साहित्यिक दधीचि श्रीकृष्ण "सरल' थे


"अमर शहीदों का चारण'

--सन्तोष व्यास

संसार में कुछ विरले एवं विलक्षण प्रतिभा के धनी यदा-कदा ही उत्पन्न होते हैं, जिन्हें समाज भूल नहीं पाता। ऐसे ही राष्ट्रभक्ति एवं भारतीय शौर्य-वीरता को सच्चे अर्थों में जीवन में उतारने वाले सादगी एवं सरलता की प्रतिमूर्ति थे श्री श्रीकृष्ण सरल। स्वतंत्रता संग्राम की घटनाओं के साक्षी एवं सहयोगी रहे श्री श्रीकृष्ण सरल की पहचान इतिहासकार एवं साहित्यकार के रूप में रही है। उन्होंने 16 महाकाव्यों की रचना कर एक अनूठा कीर्तिमान बनाया। क्रांतिकारियों की कथाओं को जन-जन तक पहुंचाने की धुन में श्री सरल ने अपनी पत्नी श्रीमती नर्मदा सरल के आभूषण भी अपने ग्रंथों की भेंट चढ़ा दिए थे। राष्ट्रभक्ति के लिए जानबूझ कर निर्धनता एवं परेशानियों को न्योता दिया। वे कहते थे,

"मैं शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूं।

जो कर्ज राष्ट्र का खाया है बस उसे चुकाया करता हूं।।'

सारा जीवन तंगी और संघर्षों में गुजारते हुए उन्होंने सारी सम्पत्ति अपने महान लक्ष्य को समर्पित कर दी। उनके जीवन का ध्येय था "मांग कर कोई वस्तु नहीं लेना'। बाल्यकाल में परीक्षा देते समय उनके पेन की निब टूट गयी, उन्होंने परीक्षा माचिस की तीली से लिखकर दी, पर पेन नहीं मांगा। बिलासपुर में दो दिन निराहार रहे। पैसा नहीं था, खाने का सामान कहां से खरीदते, क्योंकि पुस्तक नहीं बिकी। स्कूल बंद हो गया, छुट्टी पड़ गई। रोटी नसीब नहीं हुई। जब स्कूल खुले तो कविता सुनाकर, शहीदों के संस्मरण सुनाकर पुस्तकें बेचीं। बच्चों को संस्कार देना वे उचित समझते थे, इसीलिए स्कूल-स्कूल जाकर पुस्तकें बेचकर शहीदों की स्मृतियां अमर करते रहे।

शौर्य, वीरता के अमर गायक श्री श्रीकृष्ण सरल का निधन गत 2 सितम्बर को 81 वर्ष की अवस्था में उज्जैन में हो गया। अमर शहीदों के चारण की भूमिका का बखूबी निर्वाह करते हुए मृत्यु से एक सप्ताह पूर्व उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस के जीवन पर आधारित उपन्यास "अक्षर-अक्षर इतिहास' पूर्ण किया। श्री सरल ने देश के नौजवानों में जोश, उत्साह एवं देशभक्ति का भाव फूंकने के जितने व्यक्तिगत प्रयास किए, वह कार्य कई संस्थाएं मिलकर भी नहीं कर सकीं।

श्री सरल में क्रांतिकारियों के प्रति अनुराग बचपन से ही था। जब "राजगुरु' को अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर ले जाया जा रहा था, तब सरल जी 12 वर्ष के थे। भीड़ ने "वन्देमातरम्' के नारे लगाए तो रेल में से राजगुरु ने भी नारे लगाए। यह देखकर अंग्रेज सिपाहियों ने राजगुरु को धकेल दिया इस पर बालक सरल ने अंग्रेज सिपाही के सर पर एक पत्थर दे मारा। फिर क्या था बालक को बुरी तरह पीटा गया। सब लोग उन्हें मृत समझकर छोड़कर चले गए, क्योंकि ट्रेन चल दी थी। जीवनपर्यन्त उस पिटाई के घाव उनके शरीर पर बने रहे, जिन्हें वे गर्व से अपने लिए "पदक' मानते थे।

