बेलाग

नतीजे : नफा, नाराजी और निष्कर्ष

कोरोना काल है। ‘वर्क फ्रॉम होम’ का जमाना है। लगता है कि चुनाव परिणामों से जुड़ी सर्वेक्षण एजेंसियों ने भी इसी सुविधा का लाभ उठा लिया था। नतीजा, इन्होंने पूर्वानुमानों में बिहार में महागठबंधन की सरकार बनवा दी। फिर क्या था, ‘जंगलराज के युवराज’ की ताजपोशी की तैयारियां होने लगीं। खबरिया चैनलों के भारी-भरकम विश्लेषणों ने भी उल्टी दिशा पकड़ ली। एनडीए की नीतियों पर सवाल दागे गए। यह तो होना ही था, की तर्ज पर पांडित्य उड़ेला गया। अगले दिन चढ़ते सूरज के साथ युवराज जोड़ी के चेहरे ..

सुलगते सवाल और ‘सेकुलर’ चुप्पियां

पिछले दिनों हमने दो घटनाक्रम देखे। एक यूरोप में जिहाद, उसके खिलाफ फ्रांस का कड़ा रुख। दूसरा घटनाक्रम, एक पत्रकार के तीखे सवालों से परेशान महाराष्ट्र की सरकार का सरकारी आतंकवाद। दोनों घटनाक्रम आपको अलग-अलग लग सकते हैं, लेकिन दोनों में एक समानता है और यह समानता ऐसी है जिसने दुनिया में कुछ किया हो या न किया हो, हमारे यहां के कथित वौद्धिक उदारवादियों की संकीर्णता को एक बार फिर उघाड़कर रख दिया। जिहाद हो या सेकुलर सरकार का राजनीतिक आतंकवाद, इसके खिलाफ इस देश में लिबरल्स, तथाकथित बुद्धिजीवी, वामपंथी खेमे के ..

मीडिया को क्या चाहिए, स्वतंत्रता या स्वछंदता!

कोरोना काल में अलग-अलग चुनौतियों के सामने डटकर खड़ा भारत ‘स्व’ के मंत्र से संकटों का समाधान कर रहा है, किन्तु भारतीय मीडिया में ‘स्व’ की दो बारीक धाराओं, दो परिभाषाओं को अभिव्यक्त करता द्वंद्व मुखर हो रहा है..

अ-क्षर साधना

मामाजी के कृतित्व पर केंद्रित संग्रहणीय अंक फिलहाल सीमित संख्या में उपलब्ध हैं। शीघ्र ही यह आनलाइन भी उपलब्ध होगा। सामयिक विषयों से इतर ऐसे अंक वैचारिक क्षुधा को तृप्त करने के लिए आवश्यक हैं। अक्षर का अर्थ ही है जिसका क्षरण नहीं हो। पत्रकारिता और कुछ नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक क्षेत्रों में क्षरण-पतन के विरुद्ध सतत साधना ही है। लेकिन यह अक्षर साधना तो विषयों के प्रति पूरी संवेदनशीलता और विघ्नों के समक्ष अविचल भाव से डटे रहकर ही हो सकती है। स्व. माणिक चंद्र वाजपेयी (उपाख्य ..

अयोध्या का न्याय

सबसे महत्वपूर्ण बात है कि न्याय समय पर मिलना चाहिए। अगर न्याय देरी से मिले तो उसका कोई मतलब नहीं रह जाता। लोगों को लग रहा था कि देश आजाद हो गया, लेकिन उन्हें न्याय तो मिला ही नहीं। लोगों के मन में इस बात की टीस थी, जो अंदरखाने बढ़ती जा रही थी। इसके लिए किसी एक दल के नेता या विचारधारा को दोषी ठहराने का प्रयास करना गलत है, क्योंकि यह एक सामाजिक मनोभाव था।सवाल क्या है, उससे ज्यादा जरूरी है कि सवाल करने वाला कौन है? संदर्भ है अयोध्या में बाबरी ढांचे को गिराए जाने पर अदालत के फैसले के बाद ..

विश्व को चाहिए कई वैक्सीन

अधूरी कुंठित विचारधाराओं, व्यक्तिगत हितपूर्ति की इच्छाओं पर पलते विषाणुओं का इलाज कोविड जितना ही जरूरी है। विश्व को लोकतंत्र और वैश्विक मानवता की वैक्सीन की जरूरत है। दुनिया में लोकतंत्र कैसे मजबूत हो, दुनिया में समानता के अधिकारों की बात कैसे हो और ये जो छलने वाले लोग हैं, इनकी वैक्सीन अगर नहीं खोजेंगे तो ऐसे वायरस बार-बार आते रहेंगे।एक चलचित्र में बहुत सारे स्थिर-चित्र होते हैं, लेकिन देखने वाले को उसमें शामिल किसी खास चित्र के कितने आयाम हैं, इसका अंदाजा तब तक नहीं होता जब तक उसे फ्रीज नहीं किया ..

पत्ता टूटा, वट वृक्ष सूखा

देश और संस्कृति की धारा अजस्र होती है। दलीय राजनीति या सत्ता आने-जाने के बदलाव और बहावों से अप्रभावित! प्रणब मुखर्जी को यह स्मरण रहा, कांग्रेस भूल गई।स्व. प्रणब मुखर्जी अभूतपूर्व झंझावातों से भरे वर्ष 2020 में अगस्त की आखिरी शाम भारतीय लोकतंत्र के लिए एक आघात और अंधेरा लेकर आई।5:46 बजे अभिजीत मुखर्जी का वह ट्वीट आया जिसके आने की आशंका और न आने की इच्छा हर भारतीय के दिल में थी।प्रणब दा नहीं रहे!पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणब मुखर्जी का यूं जाना राजनीति के भ्रमपूर्ण कोलाहल को दिशा देने वाले स्वर ..

खोदा पहाड़, निकला कुनबा

काले को सफेद बताने के फेर में सबको धोखा देने वाली कांग्रेस नेहरू परिवार से फिर खुद धोखा नहीं खाएगी कहना मुश्किल है, क्योंकि धोखा और असत्य तो ए. ओ. ह्यूम इसकी कुंडली में लिख गए थे। और असत्य का क्या है, असत्य अपमानित भी होता है, पराजित भी।पिता जवाहर लाल नेहरू और बेटों राजीव  व संजय के साथ इंदिरा  कहावत है कि पूत के पांव पालने में दिखने लगते हैं। इस कहावत के आइने से कांग्रेस को देखा जाए तो जो सबसे बड़ा शब्दचित्र उभरता है वह है-धोखा!एक अंग्रेज, ए. ओ. ह्यूम द्वारा अंग्रेजी शासन के ..

