41 वर्ष पूर्व संविधान सभा के सदस्य श्री मीनू मसानी ने पूछा था-


जनतंत्र के लिए जरूरी दलीय प्रणाली है कहां?

"भारतीय संविधान कसौटी पर' श्रृंखला के अन्तर्गत भूतपूर्व संसद सदस्य श्री मीनू आर. मसानी का यह लेख पाञ्चजन्य के 6 जुलाई, 1959 के अंक में प्रकाशित हुआ था। इस अंक की मुख्य कथावस्तु से मेल खाता हुआ यह लेख यहां पुन: प्रकाशित किया जा रहा है। सं.

हमारे देश में जनतंत्र के स्वस्थ विकास के मार्ग में कौन-कौन सी बाधाएं हैं? इस प्रश्न के उत्तर में सबसे पहली बाधा है हमारे मतदाताओं की प्रकृति। इस तथ्य को भुलाया नहीं जा सकता कि हमारे मतदाताओं का बहुमत अशिक्षित है और उसका परिणाम हमारी सम्पूर्ण राजनीति एवं व्यवस्था पर पड़े बिना नहीं रह सकता। इसका परिणाम राजनीतिज्ञों, उनके व्यवहार, उनके कार्यों और कार्य करने की विधि के स्तर पर बहुत ही स्पष्ट है। मैं समझता हूं कि इसके ऊपर हमने गम्भीर विचार नहीं किया। संविधान सभा के सदस्य के नाते, मुझे स्मरण है, मैंने कभी दो मिनट भी यह सोचने में नहीं लगाए कि वयस्क मताधिकार होना चाहिए अथवा नहीं। प्रकृति के नियमों के अनुसार हम यह पहले से मानकर चले कि 21 वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक व्यक्ति को मत देने का अधिकार होना ही चाहिए। 1949 में मैं ब्राजील गया, और वहां यह देखा कि उन्होंने 1954 में निर्मित अपने देश के नए संविधान में यह व्यवस्था कर रखी है कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में तभी चढ़ाया जाएगा जब वह "साक्षरता परीक्षा' में सफल उतरेगा। तब ही मुझे लगा कि यह कितनी अच्छी कल्पना है, जिसमें हम चूक गए और जिसे हम सरलता से अपने देश के लिए अंगीकार कर सकते थे।

राष्ट्रीय एकता का अभाव

दूसरी प्रमुख बाधा, जिसका हमें सामना करना पड़ रहा है, वह है पर्याप्त मात्रा में राष्ट्रीयता का अनुभवहीन होना। जब अंग्रेज देश छोड़कर गए, हमें लगा कि हम एक राष्ट्र बसा रहे हैं। परन्तु गत 10 वर्षों में कुछ लोगों को यह भी लगने लगा होगा कि हमारा राष्ट्र टूट रहा है। विघटनकारी प्रवृत्तियां, चाहे भाषायिक हों, चाहे साम्प्रदायिक, चाहे क्षेत्रीय हों, चाहे जातिगत, जिस ढंग से उभर रही हैं, वह एक चिन्ताजनक लक्षण है और कई बार यह प्रश्न खड़ा कर देता है कि क्या यह देश उस प्रकार एकत्र रह सकेगा, जैसा हम उसे रखना चाहते हैं। विदेशी शासन के विरोध में उत्पन्न एकता के समान बंधन हटते ही हम यह अनुभव करने लगे हैं कि हमारी राष्ट्रीय एकता और सुदृढ़ता उतने दृढ़ आधारों पर नहीं खड़ी है, जितनी हम कल्पना करते थे।

