दहेज


कितना दिखावा, कितनी मजबूरी

द नीति गोयल

दहेज से सम्बंधित कानून

थ् दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के अनुसार दहेज लेने, देने या इसके लेन-देन में सहयोग करने पर 5 वर्ष की कैद और 15,000 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है।

थ् दहेज के लिए उत्पीड़न करने पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए जो कि पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा सम्पत्ति अथवा कीमती वस्तुओं के लिए अवैधानिक मांग के मामले से संबंधित है, के अन्तर्गत 3 साल की कैद और जुर्माना हो सकता है।

थ् धारा 406 के अन्तर्गत लड़की के पति और ससुराल वालों के लिए 3 साल की कैद अथवा जुर्माना या दोनों, यदि वे लड़की के स्त्रीधन को उसे सौंपने से मना करते हैं।

थ् यदि किसी लड़की की विवाह के सात साल के भीतर असामान्य परिस्थितियों में मौत होती है और यह साबित कर दिया जाता है कि मौत से पहले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था, तो भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी के अन्तर्गत लड़की के पति और रिश्तेदारों को कम से कम सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है। क्या कसूर था रजनी का? 30 वर्षीया रजनी मिश्रा मुम्बई के एक कार्यालय में नौकरी करती थी। अपने हंसते-खेलते परिवार के साथ रहने वाली रजनी ने अपने आई.ए.एस. पति की हर मांग को अपने परिवार वालों से कहकर पूरा कराने की कोशिश की। लेकिन आखिर वह भी कहां तक सहती? अपने ससुराल वालों और पति के तानों और उनकी रोज-रोज की मांगों से तंग आकर रजनी ने एक दिन अपनी इह लीला समाप्त कर ली। रजनी की कहानी अपनी तरह की एकमात्र कहानी नहीं है। सौराष्ट्र की संजना मिश्रा, बरेली की विभा आर्या, भिवानी की कल्पना मित्तल और न जाने कितनी ही लड़कियों की कहानी रजनी जैसी ही है। ग्वालियर की 22 वर्षीया तारा वर्मा की विवाह के एक साल बाद ही मौत हो गई। कारण? तारा के पिता विवाह के समय किए गए कार देने के अपने वायदे को पूरा नहीं कर पाए थे। ससुराल वालों ने तीन दिन तक तारा को भूखा-प्यासा रखकर उसे मरने को मजबूर कर दिया।

कहा जाता है कि आजादी के इन 55 सालों में भारत ने बहुत प्रगति की है, लेकिन क्या इस प्रगतिशील देश में महिला की

स्थिति में कुछ बदलाव आया है? एक ओर तो नारी सेना, प्रशासनिक सेवाओं, राजनीति और न जाने कहां-कहां कदम रख रही है और दूसरी ओर, दहेज के लोभी महिषासुर उसी नारी को जिन्दा जला डालते हैं। उपभोक्तावाद के इस दौर ने क्या विवाह को एक मण्डी नहीं बना दिया है जहां हर कोई अपनी बोली लगवाने के लिए सजा-धजा खड़ा है? लड़की चाहे पढ़ी-लिखी क्यों न हो, दहेज न दे पाने की सूरत में उसे यातनाएं सहनी पड़ती हैं। दहेज प्रथा की जिस अग्नि में अब तक सैकड़ों लड़कियां जल चुकी हैं, उस अग्नि की ताप कभी न कभी हर व्यक्ति को महसूस होती है। लेकिन कब? शायद तब जब बात "अपनी बेटी' की हो।

दहेज की इस कुप्रथा को खत्म करने के लिए सरकार ने भी कई कानून बनाए। लेकिन क्या कानूनों से मानसिकता बदली है? और वैसे भी क्या ये कानून अपने आप में इतने सक्षम, इतने प्रभावी हैं कि वे वास्तव में उन दहेज लोलुप लड़के वालों के हाथों में हथकड़ियां लगवा सकें जो किसी की बेटी को नोटों की थैली से अधिक कुछ नहीं समझते?