सतर्क और शक्तिशाली भारत

कोविड कुहासे के बीच भारत के इस स्वतंत्रता दिवस का सूर्योदय कुछ अलग है। महामारी को चित्त करने के लिए दुनिया सामाजिक दूरी का दाव आजमा रही है और इस बीच भारत ने वैश्विक संबंधों की दशकों पुरानी खाइयों को पाटने वाले लंबे डग भर डाले हैं ..

हार्दिक आनंद

राम का वनवास खत्म हुआ। हार्दिक आनंद! किन्तु ध्यान रखिए, अयोध्या से निकलने वाली शांति-सौहार्द की राह के कई कांटे अभी बाकी हैं। एक संघर्ष समाप्त हुआ किन्तु सरकार और समाज दोनों के लिए आने वाला दौर निश्चित ही परीक्षाओं का दौर है। नहीं भूलना चाहिए कि कुछ तत्व ऐसे भी हैं जिनकी ‘दाल-रोटी’ इस देश में नफरत का चूल्हा सुलगाए रहने से ही चलती है।36 संप्रदायों के 140 संत, देश की समस्त पावन नदियों का निर्मल जल, विभिन्न तीर्थक्षेत्रों की मिट्टी और विविधता के इस सागर में मानवता को मर्यादा की दिशा ..

इतिहास का अनमोल पल

‘जय रामजी की’ या ‘राम-राम’ के सम्बोधन से जहां लोगों की सुबह होती है और जीवन का सूरज डूबने पर भी जिस समाज की यात्रा ‘राम नाम सत्य है’ उच्चारते हुए आगे बढ़ जाती है उस धरती के लोगों के लिए 5 अगस्त, 2020 का सवेरा कुछ अलग है..

उद्घोष राम-भाव का

व्याकरण के अनुसार किसी जाति, द्रव्य, गुण, भाव, व्यक्ति, स्थान और क्रिया आदि के नाम को संज्ञा कहते हैं। अब स्थान-नाम की इस कसौटी पर अयोध्या को रखिए। अयोध्या! यह केवल संज्ञा नहीं है। केवल शब्द नहीं है। अयोध्या इस राष्ट्र का श्वास, इसका प्राण है। जिन्हें इस देश से, इसकी एकता से भय लगता था उन्होंने अ-युध्य अयोध्या को लड़ाई का मैदान, लोगों के मन बांटने वाला मुद्दा बना दिया। जो बाहर से आए उनके लिए इस देश के लोगों को काटना, जनमानस को बांटना यह रणनीतिक खेल या कहिए सत्ता को स्थायित्व देने वाला ..

कांग्रेस-‘वायरस’ मिलीभगत

2017 में डोकलाम तनाव के दौरान चीन के राजदूत के यहां दावत पर पहुंचे थे राहुल गांधी, रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका वाड्रा। यह चित्र उसी मौके का हैचीनी सेना के पीछे हटने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।  भारत-तिब्बत सीमा पर चीन की धींगामुश्ती ना तो एक दिन का मुद्दा है, ना एक दिन में सुलझने वाला है इसलिए ड्रैगन के पीछे हटने को उसकी हार की बजाय डोकलाम-गलवान के बाद उत्तरोत्तर बढ़ती तिलमिलाहट (और आगे फिर मौके की ताक) का आकलन करते हुए देखना चाहिए।किन्तु चीन की हार न होने पर भी इस घटनाक्रम में भारत की तात्कालिक ..

संगठित समाज से हारता रहा है संकटकाल

संगठित समाज, संकटकाल, भारतीय समाज, आपातकाल, वैश्विक संकट, वीर सावरकर, बाबासाहेब आंबेडकर, सुभाष चंद्र बोस, महात्मागांधी, इंदिरा गांधी, आपातकाल, कोरोना संकट ..

विस्तारवाद को जवाब

तिब्बत की आजादी का कत्ल हो गया, भारत की जमीन गई और इसके बाद भी देश को यही समझाया गया कि उस जमीन का क्या जहां ‘एक तिनका भी नहीं उगता!’ सरकार जगी न जगी, धोखे की आहट से मेजर शैतान सिंह भाटी जैसे सपूतों का शौर्य जाग गया ..

हमें बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं!

अराजकता की राजनीति, यानी अथक प्रयासों के बाद मतभिन्नताओं के विविधतापूर्ण बिंदुओं को जोड़कर तैयार की गई एक सर्वमान्य और न्यायोचित व्यवस्था को ताकत के बूते बदलने की प्रवृत्ति। लेकिन यह केवल प्रवृत्ति नहीं, एक गंभीर बीमारी है। कोरोना से भी भयंकर!..

चीनी कहानी, कांग्रेस की जुबानी

 \\राहुल गांधी को चीन के बारे में देशभक्तों को किसी भी बात की नसीहत देते वक्त यह भी ध्यान रखना चाहिए कि लोगों को यह भी याद है कि ‘युवराज’ के पिता के नाना ने कैसे चीन को अक्साई चिन सौंप दिया था! छिटपुट कहानियों को सूक्ष्मदर्शी कांच से दिखाकर चीन के सुर में सुर मिलाती ये आवाजें, देश में उठें या बाहर, उनके झांसे में आने के दिन लद गए।जरूर, देशभक्तों को बिल्कुल याद रखना चाहिए...। जब आप किसी से कहते हैं, ‘‘आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए’’ तो इससे आपका आशय यही होता ..

हिंदू साम्राज्य दिवस पर विशेष : जन-जन के नायक शिवाजी महाराज

हमारे महान ग्रंथों में मनुष्यों के जन्मजात शासक के जो गुण हैं, शिवाजी उन्हीं के अवतार थे। वह भारत के असली पुत्र की तरह थे जो देश की वास्तविक चेतना का प्रतिनिधित्व करते थे। उन्होंने दिखाया था कि भारत का भविष्य अभी या बाद में क्या होने वाला है..

सूचनातंत्र में संक्रमण

अगर इसे वाकई लोकतंत्र के भार को उठाना है तो उसे स्वस्थ तो रहना ही पड़ेगा और अगर संक्रमण से बचाव के उपाय स्व-प्रेरित हों तो इलाज की कष्टकारी प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ेगी।  आज वैश्विक महामारी का संक्रमण तो है ही, सूचनाओं को लेकर भी एक तरह का संक्रमण है। कई बार इसमें शरारत भी दिखती है। इसलिए मीडिया से जुड़े लोगों के लिए जरूरी है कि वे रफ्तार के चक्कर में सावधानी न छोड़ दें। कहते भी हैं कि दुर्घटना से देर भली और जब बात सूचना की हो तो सावधानी कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए लोकतंत्र के चौथे ..

आफत की काट आत्मनिर्भरता

संवाद की शैली क्या होगी, यह इस पर निर्भर करती है कि यह किनके बीच हो रही है। ताली-थाली पीटना, बत्ती बुझाना, दीया और मोमबत्ती जलाना, यह भी संवाद का तरीका था-एक संवेदनशील नेतृत्व वाली सरोकारी सरकार और उस पर अटूट भरोसा करने वाले समाज के बीच। कोरोना से दो-दो हाथ करते हुए आज जो पूरा देश कदमताल कर रहा है, उसका भरोसा उसी संवाद ने दिया था।..

