बेलाग

दावानल बनने की ओर बढ़ती चिन्गारियां

तालिबान से हम हजार सवाल पूछेंगे, इस्लाम पर भी पूछेंगे। परंतु एक सवाल पादरी से भी पूछना चाहिए कि कन्वर्जन की चोट लगती है तो आप तिलमिलाते हैं। कन्वर्जन की यही चोट इस देश को इतने वर्षों से चर्च लगा रहा है तो सोचिए! हिंदू समाज को कितनी तिलमिलाहट होती होगी?..

संकल्प की गूंज

पूरी दुनिया देख रही है कि भारत जो ठान ले, वह भारत कर सकता है। निश्चित ही इसका श्रेय नेतृत्व को है और नेतृत्व के साथ खड़े पूरे समाज को है। इस समाज ने राजनीतिक विभाजक रेखाओं को बुहारना शुरू कर दिया है।..

मुगलों की लीक और हिंदुस्तान की सीख

भारतीय समाज ही वह एकमात्र समाज है जहां अर्धनारीश्वर की परिकल्पना मिलती है। एक जैसे दिखने वाले दो टुकड़े एक नर हो सकता है, दूसरा नारी हो सकता है यानी स्त्री या पुरुष दोनों में कोई अंतर ही नहीं है। दोनों मिलकर एकात्म होते हैं, परिवार और समाज को रचते हैं..

रूढ़िवादी प्रगतिशील

सभ्य समाज का हिस्सा नहीं है। वामपंथी कार्ययोजनाओं में आपको एक ऐसी कबीलाई मानसिकता दिखेगी जो हमेशा वार और शिकार की मनस्थिति में रहती है। भेड़िया खून का प्यासा होता है। इस ‘भेड़िया मानसिकता’ से यदि समाज छुटकारा नहीं पाएगा तो वह शांति की नींद भी नहीं सो पाएगा।..

इस्लामी उन्माद की पदचाप

कराची के पूर्व मेयर आरिफ अजाकिया ने लंदन में कैमरे के सामने कहा कि पाकिस्तान में प्रति वर्ष 1,000 हिंदू व अन्य अल्पसंख्यक लड़कियों को अगवा कर उनका मजहब बदल निकाह कराया जाता है। इस वजह से पाकिस्तान में अल्पसंख्यक परिवार बेटियों के जन्म पर घबराते हैं..

सांस्कृतिक स्वतंत्रता का सदियों लम्बा संघर्ष

भारत विभाजन के साथ ब्रिटिश बेड़ियां कटने के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में पाञ्चजन्य के इस विशेषांक में हमने भारत के स्वराज्य-संघर्ष के अलग-अलग पड़ावों, अचर्चित आंचलिक मोर्चों, अल्पज्ञात अनूठे बलिदानियों की गाथाएं एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया है...

दृष्टि बदली, दृश्य बदला

खिलाड़ियों को अपने शून्य या अल्प संसाधनों में अपनी इच्छाशक्ति से प्रारंभ करना होता था। उन्हें प्रारम्भिक समर्थन भी नहीं मिलता था। साथ ही खिलाड़ियों को अधेड़पन की उधेड़बुन से गुजरना पड़ता था। यानी खेलकूद की उम्र बीतने के बाद आमदनी का उनका कोई माध्यम नहीं बन पाता था..

अफगानिस्तान, अशांति और भारत की अहमियत

अफगानिस्तान ऊपरी तौर पर शांत दिख रहा था परंतु वहां ताजा थरथराहट अनिष्ट और अशांति में न बदले, इसके लिए हम सबको प्रयत्न करने चाहिए, यह विश्व बिरादरी की जिम्मेदारी होगी। ..