1961 में संसद में दहेज निषेध अधिनियम पारित किया था। आज कहां है वह कानून और कहां हैं उसका पालन करने वाले? क्या वह सिर्फ पन्नों पर उकेरे कुछ शब्द मात्र बनकर नहीं रह गया? इस अधिनियम में दिए गए अधिकतर प्रावधान वर्तमान समय में अव्यावहारिक और एक दृष्टि से अनुचित हैं। दहेज विरोधी जितने कानून अब तक बनाए गए हैं-उनमें मुख्य है दहेज निषेध अधिनियम, 1961। इस अधिनियम के आंकड़ों का सच

थ् नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, इस शताब्दी में दहेज के कारण होने वाली मौतों की संख्या में 4.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इनमें से 31.8 प्रतिशत मामले अकेले उत्तर प्रदेश के हैं।

थ् कर्नाटक में रोजाना दहेज की मांग के कारण कम-से-कम तीन लड़कियां जिन्दा जला दी जाती हैं। दिसम्बर 2002 से मार्च 2003 तक बंगलौर में 80-100 प्रतिशत जली हुई अवस्था में 150 से अधिक लड़कियों को अस्पतालों में भर्ती कराया गया।

थ् गैर अधिकारिक सूत्रों के अनुसार अब तक दहेज के लिए प्रताड़ना झेलते हुए लगभग 25,000 महिलाएं अपनी जान गवां चुकी हैं।

अन्तर्गत दहेज लेने, देने या इसके लेन-देन में सहयोग को कानूनी अपराध घोषित किया गया है। दहेज की परिभाषा स्पष्ट करते हुए इसमें लिखा गया कि विवाह के समय, उससे पहले अथवा उसके बाद प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से विवाह के निमित्त दी गई अथवा देने की सहमति की गई ऐसी किसी भी सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति को दहेज माना जाएगा जो विवाह में शामिल किसी भी एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष को दी जाती है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो विवाह के निमित्त एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष को दिया गया नकद पैसा, जेवर, कपड़े और अन्य उपहार दहेज माना जाएगा। उल्लेखनीय है कि यहां पर किसी तरह की कोई मूल्य-सीमा निर्धारित नहीं की गई है। यानी वधु को 100 रुपए देने वाला भी कानूनी रूप से उतना ही दोषी है जितना 10,000 रुपए देने वाला। क्या यह व्यावहारिक है? हमारे यहां प्राचीन काल से ही माता-पिता अपने पुत्र-पुत्री को एक नया संसार बसाने में मदद करने के लिए अपनी ओर से सहायता देते आए हैं। यह एक स्वाभाविक मानव इच्छा होती है जिसके कारण लोग अपने बच्चों के प्रति स्नेह और अपनी आर्थिक क्षमता के अनुरूप उन्हें भेंट देते हैं।

इसी अधिनियम के खण्ड 3 के अन्तर्गत दहेज देने, लेने या उसमें सहयोग करने वालों को कम से कम 5 वर्ष की कैद और 15,000 रुपए का जुर्माना हो सकता है। हालांकि इसी अधिनियम में आगे यह भी उल्लेख किया गया है कि यह उपरोक्त सजा उन उपहारों के लेन-देन पर लागू नहीं होती जो कि वधु को बिना किसी मांग के दिए गए हैं, बशर्ते उन उपहारों को इस अधिनियम के नियमों के अनुसार बनाई गई उपहारों की एक सूची में दर्ज कर, उस सूची पर दोनों पक्षों व वर-वधु के हस्ताक्षर करवाए जाएं। साथ ही पारम्परिक रीति-रिवाजों के प्रतीक स्वरूप दिए जाने वाले उपहार जैसे पलंग, बर्तन आदि भी इस नियम के अन्तर्गत नहीं आते बशर्ते इन उपहारों की कीमत उपहार देने वाले पक्ष की आर्थिक स्थिति के अनुरूप हो। प्रश्न उठता है कि क्या यह प्रमाणित करना संभव है कि दिया जाने वाला सामान वर पक्ष की मांग के दबाव में दिया जा रहा है अथवा स्वेच्छा से या फिर समाज में नाक ऊंची दिखाने के लिए एक दिखावे की तरह? दूसरा, सूची में दर्ज करने वाले उपहारों की क्या कोई मूल्य-सीमा है? उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति 8,000 रुपए नकद न देकर, इतनी ही कीमत की एक साड़ी उपहार में दे दे, तो क्या उस पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगना चाहिए?

