बेलाग

विश्व को भारत से सबक लेने की आवश्यकता

सभी के कल्याण की कामना सभी के द्वारा की जाती है। यहां मानवता महत्वपूर्ण है, इसीलिए यहां मजहब की नहीं, धर्म की बात की जाती है। धर्म यानी धारण करने योग्य कर्तव्य या आचरण। इसी मार्ग पर चल कर विश्व आगे बढ़ सकता है, क्योंकि इस संस्कृति में संघर्ष की नहीं, साथ मिलकर आगे बढ़ने की भावना है। आज विश्व को आगे बढ़ने के लिए, प्रगतिशील बनने के लिए भारत की सांस्कृतिक सोच से सबक लेने की आवश्यकता है।..

सक्रिय हैं मीडिया संस्थानों में बैठे कामरेड

भारतीय सेना पर उंगली उठाने वाले मीडिया के एक वर्ग को नहीं दिखतीं चीन की चालाकियां..

भारत को नीचा दिखाने की ‘ऊंची’ चाल!

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के आंगन में किसान आंदोलन की आड़ में रखी गई उत्पात की चिंगारी कैसे दावानल का रूप ले सकती है, यह गणतंत्र दिवस पर हम सबने देखा।..

किसानों का नाम लेकर अराजकता की खेती

खेती-किसानी की आड़ में 26 नवंबर, 2020 को उपद्रव का जो जमावड़ा राजधानी की दहलीज पर जमाया गया था उसका भांडा इस 26 जनवरी को फूट गया। ..

जम्मू-कश्मीर में लहराती लोकतंत्र की विजय पताका

जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद (डीडीसी) चुनाव में 75 सीटें जीतकर भाजपा यहां सबसे बड़ा दल बना है। जम्मू-कश्मीर के चुनाव परिणामों को लेकर चर्चा हो रही है और होनी भी चाहिए। लेकिन इन चुनावों की व्याख्या सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इन चुनावी परिणामों को लोकतंत्र, जनकांक्षा और भारत की एकता समेत तमाम मानकों पर देखा जाना बेहद जरूरी है।..

अड़ना नहीं, बढ़ना होगा!

तीन नये कृषि कानूनों के विरुद्ध दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन को समझने के लिए इसके तीन आयामों को समझना होगा। कानूनों से प्रभावित होने वाला वर्ग व्यापक है इसलिए इन कानूनों के विषय में राजनीति को किनारे रखते हुए विस्तृत और तथ्यात्मक विश्लेषण करना जरूरी है।तीन नये कृषि कानूनों के विरुद्ध दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन को समझने के लिए इसके तीन आयामों को समझना होगा। कानूनों से प्रभावित होने वाला वर्ग व्यापक है इसलिए इन कानूनों के विषय में राजनीति को किनारे रखते हुए विस्तृत और तथ्यात्मक विश्लेषण ..

क्या उन्माद के आढ़ती काटेंगे आंदोलन की फसल!

इस घड़ी में सरकार या वास्तविक किसानों, दोनों के लिए महत्वपूर्ण बात ये है कि भाषा का संयम बनाए रखा जाए। कड़वी भाषा, आक्रामक तौर तरीकों, अन्य नागरिकों के लिए परेशानी खड़ी करने वाले पैंतरों से से बचा जाए। जो भी लोग संवाद के इच्छुक हैं वो सामने आएं और उनकी आंशकाओं का निर्मूलन किया जाए साथ ही उपद्रवियों के साथ सख्ती और पारदर्शिता से निपटा जाए। दिसंबर माह के पहले सप्ताह में सर्दी बढ़ने के साथ-साथ कथित किसान आंदोलन गर्म हो गया है। दिल्ली को अन्य राज्यों के साथ जोड़ने वाले जोड़ों की जकड़न बढ़ गई है। राजधानी के लिए ..