संसद में गतिरोध और विपक्षी छटपटाहट के निहितार्थ

रही बात वर्तमान गतिरोध और हो-हल्ले की तो विपक्ष का होना बहुत आवश्यक है परंतु होने के लिए विपक्ष का स्वस्थ होना बहुत आवश्यक है। हो-हल्ला अपने-आप में मुद्दा नहीं हो सकता। आपको मुद्दा बनाना है तो आपको बिंदुवार चीजें बतानी भी होंगी। सिर्फ हंगामा बचा है, कांग्रेस की बात करें तो बिंदुवार चीजों की बात करते ही उसका परिवारवाद सामने आ जाता है, परिवार की कलह सामने आ जाती है, परिवार की अक्षमता सामने आ जाती है।..

अलोकतांत्रिकों का लोकतंत्र बचाने का प्रहसन

हिंसा कोई भी करे, लोकतंत्र में यह स्वीकार्य नहीं है। किन्तु विसंगति देखिए, दिसंबर 2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान एंटीफा से जुड़े एक हत्यारे पर कार्रवाई को कॉमरेड की राष्ट्रपति द्वारा हत्या बताते हुए एंटीफा के लोग कार्रवाई का सप्ताह मनाने की तैयारी कर रहे थे। तब उन्होंने जमकर हिंसा की। क्या एंटीफा की गतिविधियों से लोग उत्पीड़ित नहीं होते? ये एंटी फासिस्ट-सबसे बड़े फासिस्ट हैं।..

पुरखे, पहचान और पचहत्तर साल की घुट्टी!

ये जो बांटने की राजनीति है, उसके पीछे कन्वर्जन का एक बड़ा तंत्र है। मत भूलिए कि भारत की मूल पहचान को बदलने का, समाज को उसकी मूल आस्थाओं से काट कट्टरपंथी बनाने का खेल लगातार चला है। और जब समाज यह कहता है कि हम एक हैं, तो दशकों पुराना, जमा-जमाया खेल बिगड़ता लगता है क्योंकि भारत को बांटने के लिए भारी मेहनत की गई है ..

विष+वैमनस्य+विश्वासघात= वामपंथ

केरल स्थित मल्लपुरम में माकपा ने एक ईसाई कार्यकर्ता पीटी गिल्बर्ट को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। दरअसल गिल्बर्ट ने अपनी पत्नी और बेटे के जबरन इस्लाम में कन्वर्जन का विरोध किया था और पार्टी से मदद मांगी थी। पर पार्टी को यह विरोध नागवार गुजरा और उन पर यह कार्रवाई की गई। ..

कन्वर्जन, इस्लाम और सुलगते सवाल

सभ्य समाज को, कमजोर वर्गोें को कठमुल्ला सोच से खतरा है मगर ज्यादा बड़ा खतरा खुद मुसलमानों के लिए है। अपने घर में जिहाद, कन्वर्जन को फर्ज मानने वाले विक्षिप्तों से लड़ाई उनको लड़नी है। अन्यथा कट्टरपंथियों को ‘ड्राईविंग सीट’ पर बैठाकर आगे बढ़ती मुस्लिम सिविल सोसाइटी का सफर निश्चित ही ‘सिफर’ हो जाएगा।..

डर और झूठ के सौदागर कौन!

गाय को सिर्फ जानवर समझने वाले, तोप और बंदूक के बल पर दमन करने वाले अंग्रेज बाहर से आए मगर तोप-तलवार से न दबने वाले लोग मंगल ग्रह से नहीं आए थे। वे यहीं के, इसी माटी के लोग थे। वे आस्था की लड़ाई में अपनी जान झोंककर लड़ रहे थे। ..

राजनीति का टीकाकरण

महामारी अभी गई नहीं, परंतु हो-हल्ले को हवा देने वाली राजनीतिक मारामारी एक ‘टीके’ के बाद थम सी गई। कोरोना और इसके उपचार, दोनों को लेकर राजनीति के नए-नए आयाम रचे जा रहे थे,..