झूठ का बारूद

समूचा देश चायनीज वायरस से लड़ रहा है, मगर देश के भीतर ऐसे भी कुछ तत्व हैं, जो आपदा की इस घड़ी में देश से लड़ रहे हैं। उन्होंने भीतर ही भीतर देश की एकता के विरुद्ध लड़ाई छेड़ रखी है। उनकी मंशा लोगों को आपस में लड़ाने की है। जनता के बीच अविश्वास और घृणा की खाई खोदने में व्यस्त ये लोग या समूह, जिनका दाना-पानी आजादी के बाद से उसी ‘बांटो और राज करो’ की नीति पर चल रहा है..

सेकुलर ‘जमात’ का #काफिरोफोबिया

कथित ‘सेकुलर’ लोगों ने सबसे बड़ा ‘कम्युनल’ काम ये किया कि जमात की गलती देखने की बजाय इस गलती की ओर इशारा करने वालों को ‘इस्लामाफोब’ ठहरा दिया। अब जब उन्होंने यह शब्द गढ़ ही दिया है तो देखना होगा कि यह सोच उन्होंने पाई कहां से। कहीं ये उनका ‘काफिरोफोबिया’ तो नहीं! ..

साम्यवादी चोगे में पूंजीवाद

चीन ने अपने हिस्से का ‘काम’ किया, झेल दुनिया रही है। एक जमात ने पूरे समाज को कलंकित करते हुए अपने हिस्से का ‘काम’ किया और कब्रिस्तान में चौगुनी लाशें पहुंचने लगीं, भुगत भारत रहा है..

कोरोना के खिलाफ यदि दुनिया में कोई कायदे से लड़ रहा है तो वह भारत है

जब आपत्तिकाल आता है तो परिवार, समाज, देश, सबकी परीक्षा हो जाती है। ऐसे में जो ऊपर से कुछ होते हैं और भीतर से कुछ और, छिटक जाते हैं, टूट जाते हैं। जहां संस्कार, मजबूती और समझ होती है, वे और मजबूत हो जाते हैं और फिर तभी विपत्ति से निकलने का रास्ता भी दिखता है। ..

काल के प्रस्तर पर अमिट शिलालेख

चाइनीच वायरस त्रासदी के बाद देशबन्दी ने सम्पर्क और तकनीक से जुड़ी चुनौतियां और बढ़ा दीं। किन्तु हमने निर्णय लिया कि परिस्थितियां जो भी हों वाकणकर जी पर केंद्रित विशेषांक को उनके जन्मशताब्दी वर्ष में ही पूरा कर पाठकों को सौंपना पाञ्चजन्य का कर्तव्य है। ..

भंवर के ‘मध्य’ कांग्रेस

रंग में भंग पड़ेगा, यह निश्चित था। अंतत: होली के दिन मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार का रंग उतर ही गया। ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो गए..

दंगों के इंजीनियर

दिल्ली में दंगे हुए, लेकिन इन्हें केवल दंगे कहना सही नहीं होगा। वास्तव में यह सुविचारित हिंसा थी जिसका खाका कुछ लोग पहले से खींचे बैठे थे। किसी सैन्य मुहिम की तरह भारत विरोधी ताकतें अपना-अपना मोर्चा संभाले थीं ..

भारत की साख बढ़ी, उन्मादी बौखलाए

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भारत दौरा ऐतिहासिक ही नहीं, बल्कि कई प्रकार के भ्रम तोड़ने वाला है। यह दौरा इसलिए भी याद किया जाएगा कि अमेरिका, जिसे लोग एक महाशक्ति के तौर पर, दुनियाभर में चौधराहट कायम करने की इच्छुक शक्ति के तौर पर देखते हैं; इस दौरे में अमेरिका की वह छवि टूटती दिखाई देती है..

सावरकर को क्यों दुश्मन मानते हैं कांग्रेस और वामपंथी ?

दुनिया यह जानती है कि बेगुनाहों की जान लेते हुए भी दिल में जन्नत और बहत्तर हूरों का ख्वाब पालने वाला कोई इस्लामी जिहादी भले हो, सामान्य इंसान नहीं हो सकता!लेकिन मरने वाले की कलाई पर कलावा बंधा हो तो बात उलझ सकती है! मुंबई हमला दुनिया को उलझन में डालने वाली ऐसी ही चाल थी। भगवा और आतंकवाद! हो ही नहीं सकता! ..

सिर्फ आंकड़ा नहीं यह जीत

दिल्ली चुनाव में भारी जीत की बधाई के साथ ही आम आदमी पार्टी (आआपा) को एक बात पर तो अपनी गलती माननी पड़ेगी, यही कि ईवीएम सही थी और अरविंद केजरीवाल गलत!..

आंदोलन की असलियत उजागर

जिन्होंने मजहब के नाम पर मातृभूमि के टुकड़े करने की जिद पाली, भारत और पाकिस्तान में ऐसे लोगों के लिए अलग-अलग राय हैं। लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना या जवाहरलाल नेहरू, सियासत की कमान थामने वाले चमकदार चेहरे सीमा के दोनों ओर दर्द और खून से सनी विरासत छोड़ गए हैं, इसमें कोई दो राय नहीं..

विरोध छोटा, षड्यंत्र बड़ा

हल्ला मचाया गया, भ्रम फैलाया गया, दबाव बनाने की कोशिशें हुईं किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने बात साफ कर दी। नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए) पर तुरत-फुरत कोई रोक नहीं लगेगी !..

सब जग तारण नानक आए

इस राष्ट्र को ‘हिंदुस्थान’ नाम भी गुरु नानक जी ने ही दिया था। बात उस समय की है जब बाबर ने भारत पर आक्रमण किया था। तब नानकदेव जी ने बाबर को आक्रांता के तौर पर इंगित करते हुए इस धरती को ‘हिंदुस्थान’ कहकर संबोधित किया था..

नव-वामपंथ का षड्यंत्र

नव-वामपंथ की दूसरी प्रयोगशाला है जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय। हाल के मामलों से पहले, संसद पर हमले की साजिश रचने के लिए दोषी कश्मीरी आतंकवादी अफजल की फांसी पर यहां विरोध प्रदर्शन किया गया था। अफजल को 9 फरवरी, 2013 को फांसी दी जा चुकी थी। लेकिन जेएनयू में विरोध हुआ 9 फरवरी, 2016 को..