नतीजे : नफा, नाराजी और निष्कर्ष

कोरोना काल है। ‘वर्क फ्रॉम होम’ का जमाना है। लगता है कि चुनाव परिणामों से जुड़ी सर्वेक्षण एजेंसियों ने भी इसी सुविधा का लाभ उठा लिया था। नतीजा, इन्होंने पूर्वानुमानों में बिहार में महागठबंधन की सरकार बनवा दी। फिर क्या था, ‘जंगलराज के युवराज’ की ताजपोशी की तैयारियां होने लगीं। खबरिया चैनलों के भारी-भरकम विश्लेषणों ने भी उल्टी दिशा पकड़ ली। एनडीए की नीतियों पर सवाल दागे गए। यह तो होना ही था, की तर्ज पर पांडित्य उड़ेला गया। अगले दिन चढ़ते सूरज के साथ युवराज जोड़ी के चेहरे ..

सुलगते सवाल और ‘सेकुलर’ चुप्पियां

पिछले दिनों हमने दो घटनाक्रम देखे। एक यूरोप में जिहाद, उसके खिलाफ फ्रांस का कड़ा रुख। दूसरा घटनाक्रम, एक पत्रकार के तीखे सवालों से परेशान महाराष्ट्र की सरकार का सरकारी आतंकवाद। दोनों घटनाक्रम आपको अलग-अलग लग सकते हैं, लेकिन दोनों में एक समानता है और यह समानता ऐसी है जिसने दुनिया में कुछ किया हो या न किया हो, हमारे यहां के कथित वौद्धिक उदारवादियों की संकीर्णता को एक बार फिर उघाड़कर रख दिया। जिहाद हो या सेकुलर सरकार का राजनीतिक आतंकवाद, इसके खिलाफ इस देश में लिबरल्स, तथाकथित बुद्धिजीवी, वामपंथी खेमे के ..

मीडिया को क्या चाहिए, स्वतंत्रता या स्वछंदता!

कोरोना काल में अलग-अलग चुनौतियों के सामने डटकर खड़ा भारत ‘स्व’ के मंत्र से संकटों का समाधान कर रहा है, किन्तु भारतीय मीडिया में ‘स्व’ की दो बारीक धाराओं, दो परिभाषाओं को अभिव्यक्त करता द्वंद्व मुखर हो रहा है..

अ-क्षर साधना

मामाजी के कृतित्व पर केंद्रित संग्रहणीय अंक फिलहाल सीमित संख्या में उपलब्ध हैं। शीघ्र ही यह आनलाइन भी उपलब्ध होगा। सामयिक विषयों से इतर ऐसे अंक वैचारिक क्षुधा को तृप्त करने के लिए आवश्यक हैं। अक्षर का अर्थ ही है जिसका क्षरण नहीं हो। पत्रकारिता और कुछ नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक क्षेत्रों में क्षरण-पतन के विरुद्ध सतत साधना ही है। लेकिन यह अक्षर साधना तो विषयों के प्रति पूरी संवेदनशीलता और विघ्नों के समक्ष अविचल भाव से डटे रहकर ही हो सकती है। स्व. माणिक चंद्र वाजपेयी (उपाख्य ..

अयोध्या का न्याय

सबसे महत्वपूर्ण बात है कि न्याय समय पर मिलना चाहिए। अगर न्याय देरी से मिले तो उसका कोई मतलब नहीं रह जाता। लोगों को लग रहा था कि देश आजाद हो गया, लेकिन उन्हें न्याय तो मिला ही नहीं। लोगों के मन में इस बात की टीस थी, जो अंदरखाने बढ़ती जा रही थी। इसके लिए किसी एक दल के नेता या विचारधारा को दोषी ठहराने का प्रयास करना गलत है, क्योंकि यह एक सामाजिक मनोभाव था।सवाल क्या है, उससे ज्यादा जरूरी है कि सवाल करने वाला कौन है? संदर्भ है अयोध्या में बाबरी ढांचे को गिराए जाने पर अदालत के फैसले के बाद ..