राजग सरकार के सात साल-काम में आगे, प्रचार में पीछे

वर्तमान भाजपा नीत राजग गठबंधन सरकार के सात साल पूरे हो चुके हैं। ये एक ऐसी सरकार है जिसे यदि काम की कसौटी पर कसेंगे तो आपको एक से बढ़कर एक ठोस चीजें मिलेंगी, परंतु प्रचार के मोर्चे पर पर्याप्त पिलपिलापन दिखाई देता है। ..

विषाणु, विभाजक-विध्वंसक राजनीति और तीसरी लहर

भारत में जो लोग यह कहते है कि सरकार बहुत सबल है और इसके साथ ही वे इस सबलता में मनमानेपन का कारक जोड़ने की कोशिश करते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि अगर विपक्ष की हालत खराब हुई है, उसकी दुर्गति हुई है तो वह बुरी नीतियों और भ्रष्टाचार के कारण हुई है। ..

जैविक हथियार और भाड़े के सैनिक

दुनिया के ज्यादातर लोग इस बात पर एकमत हैं कि कोरोना वायरस की उत्पत्ति चीन की वुहान प्रयोगशाला से ही हुई है। तथ्यों-तर्कोें में गहराई तक जाने वाले ज्यादातर लोग पूरी स्पष्टता और दस्तावेजों के साथ यह इंगित कर कर रहे हैं कि यह वायरस मानव निर्मित है। ..

वामपंथ के चरित्र में वायरस

मानवता इस मानवता के शत्रु विचार के विरुद्ध खड़ी होगी। वायरस से तो हम लड़ाई जीतेंगे ही, परंतु उस विचार से लड़ाई जीतना ज्यादा महत्वपूर्ण है जो लोगों को आपस में लड़ाता है, कौमों को खत्म करता है, देशों को खत्म करता है, लोगों और मसलों को अपने एजेंडे का हथियार बनाता है। ..

जिहादी गिरफ्त में बंगाल!

हिंसा का गढ़ बने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को उन्माद की पकड़ से निकालने के लिए उपचार की जरूरत है। असंवेदनशील क्षेत्र के तौर पर इन्हें चिन्हित करना, युवाओं को कठमुल्लों की गिरफ्त से बाहर रखना और घुसपैठियों को भारत की सीमा और इसकी चुनाव प्रक्रिया से निकाल बाहर करना अब अपरिहार्य कार्य हो गया है।..

टीकाकरण जितना ही जरूरी है कचरा प्रबंधन

पूरे देश में कोविड-19 महामारी फैली हुई है। केंद्रीय स्तर पर केंद्र सरकार, राज्य स्तर पर राज्य सरकारें और अपने घरों में जनता इससे निपटने में जुटी है। परंतु अभी और बहुत कुछ किये जाने की आवश्यकता है। जहां से यह बीमारी रिसती है, उन छिद्र्रों को हमें ढूंढना पड़ेगा, पहचानना पड़ेगा और बंद करना पड़ेगा..

संवेदनशीलता और समन्वय से होगी हमारी जीत

कोविड-19 की दूसरी लहर पहली के मुकाबले ज्यादा भयानक है। ये लोग महसूस कर रहे हैं और भारत के लिए ये ज्यादा बड़ी चुनौती इसलिए भी है क्योंकि हमारे देश का शासकीय मॉडल न तो साम्यवाद की तरह सूचनाएं छिपाने, मानवाधिकारों को कुचलने का काम कर सकता है..

मानवता की परीक्षा की घड़ी

कोरोना के जिस पहाड़ को मानवीय जिजीविषा ने मसलकर रख दिया था, वह वायरस अब फिर से सुरसा की तरह आकार बढ़ाता दिख रहा है। पहले आघात से थर्राई दुनिया फिर दहशत में है। पहले से ज्यादा संक्रामक, बेकाबू होते वायरस की चुनौती भारत के लिए भी बड़ी है।..