श्री सरल ने राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन के कहने पर युवाओं को संदेश देने के उद्देश्य से क्रांतिकारियों के जीवन पर महाकाव्य का लेखन शुरू किया। भगतसिंह पर जब महाकाव्य लिखा तो भगतसिंह की माता विद्यावती देवी ने उन्हें चन्द्रशेखर पर भी महाकाव्य लिखने को कहा। इन काव्यों के सृजन में प्रामाणिकता लाने के उद्देश्य से उन्होंने पूरा जीवन यायावरी में बिताया। सुभाष चन्द्र बोस पर महाकाव्य लिखने से पूर्व उन्होंने 10 देशों की यात्रा कर दुर्लभ संस्मरण एवं छायाचित्र एकत्रित किए, जो भारतीय इतिहास के अनूठे दस्तावेज हैं। उनके बच्चों ने भी हाथ- ठेलों पर रखकर वह क्रांतिकारी साहित्य बेचा, किन्तु गर्म खून पर लिखे काव्य ने बच्चों के गर्म कपड़े तक बिकवा दिए।

श्री सरल के पूर्वज स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे, उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते हुए बलिदान दिया था। इसी वंश में 1 जनवरी, 1919 को गुना जिले (मध्य प्रदेश) के अशोक नगर में पं. भगवती प्रसाद बिरथरे एवं यमुना देवी के यहां इस यशस्वी बालक का जन्म हुआ था।

श्री सरल ने गुना के साहित्यिक वातावरण से दिशा प्राप्त की। काव्य सृजन प्रतिभा तो उनमें 10 वर्ष की आयु से दिखने लगी थी। विभिन्न क्रांतिकारियों के सान्निध्य का लाभ भी उन्हें मिलता रहा। उनके जीवन में ऐसे अवसर भी आए जब मौत खुद छाता तानकर उनकी सुरक्षा करती रही। वे भालुओं के झुण्ड में घिर गए, शेर के पंजे से घायल हुए, चीन में गुण्डों ने घेर लिया। नौ बार हृदयाघात हुआ पर हर आघात के बाद वे एक महाकाव्य पूरा करते रहे। दिन में नगर-नगर जाकर भारी पुस्तकें उठाकर बेचते, फिर रात को लिखते।

श्री सरल अकेले ऐसे कवि हैं, जिन्हें अपनी क्रांतिकारी कविताओं के कारण दो बार जेल जाना पड़ा। 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन में श्री सरल ने खुलकर भाग लिया। उनके साथी शान से स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन और सम्मान प्राप्त कर रहे हैं, किन्तु श्री सरल ने पेंशन नहीं ली। रोचक बात यह है कि उनके द्वारा अनुशंसित व्यक्ति तो पेंशन पा गए, पर श्री सरल को शासन ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नहीं माना। यहां तक कि उनकी अंत्येष्टि में शासन/प्रशासन का कोई भी प्रतिनिधि तक नहीं पहुंचा। उनके आदर्श ही उनके सिद्धांत रहे। उनका कहना था कि मेरे आराध्य क्रांतिकारी जब जंगलों में भूखे-प्यासे भटके तो मैं क्यों अभावों में नहीं जी सकता? उन्होंने क्रांतिकारी जीवन का व्रत ले लिया, 40 वर्ष तक घी-दूध नहीं खाया। डबलरोटी पानी में डुबो कर खा लेते थे। मजदूरों के होटलों में सस्ते में भोजन करते। बोरे पर लिखकर गले में टांग लेते "मैं शहीदों का चारण- उनकी कहानियों से इस पीढ़ी में उस पीढ़ी के भाव जगाना चाहता हूं।'

श्री सरल द्वारा रचित क्रांतिकारी साहित्य की अनूठी बेजोड़ कृतियां एक देशभक्त की राष्ट्र अर्चना कही जा सकती हैं। "जीवित शहीद' की उपाधि से सम्मानित श्री सरल को सच्ची श्रद्धाञ्जलि यही होगी कि ऐसे प्रयास किए जाएं ताकि उनका कार्य जन-जन तक पहुंचे।

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