नेपाल में राजशाही और शाहवंश का इतिहास


नेपाल में शाह वंश की प्रतिष्ठा गोरखा नामक स्थान पर हुई थी, जो काठमांडू से लगभग 85 कि.मी. दूर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। वहां के पहले राजा को द्रव्य शाह के नाम से जाना जाता है। उसी वंश के एक राजा थे रामशाह। रामशाह बहुत प्रतापी व प्रसिद्ध राजा थे, जिनके बारे में कहा जाता था कि यदि आपको न्याय चाहिए तो गोरखा के रामशाह के पास जाइए। काठमाण्डू में एक सड़क थी- पुतली सड़क, इसको अब रामशाह पथ के नाम से जाना जाता है। यह उन्हीं के नाम पर है। रामशाह का काल 16वीं शताब्दी के मध्य में माना जाता है। तब नेपाल में छोटी-छोटी रियासतें थीं। शाहवंश में ही पृथ्वी नारायण शाह का जन्म लगभग 1722-23ई. में हुआ था। जब वे राजा बने तब उनकी इच्छा थी कि वे नेपाल पर भी राज करें। यहां नेपाल का अर्थ तत्कालीन काठमाण्डू रियासत है। कई शताब्दियों तक नेपाल का अर्थ काठमाण्डू घाटी और आसपास का क्षेत्र ही समझा जाता रहा है। काठमाण्डू में तीन रियासतें थीं, जिसमें से कांतिपुर, जो वर्तमान काठमाण्डू है, वहां के राजा थे जय प्रकाश मल्ल। मल्ल राजा क्षत्रिय नहीं थे, नेवाड़ थे, यही नेवाड़ समुदाय काठमाण्डू का मूल समाज है। काठमाण्डू घाटी की अन्य दो रियासतों-ललितपुर और भक्तपुर-में दो अन्य मल्ल राजा थे। गोरखा राजा पृथ्वी नारायण शाह ने काठमाण्डू को जीतने के लिए कई बार चढ़ाई की, उन्हें कई वर्ष लग गए, पर उन्हें बार-बार खाली हाथ लौटना पड़ा। लगभग 20-21 बार पृथ्वी नारायण शाह की काठमाण्डू पर चढ़ाई निष्फल रही। किन्तु 1769 के सितम्बर मास की 13 अथवा 14 तारीख को पृथ्वी नारायण शाह ने निर्णायक युद्ध किया। उस दिन काठमाण्डू में उत्सव था, इन्द्र यात्रा उत्सव, यह उत्सव आज भी मनाया जाता है। लोग उत्सवी माहौल में थे, कुछ नशे में थे। ऐसे में पृथ्वी नारायण शाह का आक्रमण सफल रहा। उस दिन से काठमाण्डू में शाह वंश के शासन की स्थापना हुई। काठमाण्डू पर अपने शासन की स्थापना के बाद पृथ्वी नारायण शाह ने अपने राज्य के विस्तार के लिए प्रयत्न प्रारंभ कर दिए। पृथ्वी नारायण शाह को ही नेपाल में श्री 5 बड़ा महाराज पृथ्वी नारायण शाह महाराज कहा जाता है। यद्यपि वे शाह वंश के प्रथम महाराजा नहीं थे। श्री पृथ्वी नारायण शाह ने काठमाण्डू विजय के बाद अपने राज्य विस्तार का अभियान प्रारंभ किया, लेकिन 4 वर्ष बाद ही उनकी मृत्यु हो गयी।

पृथ्वी नारायण शाह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र प्रताप सिंह राजा बने। उनके राज में उनके चाचा, अर्थात् श्री पृथ्वी नारायण शाह के भाई श्री बहादुर शाह के नेतृत्व में गौरवशाली सेना पश्चिम की ओर बढ़ी और पश्चिमी नेपाल पर विजय प्राप्त की। फिर वे आज के कुमाऊं, गढ़वाल पर विजय प्राप्त करते हुए कांगड़ा तक पहुंच गए। पूर्व की तरफ वे सिक्किम तक पहुंच गए, भूटान की सीमा तक। यह सब बहादुर शाह का प्रताप था। इसके बाद भी नेपाल का राज्य विस्तार हुआ और शाह वंश का राज चलता रहा।

दूसरी तरफ 1812-13 में ईस्ट इंडिया कंपनी, ने अब तक बिहार तक अपना राज कायम कर लिया था। उस बिहार की सीमा पर अंग्रेज सेना और गोरखाली सेना में दो लड़ाईयां हुई। 1814 में हुई दूसरी लड़ाई में गोरखा दरबार की हार हुई, इसके बाद 2 जनवरी 1815 को बिहार के सुगौली नामक स्थान पर एक संधि हुई। जिसे सुगौली संधि कहते हैं। इस संधि के अनुसार नेपाल की जो आज की सीमाएं है, वे तय हुईं।

1815 के बाद ब्रिटिश शासन का प्रभाव बढ़ने लगा। लेकिन नेपालियों ने अपने क्षेत्र में ब्रिटिशों को टिकने नहीं दिया। दूसरी तरफ ब्रिटिश भी नहीं चाहते थे कि वे पूरे नेपाल पर कब्जा करें, क्योंकि यह बहुत दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र था। उन्हें तो गोरखा सैनिक चाहिए थे और वे उन्हें मिल रहे थे। इन सब कारणों से ब्रिटिशों ने नेपाल पर कब्जा करने की बहुत अधिक कोशिश नहीं की। इस कारण नेपाल हमेशा स्वतंत्र रहा, मुगलों के समय में भी स्वतंत्र रहा। वहां किसी अन्य देश के राज का झण्डा आज तक कभी नहीं फहराया। इस बात का नेपाल और नेपालवासियों को बहुत गर्व है। वे भारत को मुगलान (मुगलों का देश) कहते हैं, हालांकि अब इस शब्द का प्रयोग बहुत कम हो गया है।