निर्णायक लड़ाई छेड़ने की जरूरत

आंतरिक स्थितियां सही हुए बिना विकास नहीं हो सकता। विकास का एक समीकरण होता है जिसमें शांति भी है, स्थिरता भी है, सुरक्षा भी है और समन्वय भी। यह सब मिलते हैं, तब जाकर विकास होता है। ..

बदलाव की बयार के पीछे सांस्कृतिक आघात की पीड़ा

पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण का मतदान हो चुका है। यहां परिवर्तन की पदचाप सुनी जा सकती है। बदलाव की यह बयार आमजन के सुदृढ़ हो चुके मानस, भाजपा की लोकप्रियता, भाजपा की मुद्दों को उठाने की तत्परता और रणनीति - इन सबके समन्वय के कारण दिख रही है।..

बंगाल : उन्माद की काट

आंखें बंद करके एक शब्द बोलिये - बंगाल। इससे आपके अवचेतन में जो एक चित्र कौंधता है, उसमें ज्ञान के रंग हैं, देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान के रंग हैं, सांस्कृतिक पहचान के रंग हैं। परंतु बंगाल से जुड़ी किसी ताजा खबर को पढ़ने के लिए जैसे ही आप आंखें खोलते हैं,..

पूरब-पश्चिम का मेल, बिगड़ेगा वामपंथी खेल!

महामारी ने दुनिया को यह बताया है कि जहां पर वह खड़ी है, वह अपने-आपको खतरों से परे समझती है। परंतु खतरे कई तरह के हो सकते हैं और ऐसी छोटी, अनदेखी चीजें भी बड़ी हो सकती हैं जिसके लिए आप तैयार नहीं हैं।..

प्रगतिशीलता का मारीची छल

भारतीय राजनीति आज सकारात्मक परिवर्तन के मार्ग पर है। दुनिया देख रही है कि यह परिवर्तन 2014 से प्रारंभ हुआ है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने प्रगतिशीलता की राह पकड़ी थी परंतु दुर्भाग्यवश इसकी दिशा पश्चगामी हो गई। ..

विश्व को भारत से सबक लेने की आवश्यकता

सभी के कल्याण की कामना सभी के द्वारा की जाती है। यहां मानवता महत्वपूर्ण है, इसीलिए यहां मजहब की नहीं, धर्म की बात की जाती है। धर्म यानी धारण करने योग्य कर्तव्य या आचरण। इसी मार्ग पर चल कर विश्व आगे बढ़ सकता है, क्योंकि इस संस्कृति में संघर्ष की नहीं, साथ मिलकर आगे बढ़ने की भावना है। आज विश्व को आगे बढ़ने के लिए, प्रगतिशील बनने के लिए भारत की सांस्कृतिक सोच से सबक लेने की आवश्यकता है।..

भारत को नीचा दिखाने की ‘ऊंची’ चाल!

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के आंगन में किसान आंदोलन की आड़ में रखी गई उत्पात की चिंगारी कैसे दावानल का रूप ले सकती है, यह गणतंत्र दिवस पर हम सबने देखा।..

किसानों का नाम लेकर अराजकता की खेती

खेती-किसानी की आड़ में 26 नवंबर, 2020 को उपद्रव का जो जमावड़ा राजधानी की दहलीज पर जमाया गया था उसका भांडा इस 26 जनवरी को फूट गया। ..

जम्मू-कश्मीर में लहराती लोकतंत्र की विजय पताका

जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद (डीडीसी) चुनाव में 75 सीटें जीतकर भाजपा यहां सबसे बड़ा दल बना है। जम्मू-कश्मीर के चुनाव परिणामों को लेकर चर्चा हो रही है और होनी भी चाहिए। लेकिन इन चुनावों की व्याख्या सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इन चुनावी परिणामों को लोकतंत्र, जनकांक्षा और भारत की एकता समेत तमाम मानकों पर देखा जाना बेहद जरूरी है।..