अनुशासनहीनता

ये बाधाएं आती हैं, जो इस तथ्य का परिणाम हैं कि हमारे साथ दीर्घकालीन जनतांत्रिक परम्पराएं नहीं जुड़ी हैं-जनतांत्रिक अधिकारों के पालन की, नागरिक स्वतंत्रताओं के उपभोग की, समाज के विरुद्ध व्यक्ति के अधिकारों का आग्रह करने एवं उनके प्रति व्यक्ति के कर्तव्यों का पालन करने की जनतांत्रिक परम्पराएं हमारे लिए नई हैं। इसका प्रकटीकरण दो विरोधी रूपों में होता है। एक ओर तो हमारे यहां वीर पूजा की, सत्ता को पितृवत मानने की, किसी के अधिकार को अत्यन्त सरलतापूर्वक मान लेने की परम्परा चल पड़ी है। हम नेताओं की कैसी भी बात को बिना किसी आलोचना और बहस के मान लेने के अभ्यस्त हो गए हैं। दूसरी ओर हमारे सार्वजनिक जीवन में अनुशासनहीनता इतनी अधिक मात्रा में व्याप्त हो गई है कि उसे देखकर भय लगता है। विद्यार्थियों की अनुशासनहीनता से आप सब विदित हैं ही। यह राष्ट्रजीवन की एक असाध्य, बीमारी बन गई है। ट्रेड यूनियनों में भी अनुशासनहीनता की मात्रा उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। अवैधानिक हड़तालें हमारे देश में आम बात हो गई हैं और उनका नेतृत्व करने वालों का कुछ भी नहीं बिगड़ता। अनुशासनहीनता का यह तरीका हमारे राष्ट्रजीवन के प्रत्येक विभाग में प्रवेश कर गया है। लोकसभा में खड़े होकर सदस्य उनके पक्ष में शोर मचाते हैं, विधानसभाओं में अध्यक्ष का अपमान कर जनतंत्र को कलंकित करते हैं किन्तु निदान में एक भी शब्द नहीं कहते। अध्यक्ष के वचनों का पालन संसदीय जनतंत्र का प्रथम नियम है। कोई जनतंत्र सफल नहीं हो सकता यदि अध्यक्षीय कुर्सी पर बैठाए गए व्यक्ति के शब्दों की मर्यादा एवं सम्मान की रक्षा नहीं की जाती। कई बार अध्यक्ष ऐसी भी व्यवस्था दे सकता है जो गलत हो किन्तु उसका खुल्लम-खुल्ला विरोध करना जनतांत्रिक परम्पराओं के विकास में सहायक नहीं हो सकता।

असंतुलित दल-प्रणाली

जैसा कि हम जानते हैं, संसदीय जनतंत्र में दलीय-प्रणाली का बहुत महत्व होता है। दलीय-प्रणाली के सही ढंग से कार्य करने पर ही उसकी सफलता निर्भर होती है। हमारे देश में भी अनेक राजनीतिक दल हैं। परन्तु क्या हम कह सकते हैं कि हमारे राजनीतिक जनतंत्र को जैसी आवश्यकता है वैसी वास्तविक दलीय-प्रणाली हमारे यहां है? हमारी दलीय-प्रणाली का संतुलन दो प्रकार से गड़बड़ाता है। पहला है, एक दल और शेष दलों के अनुपात में बहुत बड़ा अन्तर होना। एक तो ऐतिहासिक कारणवश कि वह राजनीतिक दल स्वातंत्र्य-संग्राम में अग्रणी रहा है। दूसरे इसलिए कि उसका नेतृत्व एक बहुत लोकप्रिय व्यक्ति कर रहा है। वह दल अन्य दलों की सम्मिलित शक्ति के अनुपात में कहीं अधिक शक्तिशाली है। परिणामस्वरूप, अधिकांश राज्यों और केन्द्र में हमारे यहां असन्तुलित संसदीय प्रणाली कार्यशील है। यदि विरोधी पक्ष बहुत दुर्बल होता है तो न केवल उसे हानि होती है बल्कि शासन की भी हानि होती है। विरोधी पक्ष पूर्णत: अनुत्तरदायी हो जाता है। मान लीजिए, यदि मुझे यह पता चल जाए कि मैं आगामी 15 वर्षों तक गद्दी पर नहीं बैठ सकूंगा और मुझे जनता को दिए गए वादों को पूर्ण करने का अवसर नहीं आएगा तो मैं चाहे जितनी लम्बी-चौड़ी बातें बनाऊं, क्योंकि मुझे उनके कार्यान्वित करने का कोई भार नहीं उठाना है, और यदि मैं जान जाऊं कि मैं कभी गद्दी पर बैठ ही नहीं सकूंगा और वर्तमान सरकार को बदलना संभव नहीं है तो मैं निराश और कटु हो जाऊंगा। मैं अत्यन्त अनुत्तरदायी व्यवहार करूंगा, गाली-गलौज पर उतर आऊंगा और लोकप्रिय बनने के लिए ऐसे त्वरित उपायों का अवलम्बन करूंगा, जिनसे जनतंत्र की जड़ें पुष्ट नहीं होतीं।