दूसरी तरफ नेपाल में शाह वंश का शासन चल ही रहा था। इस बीच नेपाली सेना के एक जनरल राम कुवंर, जो क्षत्रिय थे, ने अपनी शक्ति बढ़ाई और 14-15 सितम्बर, 1846 ई. की रात एक बड़ा हत्याकांड कर डाला। नेपाली सेना के शस्त्रागार, जिसे वहां कोत कहते हैं, में उस रात राजा के प्रधानमंत्री समेत 31 लोगों की हत्या कर दी गई। इसे लोग कोत पर्व के रूप में जानते हैं और काठमाण्डू में उस भवन को आज भी देखा जा सकता है। इस हत्याकांड के बाद राम कुवंर ने नेपाल की सत्ता संभाल ली, लेकिन राजा को नहीं मारा, राजतंत्र को खत्म नहीं किया। राजा के नाम पर उसने प्रधानमंत्री और सेनाध्यक्ष पद पर कब्जा कर लिया और अपना नाम बदलकर जंग बहादुर राणा कर लिया। उनके बाद उनकी संतति अपने नाम के साथ जंग बहादुर राणा लगाने लगी। इस प्रकार राजतंत्र के नाम पर प्रधानमंत्री और सेनाध्यक्ष पद पर कब्जा करके राणाशाही चलने लगी। राणा परिवार में सत्ता का हस्तांतरण बाप से बेटे को नहीं, बल्कि भाई से भाई को होता था। इसके चलते राणा परिवार में बहुत झगड़े होते थे। यह सिलसिला 1846 से 1946-47 तक चलता रहा, अर्थात् नाममात्र का राजा, राजमहल में बैठा रहता था। और उनके नाम पर राणाओं का राज था। राणा यदि चाहते तो राजतंत्र खत्म कर सकते थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसका कारण यही है कि राजतंत्र और राजा का नेपाली जनता बहुत आदर करती है, जैसा कि महाराजाधिराज श्री 5 बीरेन्द्र बीर बिक्रम शाहदेव की हत्या के बाद नेपाल में उपजी प्रतिक्रिया से समझा जा सकता है। 1946-47 में जब भारत में स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था, भारत को स्वतंत्रता मिली तब नेपाल के कुछ युवकों, जो बनारस, कलकत्ता, पटना आदि से पढ़कर नेपाल गए थे, ने भी मांग की कि हमारे यहां भी लोकतंत्र होना चाहिए। उन्होंने राणाशाही को खत्म करने का बीड़ा उठाया। इसी आधार पर नेपाली कांग्रेस पार्टी का गठन हुआ। जिसके नेता बि·ो·श्वर प्रसाद कोइराला, मातृका प्रसाद कोइराला, आदि ने मिलकर तय किया कि राणाशाही को समाप्त करना है। भारत भी चाहता था कि नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना हो। 1950 में नेपाल में भारत के राजदूत थे सर सी.पी.एम.सिंह। उस समय नेपाल के राजा थे त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह देव, उनके बेटे थे महेन्द्र बीर बिक्रम शाह देव। इन सबको लेकर राजा ने भारतीय दूतावास में शरण ली। इसके साथ-साथ नेपाली कांग्रेस ने सशस्त्र विद्रोह कर दिया और अंतत: लोकतंत्र की स्थापना हुई।

नेपाल में 18 फरवरी 1951 को लोकतंत्र की स्थापना हुई। नेपाल में आज भी इसे लोकतंत्र दिवस कहा जाता है। यह बहुत दिनों तक नहीं चला। महाराजा श्री त्रिभुवन का निधन हो चुका था और राजा महेन्द्र ने सत्ता संभाल ली थी। राजा महेन्द्र लोकतंत्र नहीं चाहते थे। राजा महेन्द्र ने 1959 में नेपाल में आम चुनाव कराया। इस चुनाव में नेपाली कांग्रेस को दो-तिहाई बहुमत मिला और श्री बी.पी. कोइराला प्रधानमंत्री बने। पर 15 दिसम्बर 1960 को राजा महेन्द्र ने इस सरकार को समाप्त कर संसद भंग कर दी और नेपाली कांग्रेस के नेताओं को जेल में डाल दिया। इसके साथ ही राजा ने पंचायती राज व्यवस्था प्रारंभ कर दी। 1959 में संविधान को रद्द कर 1962 में एक नया संविधान रच दिया गया, जिसमें पंचायती राज प्रणाली की बात कही गयी थी। 31 जनवरी 1972 को राजा महेन्द्र की मृत्यु हो गयी और श्री 5 बीरेन्द्र बीर बिक्रम शाहदेव नए महाराजा बने। 1962 के संविधान को 1990 में बदला गया। नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्टों के आंदोलन के बाद 8 अप्रैल 1990 को राजमहल को घेरकर लोगों ने महाराज बीरेन्द्र बीर बिक्रम शाह देव से यह आ·श्वासन ले लिया कि नेपाल में अब बहुदलीय राज प्रणाली व्यवस्था प्रारंभ हो जाएगी। इस प्रकार वहां बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रारंभ हो गयी। लेकिन राजतंत्र के प्रति नेपाली जनता की आस्था में कमी नहीं आई। -- अरविन्द घोष

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