अड़ना नहीं, बढ़ना होगा!

तीन नये कृषि कानूनों के विरुद्ध दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन को समझने के लिए इसके तीन आयामों को समझना होगा। कानूनों से प्रभावित होने वाला वर्ग व्यापक है इसलिए इन कानूनों के विषय में राजनीति को किनारे रखते हुए विस्तृत और तथ्यात्मक विश्लेषण करना जरूरी है।तीन नये कृषि कानूनों के विरुद्ध दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन को समझने के लिए इसके तीन आयामों को समझना होगा। कानूनों से प्रभावित होने वाला वर्ग व्यापक है इसलिए इन कानूनों के विषय में राजनीति को किनारे रखते हुए विस्तृत और तथ्यात्मक विश्लेषण ..

क्या उन्माद के आढ़ती काटेंगे आंदोलन की फसल!

इस घड़ी में सरकार या वास्तविक किसानों, दोनों के लिए महत्वपूर्ण बात ये है कि भाषा का संयम बनाए रखा जाए। कड़वी भाषा, आक्रामक तौर तरीकों, अन्य नागरिकों के लिए परेशानी खड़ी करने वाले पैंतरों से से बचा जाए। जो भी लोग संवाद के इच्छुक हैं वो सामने आएं और उनकी आंशकाओं का निर्मूलन किया जाए साथ ही उपद्रवियों के साथ सख्ती और पारदर्शिता से निपटा जाए। दिसंबर माह के पहले सप्ताह में सर्दी बढ़ने के साथ-साथ कथित किसान आंदोलन गर्म हो गया है। दिल्ली को अन्य राज्यों के साथ जोड़ने वाले जोड़ों की जकड़न बढ़ गई है। राजधानी के लिए ..

नतीजे : नफा, नाराजी और निष्कर्ष

कोरोना काल है। ‘वर्क फ्रॉम होम’ का जमाना है। लगता है कि चुनाव परिणामों से जुड़ी सर्वेक्षण एजेंसियों ने भी इसी सुविधा का लाभ उठा लिया था। नतीजा, इन्होंने पूर्वानुमानों में बिहार में महागठबंधन की सरकार बनवा दी। फिर क्या था, ‘जंगलराज के युवराज’ की ताजपोशी की तैयारियां होने लगीं। खबरिया चैनलों के भारी-भरकम विश्लेषणों ने भी उल्टी दिशा पकड़ ली। एनडीए की नीतियों पर सवाल दागे गए। यह तो होना ही था, की तर्ज पर पांडित्य उड़ेला गया। अगले दिन चढ़ते सूरज के साथ युवराज जोड़ी के चेहरे ..

सुलगते सवाल और ‘सेकुलर’ चुप्पियां

पिछले दिनों हमने दो घटनाक्रम देखे। एक यूरोप में जिहाद, उसके खिलाफ फ्रांस का कड़ा रुख। दूसरा घटनाक्रम, एक पत्रकार के तीखे सवालों से परेशान महाराष्ट्र की सरकार का सरकारी आतंकवाद। दोनों घटनाक्रम आपको अलग-अलग लग सकते हैं, लेकिन दोनों में एक समानता है और यह समानता ऐसी है जिसने दुनिया में कुछ किया हो या न किया हो, हमारे यहां के कथित वौद्धिक उदारवादियों की संकीर्णता को एक बार फिर उघाड़कर रख दिया। जिहाद हो या सेकुलर सरकार का राजनीतिक आतंकवाद, इसके खिलाफ इस देश में लिबरल्स, तथाकथित बुद्धिजीवी, वामपंथी खेमे के ..

मीडिया को क्या चाहिए, स्वतंत्रता या स्वछंदता!

कोरोना काल में अलग-अलग चुनौतियों के सामने डटकर खड़ा भारत ‘स्व’ के मंत्र से संकटों का समाधान कर रहा है, किन्तु भारतीय मीडिया में ‘स्व’ की दो बारीक धाराओं, दो परिभाषाओं को अभिव्यक्त करता द्वंद्व मुखर हो रहा है..