वैचारिक असंतुलन

हमारी दलीय प्रणाली के असन्तुलन का दूसरा कारण वैचारिक दृष्टि से है। इस समय लोकसभा में तीन प्रमुख राजनीतिक दल हैं, जिनमें से प्रत्येक समाजवाद को मानने का दावा करता है। ऐसा कोई भी दल नहीं है जो जागरूक व्यक्ति पर आधारित हो। अत: एक ऐसे जनतांत्रिक दल की नितान्त आवश्यकता है जो कांग्रेस का वास्तविक विकल्प हो। इस वैकल्पिक जनतंत्रवादी दल के अभाव के परिणामों में एक यह है कि सरकार के विरुद्ध उत्पन्न होने वाला असन्तोष गलत मार्गों से प्रकट होता है। प्रत्येक सरकार के बदलते समय कुछ न कुछ असन्तोष पैदा होता ही है। सब स्वतंत्र देशों में उस समय लोग यह कहते सुने जाते हैं, "कुछ कानून ऐसे होते ही हैं जिनसे जनता के कुछ वर्ग प्रभावित होते हैं और जनमत सरकार के विरुद्ध हो जाता है। हमारे देश में सत्तारूढ़ जनतांत्रिक समाजवादी दल का सही विकल्प न होने के कारण इस सब असन्तोष का लाभ कम्युनिस्ट पार्टी उठाती है।

कम्युनिस्ट पार्टी राष्ट्रीय नहीं

यदि कम्युनिस्ट पार्टी एक सही पार्टी होती तो मुझे इसमें भी कोई आपत्ति नहीं होती, परन्तु भारत की कम्युनिस्ट पार्टी भी अन्य देशों के समान सच्ची राजनीतिक पार्टी नहीं है। वह एक विदेशी सरकार का शस्त्र है। वह एक विदेशी सरकार का पंचमांगी दस्ता है। यदि वह सरकार धरती पर से उठ जाए तो कम्युनिस्ट पार्टी का अस्तित्व एक दिन भी शेष नहीं रहेगा। रूस में कम्युनिस्ट तानाशाही की समाप्ति के 12 माह के अन्दर ही यह अपना नाम बदल देगी। किन्तु जब तक रूस में कम्युनिस्ट तानाशाही है, संसार के प्रत्येक देश में, जहां उनके लिए सम्भव है, कम्युनिस्ट पार्टी का अस्तित्व अवश्य रहेगा। मुझे भली प्रकार स्मरण है कि 1935 में जब मैं कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के मंत्री के नाते मास्को गया था, मुझसे मिलने के लिए कोमिन्टर्न के कुछ सदस्य (पामदत्त, ब्रोडले और पालिट) आए। उन्होंने संयुक्त मोर्चा, जिसे बाद में मेरे मित्र जयप्रकाश जी ने बनवाया और जिसके लिए वे अब बहुत पछताते हैं, बनाने के लिए वार्ता प्रारम्भ की थी। जब मैंने कामिन्टर्न के इन सदस्यों से कहा कि यदि आप समझते हैं कि कांग्रेस समाजवादी पार्टी अच्छी पार्टी है और उनका अपना दल बहुत खराब है, तो क्यों नहीं आप भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को भंग कर हमें अपना प्रतिनिधि मान लेते हैं, यद्यपि हम आपसे सम्बद्ध नहीं हैं, तब उनमें से एक ने कहा था, "ओह, नहीं। कामरेड मसानी, भारत में हमारा अपना दल तो रहना ही चाहिए।' अब, जब तक भारत में मास्को की अपनी पार्टी है, कम्युनिस्ट पार्टी को भारत का राजनीतिक दल नहीं माना जा सकता। दूसरी बात यह कि अमृतसर थीसिस के बावजूद भी उसका जनतंत्र में विश्वास नहीं है। कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों का निकट से अध्ययन करने के कारण वह एकदलीय तानाशाही की स्थापना करके रहेगी। जब कभी उसे सत्ता प्राप्त होगी, यदि वह कभी सर्वोच्च सत्ता को प्राप्त कर सकी तो, अन्य देशों के समान वह भारत में भी एकदलीय तानाशाही की स्थापना करेगी, ऊपर से चाहे वह कैसा भी दिखावा क्यों न करे। इस प्रकार का दल जो जड़-मूल से अधिनायकवादी है, भारत में जनतंत्र के सामने सबसे बड़ा खतरा है। इस कारण कि उसे सहन किया जा रहा है, उसे प्रतिष्ठा मिल रही है, उसे सत्ता भी प्राप्त हो रही है और दूसरी सशक्त जनतांत्रिक पार्टी विकल्प के रूप में न होने के कारण भी जन असंतोष का कम्युनिस्ट पार्टी के माध्यम से प्रकट होना स्वाभाविक है। यह जनतंत्र को दूसरा बड़ा खतरा है। कालांतर में यह हमें उसी दुर्भाग्य का शिकार बना सकता है, जिसका शिकार चीन को बनना पड़ा। द

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