विश्व को चाहिए कई वैक्सीन

अधूरी कुंठित विचारधाराओं, व्यक्तिगत हितपूर्ति की इच्छाओं पर पलते विषाणुओं का इलाज कोविड जितना ही जरूरी है। विश्व को लोकतंत्र और वैश्विक मानवता की वैक्सीन की जरूरत है। दुनिया में लोकतंत्र कैसे मजबूत हो, दुनिया में समानता के अधिकारों की बात कैसे हो और ये जो छलने वाले लोग हैं, इनकी वैक्सीन अगर नहीं खोजेंगे तो ऐसे वायरस बार-बार आते रहेंगे।एक चलचित्र में बहुत सारे स्थिर-चित्र होते हैं, लेकिन देखने वाले को उसमें शामिल किसी खास चित्र के कितने आयाम हैं, इसका अंदाजा तब तक नहीं होता जब तक उसे फ्रीज नहीं किया ..

पत्ता टूटा, वट वृक्ष सूखा

देश और संस्कृति की धारा अजस्र होती है। दलीय राजनीति या सत्ता आने-जाने के बदलाव और बहावों से अप्रभावित! प्रणब मुखर्जी को यह स्मरण रहा, कांग्रेस भूल गई।स्व. प्रणब मुखर्जी अभूतपूर्व झंझावातों से भरे वर्ष 2020 में अगस्त की आखिरी शाम भारतीय लोकतंत्र के लिए एक आघात और अंधेरा लेकर आई।5:46 बजे अभिजीत मुखर्जी का वह ट्वीट आया जिसके आने की आशंका और न आने की इच्छा हर भारतीय के दिल में थी।प्रणब दा नहीं रहे!पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणब मुखर्जी का यूं जाना राजनीति के भ्रमपूर्ण कोलाहल को दिशा देने वाले स्वर ..

खोदा पहाड़, निकला कुनबा

काले को सफेद बताने के फेर में सबको धोखा देने वाली कांग्रेस नेहरू परिवार से फिर खुद धोखा नहीं खाएगी कहना मुश्किल है, क्योंकि धोखा और असत्य तो ए. ओ. ह्यूम इसकी कुंडली में लिख गए थे। और असत्य का क्या है, असत्य अपमानित भी होता है, पराजित भी।पिता जवाहर लाल नेहरू और बेटों राजीव  व संजय के साथ इंदिरा  कहावत है कि पूत के पांव पालने में दिखने लगते हैं। इस कहावत के आइने से कांग्रेस को देखा जाए तो जो सबसे बड़ा शब्दचित्र उभरता है वह है-धोखा!एक अंग्रेज, ए. ओ. ह्यूम द्वारा अंग्रेजी शासन के ..

सतर्क और शक्तिशाली भारत

कोविड कुहासे के बीच भारत के इस स्वतंत्रता दिवस का सूर्योदय कुछ अलग है। महामारी को चित्त करने के लिए दुनिया सामाजिक दूरी का दाव आजमा रही है और इस बीच भारत ने वैश्विक संबंधों की दशकों पुरानी खाइयों को पाटने वाले लंबे डग भर डाले हैं ..

हार्दिक आनंद

राम का वनवास खत्म हुआ। हार्दिक आनंद! किन्तु ध्यान रखिए, अयोध्या से निकलने वाली शांति-सौहार्द की राह के कई कांटे अभी बाकी हैं। एक संघर्ष समाप्त हुआ किन्तु सरकार और समाज दोनों के लिए आने वाला दौर निश्चित ही परीक्षाओं का दौर है। नहीं भूलना चाहिए कि कुछ तत्व ऐसे भी हैं जिनकी ‘दाल-रोटी’ इस देश में नफरत का चूल्हा सुलगाए रहने से ही चलती है।36 संप्रदायों के 140 संत, देश की समस्त पावन नदियों का निर्मल जल, विभिन्न तीर्थक्षेत्रों की मिट्टी और विविधता के इस सागर में मानवता को मर्यादा की दिशा ..

इतिहास का अनमोल पल

‘जय रामजी की’ या ‘राम-राम’ के सम्बोधन से जहां लोगों की सुबह होती है और जीवन का सूरज डूबने पर भी जिस समाज की यात्रा ‘राम नाम सत्य है’ उच्चारते हुए आगे बढ़ जाती है उस धरती के लोगों के लिए 5 अगस्त, 2020 का सवेरा कुछ अलग है..