अ-क्षर साधना

मामाजी के कृतित्व पर केंद्रित संग्रहणीय अंक फिलहाल सीमित संख्या में उपलब्ध हैं। शीघ्र ही यह आनलाइन भी उपलब्ध होगा। सामयिक विषयों से इतर ऐसे अंक वैचारिक क्षुधा को तृप्त करने के लिए आवश्यक हैं। अक्षर का अर्थ ही है जिसका क्षरण नहीं हो। पत्रकारिता और कुछ नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक क्षेत्रों में क्षरण-पतन के विरुद्ध सतत साधना ही है। लेकिन यह अक्षर साधना तो विषयों के प्रति पूरी संवेदनशीलता और विघ्नों के समक्ष अविचल भाव से डटे रहकर ही हो सकती है। स्व. माणिक चंद्र वाजपेयी (उपाख्य ..

अयोध्या का न्याय

सबसे महत्वपूर्ण बात है कि न्याय समय पर मिलना चाहिए। अगर न्याय देरी से मिले तो उसका कोई मतलब नहीं रह जाता। लोगों को लग रहा था कि देश आजाद हो गया, लेकिन उन्हें न्याय तो मिला ही नहीं। लोगों के मन में इस बात की टीस थी, जो अंदरखाने बढ़ती जा रही थी। इसके लिए किसी एक दल के नेता या विचारधारा को दोषी ठहराने का प्रयास करना गलत है, क्योंकि यह एक सामाजिक मनोभाव था।सवाल क्या है, उससे ज्यादा जरूरी है कि सवाल करने वाला कौन है? संदर्भ है अयोध्या में बाबरी ढांचे को गिराए जाने पर अदालत के फैसले के बाद ..

विश्व को चाहिए कई वैक्सीन

अधूरी कुंठित विचारधाराओं, व्यक्तिगत हितपूर्ति की इच्छाओं पर पलते विषाणुओं का इलाज कोविड जितना ही जरूरी है। विश्व को लोकतंत्र और वैश्विक मानवता की वैक्सीन की जरूरत है। दुनिया में लोकतंत्र कैसे मजबूत हो, दुनिया में समानता के अधिकारों की बात कैसे हो और ये जो छलने वाले लोग हैं, इनकी वैक्सीन अगर नहीं खोजेंगे तो ऐसे वायरस बार-बार आते रहेंगे।एक चलचित्र में बहुत सारे स्थिर-चित्र होते हैं, लेकिन देखने वाले को उसमें शामिल किसी खास चित्र के कितने आयाम हैं, इसका अंदाजा तब तक नहीं होता जब तक उसे फ्रीज नहीं किया ..

पत्ता टूटा, वट वृक्ष सूखा

देश और संस्कृति की धारा अजस्र होती है। दलीय राजनीति या सत्ता आने-जाने के बदलाव और बहावों से अप्रभावित! प्रणब मुखर्जी को यह स्मरण रहा, कांग्रेस भूल गई।स्व. प्रणब मुखर्जी अभूतपूर्व झंझावातों से भरे वर्ष 2020 में अगस्त की आखिरी शाम भारतीय लोकतंत्र के लिए एक आघात और अंधेरा लेकर आई।5:46 बजे अभिजीत मुखर्जी का वह ट्वीट आया जिसके आने की आशंका और न आने की इच्छा हर भारतीय के दिल में थी।प्रणब दा नहीं रहे!पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणब मुखर्जी का यूं जाना राजनीति के भ्रमपूर्ण कोलाहल को दिशा देने वाले स्वर ..