मोहिनी तस्वीरों का बदरंग सच

जिनकी बुद्धि उन्हें गुंडे, बदमाशों वाली भाषा और कृत्यों पर उतार दे क्या हम उन्हें बुद्धिजीवी कह सकते हैं? और अगर हम ऐसे लोगों को बुद्धिजीवी मानते हैं तो मानना होगा कि एक समाज के तौर पर कहीं न कहीं हमें भ्रमित करने का काम किया गया है या कोई खामी रही है। वास्तव में ये बुद्धिजीवी हैं ही नहीं..

कांग्रेस का दृष्टिदोष

पिछले कुछ हफ्तों में कांग्रेस और कामरेड के 'जुमा' कनेक्शन ने देश को जलाया भले हो, पार्टी को यह जिला नहीं सकेगा। देश जाग रहा है, समझ रहा है, ज्यादा तार्किक हो रहा है.. ऐसे में सिर्फ अपने तक सिमटी सोच पर गहरे-गंभीर सवाल उठेंगे ही। तब कांग्रेस को पूर्व में किए कामों को या तो पूरी तरह स्वीकारना होगा या नकारना होगा..। जब तक कांग्रेस के शीर्ष परिवार के नेता नीति से बड़े बने रहेंगे, पार्टी बौनी ही रहेगी..

हम भी देखेंगे!

निर्वाचन और लोकतंत्र के खिलाफ खूनी क्रांति की झूमती साम्यवादी हुंकारों में जिहादी उन्माद की बारीक तान चट से पकड़ लेने वाला यह छात्र वास्तव में खतरनाक है! ..

मानवता का ठौर भारत

पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान में हिन्दू कटेंगे, घटेंगे तो धर्म के नाम पर प्रताड़ि़त ये मनुष्य कहां जाएंगे? नया नागरिक कानून भारत की उसी अवधारणा को मजबूत करने वाला है जो इस भूमि का शाश्वत विचार है ..

उम्मीद की रोशनी

हैरानी की बात है कि पूरी दुनिया को जिन इंसानों का दर्द दिखता है, भारत में सेकुलर चश्मा लगाए विपक्ष को ये इंसान नहीं केवल 'गैर-मुस्लिम' दिखते हैं!..

विस्तारवाद का इलाज जरूरी

अरुणाचल की ओर फिर से बढ़ते चीनी दखल-दबदबे की ओर तापिर गाओ ने ध्यान दिलाया, जो अरुणाचल पूर्व सीट से सांसद हैं। 19 नवंबर को उन्होंने लोकसभा में कहा कि चीन अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सीमा में 50-60 किलोमीटर तक घुसपैठ कर चुका है और यदि उसे नहीं रोका गया तो राज्य में दूसरा डोकलाम बन जाएगा..

राम का नाम लो और आगे बढ़ो!

श्री रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसीलिए कहा- कलियुग केवल नाम अधारा, सुमिर-सुमिर नर उतरहिं पारा।। हम भारतीयों के लिए जिस तरह अयोध्या सिर्फ अयोध्या नहीं है उसी तरह मानस केवल ग्रंथ नहीं, जीवन की भटकन समाप्त करने वाला दिशासूचक है।..

अर्थपूर्ण राजनीति

स्वदेशी शब्द पहली बार में अर्थ क्षेत्र में 'स्व' की पहचान और आग्रह तक सीमित लगता है, किन्तु ऐसा है नहीं। भारत सरीखे देश के लिए स्वदेशी का बोध अपने करोड़ों किसान-मजदूरों, उद्यमियों-उद्योगपतियों की साझा शक्ति को समझना, इसे जगाना और इन सबके हितों के संरक्षण के लिए कमर कसना है।..

नया सूर्योदय

पौने छह सौ भारतीय रियासतों को एकता के सूत्र में पिरोने वाले सरदार पटेल को इससे बड़ी श्रद्धांजलि क्या होगी कि भारत के अभिन्न भाग को इससे अलग-थलग करने वाली बेड़ियां ‘लौह पुरुष’ के जन्मदिवस पर ही एक झटके से टूट गईं..

बेलगाम अपराधी, बदहाल बंगाल

मुर्शिदाबाद जिले के जियागंज थाने के कांजीगंज क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बंधुप्रकाश पाल, उनके आठ साल के बेटे और गर्भवती पत्नी की बर्बर हत्या बताती है कि बंगाल में कानून और व्यवस्था की स्थिति बेकाबू है। ..

मंदी के बादल और बदलते भारत की रफ्तार

2014 के बाद से भारत ने बुनियादी ढांचे में बड़े निवेश, व्यवस्था में तकनीक के जरिए पारदर्शिता और भरोसा जगाने वाले जैसे प्रयोग किए हैं, उसकी दूसरी मिसाल दुनिया में नहीं है। भाजपा सरकार के दोबारा प्रबल जनादेश हासिल करने के पीछे यह बड़ी वजह थी..

ऐसे आसान होगी भविष्य की राह

आतंकवाद के दौर तथा एक उन्मादी वर्ग के वर्चस्व ने आम कश्मीरियों की हसरतों को कुचलकर रख दिया है। ..

अगस्ता बनाम अपाचे

लोकतंत्र में नृप यानी राजा के लिए स्थान नहीं, किंतु इस बात का असर सब पर पड़ता है कि शासन के सूत्र किसके हाथ में हैं। अब इस सूक्ति के संदर्भ वर्तमान से जोड़ते हैं। सरकार के विदेश दौरे पहले भी होते थे, अब भी हो रहे हैं। रक्षा सौदे पहले भी हुए, अब भी हुए। किंतु पहले और अब के होने में साफ अंतर है।..

पाकिस्तान का पागलपन

पाकिस्तान में शासन है, परंतु व्यवस्था नहीं है। दुनिया में देशों के पास सेनाएं हैं, पाकिस्तान में सेना के पास एक देश है। लोकतंत्र को फौजी बूटों तले कुचलने का कुचक्र ही वहां अव्यवस्था की जड़ है। हाल में अमेरिकी कांग्रेस के अनुसंधान प्रभाग (सीआरएस) की रिपोर्ट बताती है कि इमरान खान भले कुछ दावा करें, लेकिन उनके शासन में भी सेना (पहले की ही भांति) प्रभावी हस्तक्षेप कर रही है..

सितारे जमीन पर

चिदंबरम के वित्तमंत्री रहते आईएनएक्स मीडिया समूह को भारी भरकम विदेशी धनराशि हासिल करने के लिए दी गई अनुमति में अनियमितताएं थीं। और तो और जिन कंपनियों के रास्ते पैसे की बंदरबांट हुई उन पर चिदंबरम के बेटे का साफ या पर्दे के पीछे से नियंत्रण है!..

पाकिस्तान के पैरोकार कौन?

पाकिस्तान को आसरा बाकी दुनिया से नहीं, भारत में बचे वंशवादी राजनीति के अंखुओं से है। भारत में पाकिस्तानी टुकड़ों पर पलते, लार टपकाते उन कथित आंदोलनकारी गिरोहों से है, जो ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा बुलंद करते हैं।..

