथा उस भारतीयता के पहरेदार व प्रखर प्रवक्ता हैं जिससे आज की सेकुलर-प्रगतिशील ब्रिगेड कन्नी काटती है। ..

महापुरुष कौन ? महापुरुषों पर मौन

तारीख का चलताऊ अर्थ दिनांक लिया जाता है किन्तु सही शाब्दिक अर्थ पर जाएं तो तारीख यानी इतिहास। कुछ दिनांक वास्तव में ऐसे होते हैं जब इतिहास लिखा जाता है। हम देखते हैं कि महापुरुषों से जुड़े दिनांक इतिहास में दर्ज हो जाते हैं। ऐसे में कैलेंडर की तारीखों में, समय के सफर में, मील के पत्थर की तरह स्थापित हस्तियों के बारे में एक सवाल जरूरी है-आखिर महापुरुष कौन हैं? उन्हें देखने का नजरिया क्या हो सकता है? निस्संदेह महापुरुष किसी भी देश के लिए, और कई बार संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा होते हैं। इसमें भी क..

मीडिया निभाए जिम्मेदारी न दे धोखा

राजनीति और राजनेताओं की छान-फटक तो मीडिया हर दिन पूरी दिलचस्पी से करता है किन्तु मीडिया के भीतर सरोकारों को छोड़ने, खबरों को तोड़ने, झूठ का पुट जोड़ने और खबर को मनमानी दिशा में मोड़ने का संज्ञान कौन लेगा? ..

क्यों चुप हैं क​थित बुद्धिजीवी रोना विल्सन की चिट्ठी पर

नक्सली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की फिराक में हैं। लेकिन इस चौंकाऊ चिट्ठी पर चुप्पी ओढ़ ली जाती है और यह रवैया किसी को चौंकाता नहीं। उन्हें हथियार चाहिए, उन्हें पोलित ब्यूरो की अनुमति चाहिए, वे भीमा कोरेगांव के हिसंक आंदोलन की सफलता पर एक-दूसरे की पीठ थपथपा रहे हैं।..

सबक कैराना से आगे हैं

कैराना! इस एक शब्द ने दर्जनों हताश चेहरों पर चमक ला दी है। मुख्यधारा की राजनीति में बुहार दिए गए दलों और उनके दिग्गजों के दिलों में अरमानों के लाखों दिए जल उठे हैं। निशाना एक है इसलिए बाकी चार सीटों का जिक्र जरूरी नहीं है। महाराष्ट्र की पालघर सीट पर भाजपा जीती है तो उसका जिक्र तो बिल्कुल नहीं, क्योंकि भाजपा की जीत नहीं भाजपा की हार ही ‘खबर’ है।..

संकीर्णता की बैसाखी और मुद्दों के कुहासे

राहुल गांधी बिला शक राष्ट्रीय नेता हैं। किन्तु उनकी पहचान क्या है? यह तीन कारकों का एक मिला-जुला मामला है। पहला कारक देश की सबसे बुजुर्ग पार्टी है, जिसके वे फिलहाल अध्यक्ष हैं। दूसरा कारक उनका परिवार है जो सबसे लंबे समय तक इस देश की सत्ता के केंद्र में काबिज रहा है। तीसरा कारक राहुल गांधी खुद हैं- यानी वह पहचान जो अपने लिए उन्होंने खुद कमाई है।..

सरकार किसी की भी बने पर ये पांच बातें साफ हैं

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणामों की घोषणा के बाद बहुमत की फांस कईयों के दिलों की धड़कनें बढ़ाए हुए है। कृपया शांत हो जाइए! जनता ने जो करना था कर दिया। ..

विवादों में लिपटी विरासत

ऐसे समय जब पूरा देश जज, न्यायपालिका और महाभियोग से जुड़ी पेचीदगियों को बूझने में जुटा था, इतिहास में दबे एक वकील ने अचानक सुर्खियां अपनी ओर खींच लीं। लोग मानो दो पालों में बंट गए। यदि बांटना ही कसौटी है तो जिन्ना के लिए यह पहचान नई नहीं है। मोहम्मद अली जिन्ना यानी नामी बैरिस्टर। जिन्ना यानी पाकिस्तान का संस्थापक। ..

परिणाम किसी खास दिन और समय पर एक झटके में आते हैं

परिणाम किसी खास दिन और समय पर एक झटके में आते हैं किन्तु इनके पीछे पल-पल की मेहनत और बेहिसाब अड़चनों की ऐसी अकथ कथाएं गुंथी होती हैं जिनका उस एक पल में ब्यौरा नहीं दिया जा सकता।..

पिटे प्यादों की बड़ी चाल!

पिटे प्यादों की बड़ी चाल!महाभियोग। इसका वही हश्र हुआ जो अपेक्षित था। राहुल गांधी की औपचारिक-अनौपचारिक अगुआई में कांग्रेस का वही हश्र हो रहा है जो अपेक्षित है।गौर कीजिए, इस बात में जरा भी अतिरंजना नहीं है।..

खबरों से खिलवाड़

चिन्ता की बात यह है कि सत्य अन्वेषण के साथ ही सामाजिक सरोकार और समस्या के समाधानपरक दृष्टिकोण पत्रकारिता से दूर हो रहे हैं। ..

इस नफरत की काट जरूरी

हृदय से घृणा का भाव निकल जाना चाहिए। सब भगवत्स्वरूप हैं ऐसा अगर साक्षात्कार हुआ, तो हृदय में घृणा का भाव नहीं रहता। ..