खोदा पहाड़, निकला कुनबा

काले को सफेद बताने के फेर में सबको धोखा देने वाली कांग्रेस नेहरू परिवार से फिर खुद धोखा नहीं खाएगी कहना मुश्किल है, क्योंकि धोखा और असत्य तो ए. ओ. ह्यूम इसकी कुंडली में लिख गए थे। और असत्य का क्या है, असत्य अपमानित भी होता है, पराजित भी।पिता जवाहर लाल नेहरू और बेटों राजीव  व संजय के साथ इंदिरा  कहावत है कि पूत के पांव पालने में दिखने लगते हैं। इस कहावत के आइने से कांग्रेस को देखा जाए तो जो सबसे बड़ा शब्दचित्र उभरता है वह है-धोखा!एक अंग्रेज, ए. ओ. ह्यूम द्वारा अंग्रेजी शासन के ..

सतर्क और शक्तिशाली भारत

कोविड कुहासे के बीच भारत के इस स्वतंत्रता दिवस का सूर्योदय कुछ अलग है। महामारी को चित्त करने के लिए दुनिया सामाजिक दूरी का दाव आजमा रही है और इस बीच भारत ने वैश्विक संबंधों की दशकों पुरानी खाइयों को पाटने वाले लंबे डग भर डाले हैं ..

हार्दिक आनंद

राम का वनवास खत्म हुआ। हार्दिक आनंद! किन्तु ध्यान रखिए, अयोध्या से निकलने वाली शांति-सौहार्द की राह के कई कांटे अभी बाकी हैं। एक संघर्ष समाप्त हुआ किन्तु सरकार और समाज दोनों के लिए आने वाला दौर निश्चित ही परीक्षाओं का दौर है। नहीं भूलना चाहिए कि कुछ तत्व ऐसे भी हैं जिनकी ‘दाल-रोटी’ इस देश में नफरत का चूल्हा सुलगाए रहने से ही चलती है।36 संप्रदायों के 140 संत, देश की समस्त पावन नदियों का निर्मल जल, विभिन्न तीर्थक्षेत्रों की मिट्टी और विविधता के इस सागर में मानवता को मर्यादा की दिशा ..

इतिहास का अनमोल पल

‘जय रामजी की’ या ‘राम-राम’ के सम्बोधन से जहां लोगों की सुबह होती है और जीवन का सूरज डूबने पर भी जिस समाज की यात्रा ‘राम नाम सत्य है’ उच्चारते हुए आगे बढ़ जाती है उस धरती के लोगों के लिए 5 अगस्त, 2020 का सवेरा कुछ अलग है..

उद्घोष राम-भाव का

व्याकरण के अनुसार किसी जाति, द्रव्य, गुण, भाव, व्यक्ति, स्थान और क्रिया आदि के नाम को संज्ञा कहते हैं। अब स्थान-नाम की इस कसौटी पर अयोध्या को रखिए। अयोध्या! यह केवल संज्ञा नहीं है। केवल शब्द नहीं है। अयोध्या इस राष्ट्र का श्वास, इसका प्राण है। जिन्हें इस देश से, इसकी एकता से भय लगता था उन्होंने अ-युध्य अयोध्या को लड़ाई का मैदान, लोगों के मन बांटने वाला मुद्दा बना दिया। जो बाहर से आए उनके लिए इस देश के लोगों को काटना, जनमानस को बांटना यह रणनीतिक खेल या कहिए सत्ता को स्थायित्व देने वाला ..

कांग्रेस-‘वायरस’ मिलीभगत

2017 में डोकलाम तनाव के दौरान चीन के राजदूत के यहां दावत पर पहुंचे थे राहुल गांधी, रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका वाड्रा। यह चित्र उसी मौके का हैचीनी सेना के पीछे हटने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।  भारत-तिब्बत सीमा पर चीन की धींगामुश्ती ना तो एक दिन का मुद्दा है, ना एक दिन में सुलझने वाला है इसलिए ड्रैगन के पीछे हटने को उसकी हार की बजाय डोकलाम-गलवान के बाद उत्तरोत्तर बढ़ती तिलमिलाहट (और आगे फिर मौके की ताक) का आकलन करते हुए देखना चाहिए।किन्तु चीन की हार न होने पर भी इस घटनाक्रम में भारत की तात्कालिक ..