'सुराज' आया 'सुषमा' चली गईं

अपनी चार दशक से ज्यादा लंबी यात्रा में महिला नेत्री के तौर पर पहली बार के कई कीर्तिमान बनाने वाली वह अनूठी लो आज एकाएक बुझ गई है। सुषमा का अर्थ ही है उजास, दीप्ति, चमक। जिस तरह कोई तीली बुझने से पहले किसी दिए को प्रदीप्त कर जाती है सुषमा जी का जीवन वैसा ही तो है...

कौन हैं ये लोग?

मुंबई हमले का सबसे कुख्यात चेहरा याद है! अजमल आमिर कसाब। याद कीजिए छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर सीसीटीवी में आई फोटो में इस्लामी आतंकी के एक हाथ में कलावा और दूसरे में मशीनगन चमक रही थी! लव जिहाद के मामलों में पहचान बदलकर प्यार का ढोंग रचाने और बाद में 'शिकार' को इस्लाम में घसीटने के इतने मामले खुले हैं कि अब गिनती से बाहर हैं।..

कौन हैं ये लोग?

लव जिहाद के मामलों में पहचान बदलकर प्यार का ढोंग रचाने और बाद में ‘शिकार’ को इस्लाम में घसीटने के इतने मामले खुले हैं कि अब गिनती से बाहर हैं..

गैंग ऑफ वा(मपंथ) से(कुलर) पुर

झारखंड में ऐसा क्या था कि चोरी के संदेह में 'सोनू' को पीट रही भीड़ को 'हिन्दू' और सोनू को 'तबरेज' बताना जरूरी था, मगर भिवाड़ी में भीड़ के मुस्लिम होने और पिटते-पिटते जान गंवाने वाले हरीश जाटव की हिन्दू अनुसूचित जाति की पहचान छिपाना जरूरी हो गया!..

उतर रहा है नकाब आहिस्ता-आहिस्ता

लड़की के पिता ने भी यह साफ कहा कि उनकी आपत्ति लड़के की बड़ी आयु को लेकर है, जाति पर नहीं। ऐसे में सवाल उठता है कि प्रत्यक्ष तौर पर भाजपा को लक्षित कर परोक्ष रूप से 'हिन्दू' को लांछित करने की मंशाओं के पीछे लक्ष्य क्या है?..

समाज के सामने आने दो सच

यह दुराग्रही प्रवृत्ति का ही नतीजा है कि राहुल गांधी आज कचहरी-कचहरी जा रहे हैं, जमानत पा रहे हैं और बाहर आकर सच की लड़ाई का झूठा नारा लगा रहे हैं। अगर उनके आरोपों में दम था तो उन्हें टिके रहना चाहिए था। राहुल गांधी की जमानत इस बात का 'सर्टिफिकेट' है कि वे लोक को जो पाठ पढ़ा रहे हैं, वह कितना थोथा है।..

कर्ज और मजहबी उन्माद में दबा ‘कप्तान’

सवाल पाकिस्तान की बदहाली और गफलत का नहीं, ‘उम्मत’ और ‘जिहाद’ की उस ‘लत’ का है जिसे सीने से लगाए रखते हुए वह अर्थव्यवस्था को मझधार से निकालने के लिए प्र्रगतिशील दुनिया की मदद चाहता है। क्या यह संभव है?..

आरोपी तो आरोपी होता है, हिन्दू या मुसलमान नहीं

झारखंड के सरायकेला में हुआ ताजा प्रकरण स्तब्ध करने वाला है। यहां पुलिस हिरासत में जिस तबरेज अंसारी की मौत हुई वह चोरी के आरोप में भीड़ द्वारा पीटे जाने के बाद यहां लाया गया था।..

जरूरी है एक देश-एक चुनाव

सत्रहवीं लोकसभा के पहले सत्र में मेजों की थपथपाहट में भविष्य के भारत की गूंज सुनी जा सकती है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पूर्व में भी हुए हैं, आगे भी होंगे ही, किंतु हर बार के मुकाबले इस अभिभाषण की खास बात यह रही कि सरकार के जिन कार्यों का इसमें उल्लेख हुआ उनमें भरोसा जगाने वाले आंकड़े और पारदर्शिता की कहानियां भी थीं। नदी, पर्यावरण, रोजगार, महिला सशक्तिकरण या विकास... अभिभाषण में यदि आने वाले कल के लिए उम्मीदें संजोई गई हैं तो उनका आधार ठोस-फलीभूत योजनाओं का ताना-बाना है।..

रायसीना के धुंधलके की रोशनी में

23 मई, 2019 की ये धुंधलाती शाम है। जिस वक्त रायसीना की उठान के तले राष्ट्रपति भवन के अहाते में नई सरकार का मंत्रिमंडल और इरादे आकार ले रहे थे, भारत की राजनीति में कइयों के दिल डूब रहे थे। दिलों का ये डूबना सत्ता की छीजन के कारण पैदा हुआ है और इसके लिए वे खुद जवाबदेह हैं जिन्होंने लंबे समय तक देश की राजनीति को एकध्रुवीय बनाए रखा। जो पार्टी आजादी से पहले सामाजिक भावनाओं का मंच होती थी, उसके जरिये न केवल राजनीति को एकध्रुवीय बनाया गया बल्कि उस पार्टी को भी एक परिवार की जागीर बना दिया गया।..

मोदी और शाह के नेतृत्व में भाजपा की विनम्र, विराट विजय

जातिवाद, विभाजक, विद्वेषी राजनीति को नकारकर जनता ने विकास की राह पर बढ़ते भारत में फिर जताया विश्वास. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राजग ने लोकसभा चुनाव जीतकर दर्ज किया इतिहास।कुनबे और कोटरियों में पलने वाली राजनीति को जनता ने सिरे किया परास्त..

विचारधारा और समर्पण

माहौल चुनावी है। सो, जिन्हें कभी श्रीराम काल्पनिक लगते थे, अब उन्हें भी राम से लेकर रामधारी सिंह दिनकर तक, तमाम नैतिक-सांस्कृतिक संदर्भ याद आ रहे हैं।..

भारत की नयी उठान

लोकतंत्र के महापर्व की प्रक्रिया के चौथे चरण में पहुंचते-पहुंचते इस उत्सव की आधी परिक्रमा पूरी हो चुकी है। कुल लोकसभा सीटों में बहुमत तय करने की दृष्टि से जरूरी आंकड़ा ईवीएम मशीनों की तिजोरी में बंद हो चुका है। इसके साथ ही विश्व परिदृश्य से भविष्य में उत्तरोत्तर मजबूत होते भारत के संकेत उभरने लगे हैं। ..

