पुस्तक-चर्चा


दया प्रकाश सिन्हा का वृत्त-नाटक "इतिहास'

"चाकू को चाकू' और "डाकू को डाकू' कहता एक साहसिक नाटक

अनेक विद्वानों ने भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन की जोरदार वकालत की है। यह जरूरी भी है, क्योंकि दुर्भाग्य से हमारे इतिहास को तथाकथित इतिहासकारों ने बहुत ही भद्दे तरीके से तोड़-मरोड़कर पेश किया है। विशेषकर माक्र्सवादी इतिहासकारों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत जानबूझकर "सत्य' की अवहेलना की है। हमारा इतिहास "उपनिवेशवाद' का भी लम्बे अरसे तक शिकार रहा। अपनी विचारधारा को हम पर जैसे-तैसे थोपने की कला में माहिर कुछ दोगले इतिहासकारों ने पूर्ण सत्य की बजाय अर्धसत्य को सामने लाने का घिनौना कृत्य किया। ऐसे ही इतिहासकार "आर्य बाहर से आए' जैसे महाझूठ का सैकड़ों सालों से प्रचार करते आ रहे हैं। लेकिन अभी कुछ महीने पहले जाने-माने माक्र्सवादी साहित्यकार डा. रामविलास शर्मा ने दबी जुबान में ही सही, स्वीकारा है कि आर्य भारत के ही मूल निवासी थे। वे बाहर से नहीं आए, क्योंकि सच तो सौ पर्दे फाड़कर भी कहेगा कि मैं सच हूं। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों जीत सत्य की ही होगी। वास्तव में इतिहास को तो दर्पण जैसा ही मुखर होना चाहिए। "जस का तस' कहना ही इतिहास लेखन की पहली और अंतिम शर्त होनी चाहिए।

पुस्तक-परिचय

पुस्तक का नाम : इतिहास (वृत्त- नाटक)

लेखक : दया प्रकाश सिन्हा

प्रकाशक : स्नेह भारती

द्वारा प्राचार्य निवास, इन्द्रप्रस्थ कालेज, शामनाथ मार्ग, दिल्ली-54

पृष्ठ : 104, मूल्य : 125 रुपए

दया प्रकाश सिन्हा का वृत्त-नाटक "इतिहास' एक प्रकार का इतिहास-पुनर्लेखन ही है। नाटक के क्षेत्र में यह एक साहसिक कदम साबित होगा। इस नाटक में 1857 से 1947 के बीच के ऐतिहासिक तथ्यों को बिना लाग-लपेट के ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है। "चाकू को चाकू' और "डाकू को डाकू' कहने का साहस दया प्रकाश सिन्हा जैसे नाट्यकार ही कर सकते हैं। इस नाटक के जरिए उन्होंने अनेक नए-पुराने लेखकों को भी नई राह दिखाई है।

लेखक ने ऐतिहासिक नायकों के चेहरों से मुखौटे उतार कर उनके असली चेहरों से बखूबी परिचय करवाया है। लेखक का मानना है-"यह मूर्ति पूजकों का देश है और यहां जिससे भी लोग प्रभावित होते हैं, उसे ऊंचे पद पर बैठाकर पूजने लगते हैं। पूजा के साथ-साथ रहस्यमय मिथक का प्रभामंडल भी अपने पूज्य के चारों ओर गढ़ लेते हैं। जो उनके आराध्य के तिलिस्म को तोड़कर सच देखने-दिखाने का साहस करता है, उसे दु:साहसी कहकर धिक्कारा जाता है। कुछ ऐसा ही दु:साहस मैंने भी किया है।'

नाटक में नेहरू और गांधी जैसे ऐतिहासिक नायकों के तिलिस्म को तोड़ने का जोखिम लेखक ने उठाया है। प्रामाणिक पुस्तकों से अनेक उद्धरण भी परिशिष्ट में प्रस्तुत किए हैं। नाटक में जिन अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों को उजागर किया गया है, वे हैं-

थ् द्विराष्ट्र सिद्धान्त, जिसके आधार पर जिन्ना ने देश का विभाजन करवाया, के मूल प्रतिपादक सर सैयद अहमद खां थे।

थ् लंदन में अंग्रेज अधिकारी कर्जन वाइली का वध करने वाले मदनलाल ढींगरा को महात्मा गांधी ने "हत्यारा' कहा था।

थ् लेडी माउंटबेटन (एडविना) और नेहरू में परस्पर प्रेम-सम्बन्ध थे। नेहरू ने पूर्ण-स्वराज के स्थान पर 15 अगस्त, 1947 को लेडी माउंटबेटन के प्रभाव में "डोमीनियन स्टेट्स' तथा देश का विभाजन स्वीकार किया।

थ् जिन महात्मा गांधी ने देश के विभाजन का विरोध किया था, उन्होंने ही जवाहरलाल नेहरू के मोह में कांग्रेसजनों से विभाजन स्वीकार करने की अपील की।

एडविना और नेहरू के प्रेमालाप को उजागर करते नाटक के कुछ संवाद-

एडविना-माई लव। तुम जानते हो मैं तुम्हारी वैल विशर हूं। मैं लण्डन की बात जानती हूं। मैं तुम्हें प्राइम मिनिस्टर देखना चाहती हूं। जल्दी से जल्दी। क्या तुम मेरी यह छोटी-सी विश फुलफिल करोगे?

नेहरू-मैं तुम्हारी हर विश फुलफिल करना चाहता हूं।

एडविना-तो बस ठीक है। तुम पार्टीशन और डोमीनियन स्टेट्स को इन पिं्रसीपल एक्सेप्ट कर लो। गांधीजी और बाकी कांग्रेस लीडर को मनाना मेरी और डिकी की जिम्मेदारी है। (हाथ बढ़ाते हुए) दिस इज ए डील।

नेहरू-(हाथ मिलाते हुए) ओ के। जस्ट एज यू विश।

नाटक पूरी तरह से कसा हुआ है। संवाद चुस्त हैं। भाषा सहज और पात्रों के अनुकूल है। उक्त नाटक की तीन प्रभावी प्रस्तुतियां दिल्ली में हो चुकी हैं। "अपने-अपने दांव', "मेरे भाई मेरे दोस्त', "कथा एक कंस की' जैसे बहुचर्चित नाटकों के रचयिता दया प्रकाश सिन्हा की नवीनतम कृति "इतिहास' नाटकों के इतिहास में वस्तुत: मील का पत्थर साबित होगी।

द नरेश शांडिल्य

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