उद्घोष राम-भाव का

व्याकरण के अनुसार किसी जाति, द्रव्य, गुण, भाव, व्यक्ति, स्थान और क्रिया आदि के नाम को संज्ञा कहते हैं। अब स्थान-नाम की इस कसौटी पर अयोध्या को रखिए। अयोध्या! यह केवल संज्ञा नहीं है। केवल शब्द नहीं है। अयोध्या इस राष्ट्र का श्वास, इसका प्राण है। जिन्हें इस देश से, इसकी एकता से भय लगता था उन्होंने अ-युध्य अयोध्या को लड़ाई का मैदान, लोगों के मन बांटने वाला मुद्दा बना दिया। जो बाहर से आए उनके लिए इस देश के लोगों को काटना, जनमानस को बांटना यह रणनीतिक खेल या कहिए सत्ता को स्थायित्व देने वाला ..

कांग्रेस-‘वायरस’ मिलीभगत

2017 में डोकलाम तनाव के दौरान चीन के राजदूत के यहां दावत पर पहुंचे थे राहुल गांधी, रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका वाड्रा। यह चित्र उसी मौके का हैचीनी सेना के पीछे हटने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।  भारत-तिब्बत सीमा पर चीन की धींगामुश्ती ना तो एक दिन का मुद्दा है, ना एक दिन में सुलझने वाला है इसलिए ड्रैगन के पीछे हटने को उसकी हार की बजाय डोकलाम-गलवान के बाद उत्तरोत्तर बढ़ती तिलमिलाहट (और आगे फिर मौके की ताक) का आकलन करते हुए देखना चाहिए।किन्तु चीन की हार न होने पर भी इस घटनाक्रम में भारत की तात्कालिक ..

संगठित समाज से हारता रहा है संकटकाल

संगठित समाज, संकटकाल, भारतीय समाज, आपातकाल, वैश्विक संकट, वीर सावरकर, बाबासाहेब आंबेडकर, सुभाष चंद्र बोस, महात्मागांधी, इंदिरा गांधी, आपातकाल, कोरोना संकट ..

विस्तारवाद को जवाब

तिब्बत की आजादी का कत्ल हो गया, भारत की जमीन गई और इसके बाद भी देश को यही समझाया गया कि उस जमीन का क्या जहां ‘एक तिनका भी नहीं उगता!’ सरकार जगी न जगी, धोखे की आहट से मेजर शैतान सिंह भाटी जैसे सपूतों का शौर्य जाग गया ..

हमें बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं!

अराजकता की राजनीति, यानी अथक प्रयासों के बाद मतभिन्नताओं के विविधतापूर्ण बिंदुओं को जोड़कर तैयार की गई एक सर्वमान्य और न्यायोचित व्यवस्था को ताकत के बूते बदलने की प्रवृत्ति। लेकिन यह केवल प्रवृत्ति नहीं, एक गंभीर बीमारी है। कोरोना से भी भयंकर!..

चीनी कहानी, कांग्रेस की जुबानी

 \\राहुल गांधी को चीन के बारे में देशभक्तों को किसी भी बात की नसीहत देते वक्त यह भी ध्यान रखना चाहिए कि लोगों को यह भी याद है कि ‘युवराज’ के पिता के नाना ने कैसे चीन को अक्साई चिन सौंप दिया था! छिटपुट कहानियों को सूक्ष्मदर्शी कांच से दिखाकर चीन के सुर में सुर मिलाती ये आवाजें, देश में उठें या बाहर, उनके झांसे में आने के दिन लद गए।जरूर, देशभक्तों को बिल्कुल याद रखना चाहिए...। जब आप किसी से कहते हैं, ‘‘आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए’’ तो इससे आपका आशय यही होता ..