शैतानी फितूर

गत रविवार, 21 अप्रैल को श्रीलंका के 3 पांच सितारा होटलों—शंग्री-ला, सिनामन ग्रेंड और किंग्सबरी—के अलावा कोलंबो के एक अतिथि गृह तथा एक घर में विस्फोट हुआ, किन्तु यह बात अधूरी और सिर्फ आतंकी हमले के दायरे में सिमटी रह जाएगी जब तक इस तथ्य को खास तौर पर रेखांकित न किया जाए कि 21 अप्रैल को श्रीलंका की राजधानी कोलंबो का सेंट एंथोनी चर्च, पश्चिम तटीय कस्बे का सेंट सेबेस्टियन चर्च और पूर्वी कस्बे बट्टीकलोआ का सेंट माइकल चर्च खून से नहा गए।..

जनमत के संकेत

लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम भले 23 मई को घोषित हों किन्तु यह साफ है कि यह नतीजे वर्ष 2014 की तुलना में ज्यादा रोचक रहेंगे। इस रोचकता का कारण राजनीति के वे संदेश हैं जो बस गूंजने ही वाले हैं।..

कांग्रेस ने हमेशा वोट बटोरने के लिए बाबासाहेब के नाम का प्रयोग किया है

आज बाबा साहेब आंबेडकर की जयंती है। देश में चुनाव का माहौल है। एक दूसरे पर आरोपों और प्रत्यारोपों दौर जारी है। किन्तु खतरे की बात यह है कि आज बाबासाहेब के नाम को आगे रखकर कुछ स्वार्थी राजनैतिक गुट और उनके गुर्गे नफरत के अलाव सुलगाए बैठे हैं।..

नाम की आंधी और गड्डी में बंधे गांधी

चुनाव के दौरान आरोप-प्रत्यारोपों की बरसात कुछ लोगों को दिलचस्प लगती है तो कुछ को बोझिल। मतदान की तिथि नजदीक आते-आते कई बार तथ्यहीन आरोप स्तरहीन बहस का अंधड़ भी खड़ा कर देते हैं, किन्तु नहीं भूलना चाहिए कि राजनीतिक दलों की यह रस्साकशी ही मतदाताओं को सही को चुनने और गलत को बुहारने का अनमोल अवसर देती है। किसी दल या राजनेता के नाम से बड़ा यह अवसर अंतत: मतदाता को सबसे ऊंचे स्थान पर स्थापित करता है।..

मनोहर पर्रिकर एक अनथक योद्धा

गोवा जैसे छोटे राज्य में पर्यावरण का नाश करने पर तुले खनन माफिया से लोहा लेना हो या मत-पंथ और भाषा की विभाजक राजनीति को परास्त करने की बड़ी चुनौती, संगठन को प्रभावी बनाना हो या प्रशासन को जवाबदेह और पारदर्शी, उन्होंने जो काम हाथ में लिया, पूरा कर दिखाया।..

स्वार्थ के टुकड़े

फरवरी 2016 में ये नारे लगाने वाले, नारे लगाने वालों के पक्ष में जेएनयू पहुंच जाने वाले और इस सबकी पृष्ठभूमि में आधी रात को न्यायालय खुलवाने वाले खुद टुकड़े-टुकड़े हैं मगर एक खास कदमताल में काम करते हैं।..

खूंटे से कांग्रेस बंधी है, जनता नहीं

भारत विश्व का सबसे युवा देश और सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इन दो स्थापित तथ्यों के साथ एक बात और जोड़ लें-इस विशाल लोकतंत्र का सबसे बुजुर्ग दल फिर से जवान होने को बेताब है। कांग्रेस में राहुल के लिए राह बनाते हुए सोनिया गांधी का अध्यक्ष की गद्दी से सरकना इसका कथित संकेत था और प्रियंका वाड्रा की ‘एंट्री’ के साथ इसकी मुनादी हो गई है।..

गांधी बहाना, राजनीतिक निशाना

गत 30 जनवरी को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से एक खबर आई। यह छोटी-सी खबर तेजी से सुलगी और राजनीतिक तंदूर की आग तेज हो गई। खबर किसी भगवावस्त्रधारी नेत्री द्वारा गांधी जी के पुतले को गोली मारने की थी। इस हरकत में शामिल लोग गांधी जी के बारे में क्या और कितना जानते हैं, कहना कठिन है।..

हताशाओं का गठबंधन

सारी घटनाएं इतिहास में दर्ज नहीं होतीं। कुछ बातें समाज अपनी स्मृति में लिखता है। सामाजिक अवचेतन की ये अलिखित बातें लिखित इतिहास से ज्यादा गहरी होती हैं। ऐसी ही एक घटना—जिस समय यह देश संस्कृति की धारा में आस्था भरी डुबकियां लगा रहा था (और राज्य सरकार द्वारा की गई व्यवस्थाओं की प्रशंसा कर रहा था), विश्व विस्फारित-मंत्रमुग्ध भाव से उस ‘संस्कृति कुंभ’ को ताक रहा था (और केंद्र सरकार ने प्रवासी भारतीय दिवस के तार इससे जोड़ दिए थे) उस समय विकल्प की धारा होने का दम भरने वाली राजनीति कहां थी!..

मजहब की दीवार, अहमदिया लाचार

अहमदिया मुसलमानों को अन्य मुस्लिम फिरकों द्वारा न तो स्वतंत्र रूप से बोलने का अधिकार दिया जा रहा है और न ही लिखने का। कोई दुस्साहस करता है तो उसे सजा दी जाती है। यहां तक कि अहमदियाओं को मुसलमान ही नहीं माना जा रहा ..

जल न जाए ‘हाथ’!

अंग्रेजी नए साल पर आतिशबाजी देखकर एक सवाल सैकड़ों लोगों के मन में आया- क्या पटाखों की बिक्री और समय की पाबंदी सिर्फ दीपावली के लिए थी! सवाल का जवाब पाबंदी लगाने वाले जानें, हम तो यह जानते हैं कि अपने यहां पटाखे छोड़ने की हुड़क कुछ ऐसी है कि इसे लेकर सभी को बचपन में कभी न कभी नसीहत जरूर मिली होगी।..

डर तो है, पर किससे !

भारत आज भी ऐसा देश है जहां शराब पीने वालों के मुकाबले शराब को न छूने वालों की संख्या ज्यादा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शराब की खपत के आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। इसकी पड़ताल करने वाले बखूबी जानते हैं कि इस देश की परंपरा, नैतिकता, भावनात्मकता और आस्थाओं का संगम लोगों को ‘कॉकटेल’ से दूर करता है।..

अजातशत्रु अटल !

अजातशत्रु। जननायक। शिखर-पुरुष...कितने ही विशेषणों से संबोधित कर सकते हैं हम भारतीय राजनीतिक-साहित्यिक-सामाजिक जगत की महाविभूति मुदितमना अटल बिहारी वाजपेयी को। एक लंबा संघर्षमय, समाज-हितमय जीवन। भारतीय राजनीति के फलक पर संसदीय मर्यादा के उच्चतम प्रतिमानों को जीने वाले चंद राजनेताओं में से एक अटल जी को सिर्फ एक राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं देखा जा सकता। कई आयाम समेटे हुए थे वे अपने भीतर।..