संगठित समाज से हारता रहा है संकटकाल

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विस्तारवाद को जवाब

तिब्बत की आजादी का कत्ल हो गया, भारत की जमीन गई और इसके बाद भी देश को यही समझाया गया कि उस जमीन का क्या जहां ‘एक तिनका भी नहीं उगता!’ सरकार जगी न जगी, धोखे की आहट से मेजर शैतान सिंह भाटी जैसे सपूतों का शौर्य जाग गया ..

हमें बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं!

अराजकता की राजनीति, यानी अथक प्रयासों के बाद मतभिन्नताओं के विविधतापूर्ण बिंदुओं को जोड़कर तैयार की गई एक सर्वमान्य और न्यायोचित व्यवस्था को ताकत के बूते बदलने की प्रवृत्ति। लेकिन यह केवल प्रवृत्ति नहीं, एक गंभीर बीमारी है। कोरोना से भी भयंकर!..

चीनी कहानी, कांग्रेस की जुबानी

 \\राहुल गांधी को चीन के बारे में देशभक्तों को किसी भी बात की नसीहत देते वक्त यह भी ध्यान रखना चाहिए कि लोगों को यह भी याद है कि ‘युवराज’ के पिता के नाना ने कैसे चीन को अक्साई चिन सौंप दिया था! छिटपुट कहानियों को सूक्ष्मदर्शी कांच से दिखाकर चीन के सुर में सुर मिलाती ये आवाजें, देश में उठें या बाहर, उनके झांसे में आने के दिन लद गए।जरूर, देशभक्तों को बिल्कुल याद रखना चाहिए...। जब आप किसी से कहते हैं, ‘‘आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए’’ तो इससे आपका आशय यही होता ..

हिंदू साम्राज्य दिवस पर विशेष : जन-जन के नायक शिवाजी महाराज

हमारे महान ग्रंथों में मनुष्यों के जन्मजात शासक के जो गुण हैं, शिवाजी उन्हीं के अवतार थे। वह भारत के असली पुत्र की तरह थे जो देश की वास्तविक चेतना का प्रतिनिधित्व करते थे। उन्होंने दिखाया था कि भारत का भविष्य अभी या बाद में क्या होने वाला है..

सूचनातंत्र में संक्रमण

अगर इसे वाकई लोकतंत्र के भार को उठाना है तो उसे स्वस्थ तो रहना ही पड़ेगा और अगर संक्रमण से बचाव के उपाय स्व-प्रेरित हों तो इलाज की कष्टकारी प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ेगी।  आज वैश्विक महामारी का संक्रमण तो है ही, सूचनाओं को लेकर भी एक तरह का संक्रमण है। कई बार इसमें शरारत भी दिखती है। इसलिए मीडिया से जुड़े लोगों के लिए जरूरी है कि वे रफ्तार के चक्कर में सावधानी न छोड़ दें। कहते भी हैं कि दुर्घटना से देर भली और जब बात सूचना की हो तो सावधानी कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए लोकतंत्र के चौथे ..

आफत की काट आत्मनिर्भरता

संवाद की शैली क्या होगी, यह इस पर निर्भर करती है कि यह किनके बीच हो रही है। ताली-थाली पीटना, बत्ती बुझाना, दीया और मोमबत्ती जलाना, यह भी संवाद का तरीका था-एक संवेदनशील नेतृत्व वाली सरोकारी सरकार और उस पर अटूट भरोसा करने वाले समाज के बीच। कोरोना से दो-दो हाथ करते हुए आज जो पूरा देश कदमताल कर रहा है, उसका भरोसा उसी संवाद ने दिया था।..