हिंदू साम्राज्य दिवस पर विशेष : जन-जन के नायक शिवाजी महाराज

हमारे महान ग्रंथों में मनुष्यों के जन्मजात शासक के जो गुण हैं, शिवाजी उन्हीं के अवतार थे। वह भारत के असली पुत्र की तरह थे जो देश की वास्तविक चेतना का प्रतिनिधित्व करते थे। उन्होंने दिखाया था कि भारत का भविष्य अभी या बाद में क्या होने वाला है..

सूचनातंत्र में संक्रमण

अगर इसे वाकई लोकतंत्र के भार को उठाना है तो उसे स्वस्थ तो रहना ही पड़ेगा और अगर संक्रमण से बचाव के उपाय स्व-प्रेरित हों तो इलाज की कष्टकारी प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ेगी।  आज वैश्विक महामारी का संक्रमण तो है ही, सूचनाओं को लेकर भी एक तरह का संक्रमण है। कई बार इसमें शरारत भी दिखती है। इसलिए मीडिया से जुड़े लोगों के लिए जरूरी है कि वे रफ्तार के चक्कर में सावधानी न छोड़ दें। कहते भी हैं कि दुर्घटना से देर भली और जब बात सूचना की हो तो सावधानी कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए लोकतंत्र के चौथे ..

आफत की काट आत्मनिर्भरता

संवाद की शैली क्या होगी, यह इस पर निर्भर करती है कि यह किनके बीच हो रही है। ताली-थाली पीटना, बत्ती बुझाना, दीया और मोमबत्ती जलाना, यह भी संवाद का तरीका था-एक संवेदनशील नेतृत्व वाली सरोकारी सरकार और उस पर अटूट भरोसा करने वाले समाज के बीच। कोरोना से दो-दो हाथ करते हुए आज जो पूरा देश कदमताल कर रहा है, उसका भरोसा उसी संवाद ने दिया था।..

झूठ का बारूद

समूचा देश चायनीज वायरस से लड़ रहा है, मगर देश के भीतर ऐसे भी कुछ तत्व हैं, जो आपदा की इस घड़ी में देश से लड़ रहे हैं। उन्होंने भीतर ही भीतर देश की एकता के विरुद्ध लड़ाई छेड़ रखी है। उनकी मंशा लोगों को आपस में लड़ाने की है। जनता के बीच अविश्वास और घृणा की खाई खोदने में व्यस्त ये लोग या समूह, जिनका दाना-पानी आजादी के बाद से उसी ‘बांटो और राज करो’ की नीति पर चल रहा है..

सेकुलर ‘जमात’ का #काफिरोफोबिया

कथित ‘सेकुलर’ लोगों ने सबसे बड़ा ‘कम्युनल’ काम ये किया कि जमात की गलती देखने की बजाय इस गलती की ओर इशारा करने वालों को ‘इस्लामाफोब’ ठहरा दिया। अब जब उन्होंने यह शब्द गढ़ ही दिया है तो देखना होगा कि यह सोच उन्होंने पाई कहां से। कहीं ये उनका ‘काफिरोफोबिया’ तो नहीं! ..

साम्यवादी चोगे में पूंजीवाद

चीन ने अपने हिस्से का ‘काम’ किया, झेल दुनिया रही है। एक जमात ने पूरे समाज को कलंकित करते हुए अपने हिस्से का ‘काम’ किया और कब्रिस्तान में चौगुनी लाशें पहुंचने लगीं, भुगत भारत रहा है..

कोरोना के खिलाफ यदि दुनिया में कोई कायदे से लड़ रहा है तो वह भारत है

जब आपत्तिकाल आता है तो परिवार, समाज, देश, सबकी परीक्षा हो जाती है। ऐसे में जो ऊपर से कुछ होते हैं और भीतर से कुछ और, छिटक जाते हैं, टूट जाते हैं। जहां संस्कार, मजबूती और समझ होती है, वे और मजबूत हो जाते हैं और फिर तभी विपत्ति से निकलने का रास्ता भी दिखता है। ..

काल के प्रस्तर पर अमिट शिलालेख

चाइनीच वायरस त्रासदी के बाद देशबन्दी ने सम्पर्क और तकनीक से जुड़ी चुनौतियां और बढ़ा दीं। किन्तु हमने निर्णय लिया कि परिस्थितियां जो भी हों वाकणकर जी पर केंद्रित विशेषांक को उनके जन्मशताब्दी वर्ष में ही पूरा कर पाठकों को सौंपना पाञ्चजन्य का कर्तव्य है। ..