संकेत और सबक

क्‍या हार में क्‍या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं। संधर्ष पथ पर जो मिले, यह भी सही वह भी सही।। -शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ (वरदान माँगूँगा नहीं)..

‘क्रिश्चियन’ तोते में अटकी कांग्रेस की जान

इतालवी में ‘सिग्नोरा’ हिन्दी के ‘श्रीमती’ सरीखा संबोधन है। लेकिन किसी सिग्नोरा को घेरने घोटाले का भूत भी इटली से बरास्ता दुबई होते हुए भारत चला आएगा, किसने सोचा था?..

हमारा संविधान और इसके निर्माताओं की भावना

26 नवंबर और 6 दिसंबर— दो ऐसी तिथियां हैं जिनसे भारतीय इतिहास की चार महत्वपूर्ण घटनाएं जुड़ती हैं। 26 नवंबर संविधान दिवस है तो मुंबई हमले की तारीख भी।..

अयोध्या और आस

अयोध्या - केवल शब्द नहीं, पूरा आख्यान है। इस शब्द का अर्थ है : अ-युध्य। अर्थात् जिससे युद्ध नहीं किया जा सकता, जिससे बैर नहीं पाला जा सकता। जिसे जीतना नितांत असंभव है।इतिहास साक्षी है कि इस अयोध्या को जीतने के लिए बर्बरतम प्रयास हुए। श्रीरामचरितमानस के रचयिता महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने दोहाशतक में लिखा—मंत्र उपनिषद् ब्राह्मनहुँ बहु पुरान इतिहास।जवन जराये रोष भरि करि तुलसी परिहास।।सिखा सूत्र से हीन करि, बल ते हिंदू लोग।भमरि भगाये देश ते, तुलसी कठिन कुजोग।।बाबर बर्बर आइके, कर लीन्हे करवाल।हने ..

संवैधानिक साख पर ‘एक्टिविस्ट’ घात

न्यायपालिका, विधिपालिका, कार्यपालिका और खबरपालिका, वे चार स्तंभ हैं जिन पर लोकतंत्र का पूरा भवन खड़ा है। क्या हो यदि इन खंभों में जरा भी कमजोरी, दरार या डगमगाहट आ जाए! भारतीय लोकतंत्र के लिए यह सवाल इसलिए ज्यादा प्रासंगिक है क्योंकि विश्व का सबसे विशाल लोकतंत्र चौतरफा खतरों के लिए पर्याप्त रूप से खुला है। दागियों के राजनीति में प्रवेश से लेकर क्षेत्रवाद-परिवारवाद का दंश झेलती रही विधिपालिका! नौकरशाही की सुस्त-भ्रष्ट कार्यकथाएं! सेना द्वारा सरकार के तख्तापलट जैसी झूठी-मनगढ़ंत खबरें परोसता और ‘राडिय..

आखिर क्यों बिसराया गया नेताजी को ?

कुछ लोग इतने महान होते हैं कि होने न होने के सुराग तक ठंडे पड़ जाने के दशकों बाद भी वे देश की स्मृति को सुगंधित करते रहते हैं। ऐसे लोगों में एक अग्रणी नाम है- नेताजी सुभाष चंद्र बोस।..

राह भविष्य के भारत की

विजयादशमी पर सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का उद्बोधन ठीक वैसा ही था जैसी कि इसकी पहचान है। सामयिक मुद्दों को समग्रता से समेटे, धुंधले-उलझाऊ मुद्दों पर पर्याप्त स्पष्ट-मुखर और एक महान प्रेरक आह्वान से गूंजता हुआ।..

आवाज बुलंद करने का समय

पहाड़ी ढलानों वाले चीड़ के जंगलों में भी आग इतनी तेजी से नहीं फैलती जितनी कि अशरीरी विश्व के 'वर्चुअल' वन में। छोटे से हैशटैग की सुलगती तीली कब, कहां, कितने विकराल अग्निकांड को जन्म देगी, कहा नहीं जा सकता। हाल में पुरुषों द्वारा उत्पीड़न की शिकार महिलाओं की मुखर होती आवाजें, 'मी टू' (# MeToo) अभियान की दिन पर दिन तेज होती लपटें इस बात का उदाहरण हैं। मीडिया के ऊंचे और असरदार आरोपों के नीचे हैं.. रजतपट के उजले चेहरे यकायक काले पड़ गए हैं.. जिनकी कभी तूती बोलती थी उनकी इज्जत की कुर्की सोशल मीडिया के ..

'राफेल' या रा..फेल

अपनी हर बात के लिए 'मोदी की गलती' को जिम्मेदार ठहराने वाले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी आजकल खासे उत्साह में (या कहिए हवा में) हैं। राफेल पर राहुल की कलाबाजियां कांग्रेस के लिए यह खुश करने वाली बात होनी चाहिए थीं मगर हैरानी कि अध्यक्ष की तेजी ने सिपहसालारों का सिरदर्द बढ़ा दिया है।वायुसेना उपप्रमुख, एअर मार्शल आर. नांबियार के यह कहने के बाद कि वर्तमान राफेल सौदा पहले किए जा रहे सौदे से बेहतर है, हालांकि, अब इस मुद्दे पर राजनीति की गुंजाइश नहीं बची। किन्तु क्योंकि फिलहाल, राफेल, राहुल की नई गेंद है। ..

साफ बात असर गहरा

 दुनिया में हमारा कोई शत्रु नहीं है। अगर कोई शत्रु है भी तो अपने को बचाते हुए उन्हें साथ लेकर चलने की आकांक्षा रखते हैं। ये वास्तव में हिन्दुत्व है— डॉ. मोहन भागवतभविष्य का भारत : संघ का दृष्टिकोण, नाम से दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित तीन दिवसीय आयोजन को ऐतिहासिक मानने के कई कारण हैं।इनमें सर्वप्रमुख है- ऐसे विशाल सार्वजनिक मंच से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक द्वारा विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों पर संघ के मत को समाज जीवन की विभिन्न विभूतियों के सामने स्पष्ट तौर पर रखना। किन्तु ..

खेलेंगे, कूदेंगे, बनेंगे नवाब

पुराने वक्त में कहा जाता था- पढ़ोगे, लिखोगे, बनोगे नवाब। खेलोगे, कूदोगे, होगे खराब।।..

कैसा हो मीडिया?

मैं मृत्यु से भी उतना नहीं डरता, जितना झूठ से डरता हूं। —वेदव्यास (महाभारत, वन पर्व, 302/6) पाञ्चजन्य और भारतीय जनसंचार संस्थान द्वारा झूठी खबरों की विस्तृत पड़ताल (अंक 1 जुलाई, 2018) की पहल मीडिया से जुड़े विविध पक्षों को इस मुद्दे पर सचेत और जागरूक करने में सफल रही, ऐसा लगता है।..

