पुस्तक चर्चा: वीर कुंवर सिंह: 1857 का महान योद्धा


स्वतंत्रता संग्राम का वयोवृद्ध योद्धा

द ब.ना.जोग

कुंवर सिंह-1857 के स्वतंत्रता संग्राम का एक बेजोड़ व्यक्तित्व। शाहाबाद (बिहार) और आस-पास के चार-पांच जिले उनका कार्यक्षेत्र। कुंवर सिंह की कुल परम्परा बड़ी थी। वह राजपूत थे, उनके पूर्वज बिहार में जा बसे। जगदीशपुर में उनकी जागीर थी। तत्कालीन जागीरदारों की भांति कुंवर सिंह भी कर्ज में डूबे हुए थे। लेकिन कुंवर सिंह साहसी थे, गांववासियों में लोकप्रिय थे, सरकार में भी उनकी अच्छी पैठ थी। कई ब्रिटिश अधिकारी उनके मित्र थे। लेकिन इस दोस्ती के कारण वह अंग्रेजनिष्ठ नहीं बने। स्वतंत्रता संग्राम मई, 1857 में शुरू हुआ। उसके दो माह पश्चात् बिहार में भी उसकी आंच पहुंच गई। अंग्रेज सेना के देशी सिपाहियों ने उसमें हिस्सा लिया। कारतूसों में गाय और सूअर की चरबी लगाने का कारण तो तात्कालिक था किन्तु मूल कारण था अंग्रेजों की गुलामी। बिहार में बगावत का नेतृत्व कुंवर सिंह ने किया। जो 80 वर्ष के थे। कुंवर सिंह रणांगन में उतरे, उन्होंने अपनी तलवार की चमक दिखाई।

पुस्तक परिचय

पुस्तक का नाम : वीर कुंवर सिंह:

1857 का महान योद्धा

लेखक : ले.ज. एस. के. सिन्हा

प्रकाशक : कोणार्क प्रकाशन

ए-149, मेन विकास मार्ग,

नयी दिल्ली- 110092

पृष्ठ संख्या : 192

मूल्य : रु. 250

कलकत्ता अंग्रेजों की राजधानी थी। पड़ोसी प्रांत होने के कारण अंग्रेजों की सेना तुरन्त बिहार पहुंच जाती थी। बिहार की राजधानी-पटना की आबादी करीब डेढ़ लाख थी, जिसमें 38 हजार मुसलमान थे। पटना नगर पर मुसलमानों का वर्चस्व था। कुंवर सिंह के नेतृत्व में वे भी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। कुंवर सिंह ने पहली विजय आरा में प्राप्त की। आरा नगर स्वतंत्र हो गया। सरकारी खजाना स्वतंत्रता सेनानियों के हाथ आया। आरा कारागृह के कैदियों को रिहा कर लिया गया।

इस्लाम के एक कट्टर पंथ-वहाबी का मुख्यालय पटना में था। वहाबी चाहते थे कि फिर से मुसलमानों का राज्य स्थापित हो। उसके लिए स्वतंत्रता संग्राम को उन्होंने एक अच्छा अवसर माना। आरा के युद्ध में विजय मिलने पर भी अंग्रेजों की अनुशासित फौज के सामने देसी सिपाहियों और बगावत में सम्मिलित जनता का टिक पाना कठिन हो गया। कुंवर सिंह शाहाबाद, आरा से प्रस्थान कर कालपी, कानपुर, लखनऊ पहुंचे, जो स्वतंत्रता संग्राम की मुख्य रणभूमि थी।

"वीर कुंवर सिंह: 1857 का महान योद्धा' पुस्तक में लेखक लेफ्टि. जनरल सिन्हा ने 8-9 माह के इसी कालखंड का ऐसा मार्मिक वर्णन किया है कि यह पूरा परिदृश्य पाठक की आंखों के सामने अंकित हो जाता है। 400-500 मील तक फैले इस प्रदेश के नक्शे भी पुस्तक में समाविष्ट हैं। कुंवर सिंह ने गंगा-सोन, दोआब में स्थानीय जनता के सहयोग से अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया और उस समय मंझे हुए ब्रिटिश सेनापतियों को पराजित किया जब दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झांसी में आक्रमण और प्रतिकार खत्म हो चुका था। कुंवर सिंह की वीरता की गाथा का बखान आज भी बिहार के गांव-गांव में होता है। भले ही कुछ अवधि के लिए हो किन्तु, शाहाबाद, छपरा, मुजफ्फरपुर, चम्पारण आदि जिलों में कम्पनी सरकार का शासन समाप्त करने में कुंवर सिंह सफल हुए थे। उन्होंने जगदीशपुर पर लहराने वाला अंग्रेजी झंडा उतारकर तिरंगा फहराया था। वह दिन अर्थात् 23 अप्रैल, 1858-आज भी बिहार में विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। विजय प्राप्त करने के तीन दिन बाद ही, कुंवर सिंह ने जगदीशपुर में अपनी जीवन यात्रा समाप्त कर दी थी। अस्सी वर्षीय इस वृद्ध-युवा नेता के बारे में स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने लिखा- "1857 के स्वतंत्रता संग्राम में ऐसा एक भी क्रांतिकारी नहीं था, जो युद्ध कौशल में कुंवर सिंह की बराबरी कर सके। उन्होंने गोरिल्ला युद्ध की तकनीक जानकर उसे पूरी तरह आत्मसात किया था। शिवाजी की रणनीति का अनुकरण करने वाले कुशल सेनानी के रूप में कुंवर सिंह का नाम अजर-अमर रहेगा।' कुंवर सिंह की महत्ता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है?

1857 के स्वतंत्रता संग्राम ने पूरे देश को झकझोर दिया था। गत डेढ़ सौ वर्षों से यह हमेशा ही विवाद का मुद्दा बना रहा है कि मुसलमान इस युद्ध में देश की स्वतंत्रता के लिए शामिल हुए या अपने वहाबी पंथ के वर्चस्व के लिए। लेखक ने मुसलमानों के सहभाग की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। लेकिन यह भी जरूरी था कि वे इसका भी उल्लेख करते कि सर सैयद अहमद ने स्वतंत्रता संग्राम के समय अंग्रेजों की कितनी सहायता की, इन्हीं सर सैयद अहमद ने इस शताब्दी के अंत तक मुसलमानों का अलगाव बनाए और बढ़ाए रखा और अलीगढ़ मुस्लिम वि·श्वविद्यालय की नींव रखकर पाकिस्तान के गठन की तैयारी की।

कुंवर सिंह के जीवन पर तथा स्वतंत्रता संग्राम में उनके कार्यों पर यह एक उल्लेखनीय पुस्तक है।

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