भंवर के ‘मध्य’ कांग्रेस

रंग में भंग पड़ेगा, यह निश्चित था। अंतत: होली के दिन मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार का रंग उतर ही गया। ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो गए..

दंगों के इंजीनियर

दिल्ली में दंगे हुए, लेकिन इन्हें केवल दंगे कहना सही नहीं होगा। वास्तव में यह सुविचारित हिंसा थी जिसका खाका कुछ लोग पहले से खींचे बैठे थे। किसी सैन्य मुहिम की तरह भारत विरोधी ताकतें अपना-अपना मोर्चा संभाले थीं ..

भारत की साख बढ़ी, उन्मादी बौखलाए

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भारत दौरा ऐतिहासिक ही नहीं, बल्कि कई प्रकार के भ्रम तोड़ने वाला है। यह दौरा इसलिए भी याद किया जाएगा कि अमेरिका, जिसे लोग एक महाशक्ति के तौर पर, दुनियाभर में चौधराहट कायम करने की इच्छुक शक्ति के तौर पर देखते हैं; इस दौरे में अमेरिका की वह छवि टूटती दिखाई देती है..

सावरकर को क्यों दुश्मन मानते हैं कांग्रेस और वामपंथी ?

दुनिया यह जानती है कि बेगुनाहों की जान लेते हुए भी दिल में जन्नत और बहत्तर हूरों का ख्वाब पालने वाला कोई इस्लामी जिहादी भले हो, सामान्य इंसान नहीं हो सकता!लेकिन मरने वाले की कलाई पर कलावा बंधा हो तो बात उलझ सकती है! मुंबई हमला दुनिया को उलझन में डालने वाली ऐसी ही चाल थी। भगवा और आतंकवाद! हो ही नहीं सकता! ..

सिर्फ आंकड़ा नहीं यह जीत

दिल्ली चुनाव में भारी जीत की बधाई के साथ ही आम आदमी पार्टी (आआपा) को एक बात पर तो अपनी गलती माननी पड़ेगी, यही कि ईवीएम सही थी और अरविंद केजरीवाल गलत!..

आंदोलन की असलियत उजागर

जिन्होंने मजहब के नाम पर मातृभूमि के टुकड़े करने की जिद पाली, भारत और पाकिस्तान में ऐसे लोगों के लिए अलग-अलग राय हैं। लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना या जवाहरलाल नेहरू, सियासत की कमान थामने वाले चमकदार चेहरे सीमा के दोनों ओर दर्द और खून से सनी विरासत छोड़ गए हैं, इसमें कोई दो राय नहीं..

विरोध छोटा, षड्यंत्र बड़ा

हल्ला मचाया गया, भ्रम फैलाया गया, दबाव बनाने की कोशिशें हुईं किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने बात साफ कर दी। नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए) पर तुरत-फुरत कोई रोक नहीं लगेगी !..

सब जग तारण नानक आए

इस राष्ट्र को ‘हिंदुस्थान’ नाम भी गुरु नानक जी ने ही दिया था। बात उस समय की है जब बाबर ने भारत पर आक्रमण किया था। तब नानकदेव जी ने बाबर को आक्रांता के तौर पर इंगित करते हुए इस धरती को ‘हिंदुस्थान’ कहकर संबोधित किया था..

नव-वामपंथ का षड्यंत्र

नव-वामपंथ की दूसरी प्रयोगशाला है जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय। हाल के मामलों से पहले, संसद पर हमले की साजिश रचने के लिए दोषी कश्मीरी आतंकवादी अफजल की फांसी पर यहां विरोध प्रदर्शन किया गया था। अफजल को 9 फरवरी, 2013 को फांसी दी जा चुकी थी। लेकिन जेएनयू में विरोध हुआ 9 फरवरी, 2016 को..