हिन्दी संस्कृति का समुद्रपारीय मंथन

 विदेश मंत्रालय द्वारा मॉरीशस सरकार के सहयोग से मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुई में आयोजित 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन को कई कारणों से याद किया जाएगा। पहला कारण भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की देहयात्रा पूरी होने से उपजी गहरी शोकांतिका थी। स्वाभाविक ही था कि इसके बाद उद्घाटन कार्यक्रम का उत्सवी उल्लास अनन्य हिन्दी-प्रेमी अटलजी की गहन-गरिमामय स्मृतियों में खो गया।‘काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं..’ की हुंकार भरने वाले राष्ट्रनायक के देहावसान का संयोग देखिए। अंत समय में ..

सियासत के 'समुद्र' में अटल प्रकाश स्तंभ

 देश के 72 वें स्वतंत्रता दिवस पर विविध आयोजनों की उत्सवी चमक को दुख में बदल देने वाली पहली खबर अखिल भारतीय आयुविज्ञान संस्थान से आई! अटल जी की तबियत बिगड़ी..। शाम होते-होते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अटल जी के स्वास्थ्य का हाल लेने एम्स पहुंच गए। देश के पूर्व प्रधानमंत्री, पाञ्चजन्य के प्रथम संपादक और सर्वप्रिय जननेता अटल बिहारी वाजपेयी 11 जून से सांस लेने में दिक्कत और गुर्दे के संक्रमण के उपचार के लिए ‘एम्स’ में थे। अगले रोज दोपहर तक आशंकाओं के बादलों ने पूरे देश और खासकर दिल्ली ..

बंटवारे का दर्द और संघ-समर्पण

15 अगस्त को दो तरह से देखा जा सकता है, एक- जिस दिन भारत को ब्रिटिश राज से मुक्ति मिली। दूसरा- वह दिन जब इस महान राष्ट्र को अलग-अलग हिस्सों में काट-बांट दिया गया।..

कालजयी सोच वाले महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद

प्रेमचंद को उनकी जयंती (31 जुलाई) के अलावा भी बार-बार याद किया जाना जरूरी है क्योंकि वह उस लोक, उस तंत्र, उस सुराज तथा उस भारतीयता के पहरेदार व प्रखर प्रवक्ता हैं जिससे आज की सेकुलर-प्रगतिशील ब्रिगेड कन्नी काटती है। ..

महापुरुष कौन ? महापुरुषों पर मौन

तारीख का चलताऊ अर्थ दिनांक लिया जाता है किन्तु सही शाब्दिक अर्थ पर जाएं तो तारीख यानी इतिहास। कुछ दिनांक वास्तव में ऐसे होते हैं जब इतिहास लिखा जाता है। हम देखते हैं कि महापुरुषों से जुड़े दिनांक इतिहास में दर्ज हो जाते हैं। ऐसे में कैलेंडर की तारीखों में, समय के सफर में, मील के पत्थर की तरह स्थापित हस्तियों के बारे में एक सवाल जरूरी है-आखिर महापुरुष कौन हैं? उन्हें देखने का नजरिया क्या हो सकता है? निस्संदेह महापुरुष किसी भी देश के लिए, और कई बार संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा होते हैं। इसमें भी क..

मीडिया निभाए जिम्मेदारी न दे धोखा

राजनीति और राजनेताओं की छान-फटक तो मीडिया हर दिन पूरी दिलचस्पी से करता है किन्तु मीडिया के भीतर सरोकारों को छोड़ने, खबरों को तोड़ने, झूठ का पुट जोड़ने और खबर को मनमानी दिशा में मोड़ने का संज्ञान कौन लेगा? ..

क्यों चुप हैं क​थित बुद्धिजीवी रोना विल्सन की चिट्ठी पर

नक्सली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की फिराक में हैं। लेकिन इस चौंकाऊ चिट्ठी पर चुप्पी ओढ़ ली जाती है और यह रवैया किसी को चौंकाता नहीं। उन्हें हथियार चाहिए, उन्हें पोलित ब्यूरो की अनुमति चाहिए, वे भीमा कोरेगांव के हिसंक आंदोलन की सफलता पर एक-दूसरे की पीठ थपथपा रहे हैं।..

सबक कैराना से आगे हैं

कैराना! इस एक शब्द ने दर्जनों हताश चेहरों पर चमक ला दी है। मुख्यधारा की राजनीति में बुहार दिए गए दलों और उनके दिग्गजों के दिलों में अरमानों के लाखों दिए जल उठे हैं। निशाना एक है इसलिए बाकी चार सीटों का जिक्र जरूरी नहीं है। महाराष्ट्र की पालघर सीट पर भाजपा जीती है तो उसका जिक्र तो बिल्कुल नहीं, क्योंकि भाजपा की जीत नहीं भाजपा की हार ही ‘खबर’ है।..

संकीर्णता की बैसाखी और मुद्दों के कुहासे

राहुल गांधी बिला शक राष्ट्रीय नेता हैं। किन्तु उनकी पहचान क्या है? यह तीन कारकों का एक मिला-जुला मामला है। पहला कारक देश की सबसे बुजुर्ग पार्टी है, जिसके वे फिलहाल अध्यक्ष हैं। दूसरा कारक उनका परिवार है जो सबसे लंबे समय तक इस देश की सत्ता के केंद्र में काबिज रहा है। तीसरा कारक राहुल गांधी खुद हैं- यानी वह पहचान जो अपने लिए उन्होंने खुद कमाई है।..

सरकार किसी की भी बने पर ये पांच बातें साफ हैं

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणामों की घोषणा के बाद बहुमत की फांस कईयों के दिलों की धड़कनें बढ़ाए हुए है। कृपया शांत हो जाइए! जनता ने जो करना था कर दिया। ..

विवादों में लिपटी विरासत

ऐसे समय जब पूरा देश जज, न्यायपालिका और महाभियोग से जुड़ी पेचीदगियों को बूझने में जुटा था, इतिहास में दबे एक वकील ने अचानक सुर्खियां अपनी ओर खींच लीं। लोग मानो दो पालों में बंट गए। यदि बांटना ही कसौटी है तो जिन्ना के लिए यह पहचान नई नहीं है। मोहम्मद अली जिन्ना यानी नामी बैरिस्टर। जिन्ना यानी पाकिस्तान का संस्थापक। ..

परिणाम किसी खास दिन और समय पर एक झटके में आते हैं

परिणाम किसी खास दिन और समय पर एक झटके में आते हैं किन्तु इनके पीछे पल-पल की मेहनत और बेहिसाब अड़चनों की ऐसी अकथ कथाएं गुंथी होती हैं जिनका उस एक पल में ब्यौरा नहीं दिया जा सकता।..