मोहिनी तस्वीरों का बदरंग सच

जिनकी बुद्धि उन्हें गुंडे, बदमाशों वाली भाषा और कृत्यों पर उतार दे क्या हम उन्हें बुद्धिजीवी कह सकते हैं? और अगर हम ऐसे लोगों को बुद्धिजीवी मानते हैं तो मानना होगा कि एक समाज के तौर पर कहीं न कहीं हमें भ्रमित करने का काम किया गया है या कोई खामी रही है। वास्तव में ये बुद्धिजीवी हैं ही नहीं..

कांग्रेस का दृष्टिदोष

पिछले कुछ हफ्तों में कांग्रेस और कामरेड के 'जुमा' कनेक्शन ने देश को जलाया भले हो, पार्टी को यह जिला नहीं सकेगा। देश जाग रहा है, समझ रहा है, ज्यादा तार्किक हो रहा है.. ऐसे में सिर्फ अपने तक सिमटी सोच पर गहरे-गंभीर सवाल उठेंगे ही। तब कांग्रेस को पूर्व में किए कामों को या तो पूरी तरह स्वीकारना होगा या नकारना होगा..। जब तक कांग्रेस के शीर्ष परिवार के नेता नीति से बड़े बने रहेंगे, पार्टी बौनी ही रहेगी..

हम भी देखेंगे!

निर्वाचन और लोकतंत्र के खिलाफ खूनी क्रांति की झूमती साम्यवादी हुंकारों में जिहादी उन्माद की बारीक तान चट से पकड़ लेने वाला यह छात्र वास्तव में खतरनाक है! ..

मानवता का ठौर भारत

पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान में हिन्दू कटेंगे, घटेंगे तो धर्म के नाम पर प्रताड़ि़त ये मनुष्य कहां जाएंगे? नया नागरिक कानून भारत की उसी अवधारणा को मजबूत करने वाला है जो इस भूमि का शाश्वत विचार है ..

उम्मीद की रोशनी

हैरानी की बात है कि पूरी दुनिया को जिन इंसानों का दर्द दिखता है, भारत में सेकुलर चश्मा लगाए विपक्ष को ये इंसान नहीं केवल 'गैर-मुस्लिम' दिखते हैं!..

विस्तारवाद का इलाज जरूरी

अरुणाचल की ओर फिर से बढ़ते चीनी दखल-दबदबे की ओर तापिर गाओ ने ध्यान दिलाया, जो अरुणाचल पूर्व सीट से सांसद हैं। 19 नवंबर को उन्होंने लोकसभा में कहा कि चीन अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सीमा में 50-60 किलोमीटर तक घुसपैठ कर चुका है और यदि उसे नहीं रोका गया तो राज्य में दूसरा डोकलाम बन जाएगा..

राम का नाम लो और आगे बढ़ो!

श्री रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसीलिए कहा- कलियुग केवल नाम अधारा, सुमिर-सुमिर नर उतरहिं पारा।। हम भारतीयों के लिए जिस तरह अयोध्या सिर्फ अयोध्या नहीं है उसी तरह मानस केवल ग्रंथ नहीं, जीवन की भटकन समाप्त करने वाला दिशासूचक है।..

अर्थपूर्ण राजनीति

स्वदेशी शब्द पहली बार में अर्थ क्षेत्र में 'स्व' की पहचान और आग्रह तक सीमित लगता है, किन्तु ऐसा है नहीं। भारत सरीखे देश के लिए स्वदेशी का बोध अपने करोड़ों किसान-मजदूरों, उद्यमियों-उद्योगपतियों की साझा शक्ति को समझना, इसे जगाना और इन सबके हितों के संरक्षण के लिए कमर कसना है।..

नया सूर्योदय

पौने छह सौ भारतीय रियासतों को एकता के सूत्र में पिरोने वाले सरदार पटेल को इससे बड़ी श्रद्धांजलि क्या होगी कि भारत के अभिन्न भाग को इससे अलग-थलग करने वाली बेड़ियां ‘लौह पुरुष’ के जन्मदिवस पर ही एक झटके से टूट गईं..