अधिनियम के ही एक और खण्ड में विवाह से सम्बंधित विज्ञापन में विवाह के बदले में सम्पत्ति अथवा व्यवसाय में किसी तरह के अंशदान या पैसे का आ·श्वासन देना प्रतिबंधित है। ऐसे विज्ञापनदाता, प्रकाशक व मुद्रक के लिए 6 माह से पांच वर्ष तक की सजा और 15,000 रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन क्या कोई बताएगा कि "शालीनतापूर्ण विवाह का आश्वासन' (डीसेन्ट मैरिज इज प्रोमिस्ड) के वाक्य वाले वैवाहिक विज्ञापन क्या अपने आप में अच्छे-खासे दहेज की "गारंटी' नहीं देते?

दहेज नामक इस कुरीति की जड़ें हमारे समाज में इस गहराई तक फैली हुई हैं कि इन्हें हटाने के लिए केवल कानून बनाना ही काफी नहीं है। यह एक संवेदनशील क्षेत्र है जहां कानून को लागू करना एक बहुत ही टेढ़ी खीर है। मानव बुद्धि बहुत विलक्षण है। वह हर कानून का तोड़ निकाल लेती है और इसीलिए कानून किसी भी सामाजिक बुराई को दूर करने के लिए सबसे कमजोर हथियार सिद्ध होता रहा है। इस अधिनियम के कुछ अन्य प्रावधानों पर नजर डालें-

हिमाचल प्रदेश, पंजाब आदि कुछ राज्यों ने सन् 1976 में इस अधिनियम में संशोधन के माध्यम से खण्ड 4 में कुछ बातें शामिल कीं। इसमें सगाई, मिलनी, विवाह आदि के उपलक्ष्य में शगुन के रूप में दी जाने वाली रकम को 11 रुपए तक सीमित किया गया। साथ ही बारात में 25 से अधिक लोगों को ले जाना भी कानूनी रूप से प्रतिबंधित घोषित किया गया (इसमें बाजे वाले और अव्यस्क शामिल नहीं हैं)। साथ ही इसका उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति को 6 माह की कैद अथवा 5,000 रुपए तक जुर्माना अथवा दोनों ही से दण्डित किए जाने का प्रावधान रखा गया।

ये दोनों प्रावधान किस समाज को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं, यह कहना कठिन लगता है। जहां तक 11 रुपए तक मूल्य सीमा निर्धारित करने की बात है, आज निम्न वर्ग में होने वाली शादियों में ही विवाह का खर्च 2-3 लाख रुपए के बीच आ जाता है। यहां एक प्रश्न यह भी है कि सीमा केवल उपहार खर्च पर लगाई गई है, जबकि ध्यान देने वाली बात यह है कि आज विवाह समारोहों में साज-सज्जा पर ही एक मोटी रकम खर्च कर दी जाती है। क्या कानून बनाने वाले यह मानकर चलते हैं कि जो पिता कुछ घंटों की सजावट पर लाखों रुपए खर्च करता है, वह अपनी बेटी के जीवनभर के दहेज के लिए ग्यारह रुपए देगा? महानगरों में "फार्म हाउसों' पर होने वाले किसी भी विवाह समारोह में जाकर देखें तो वहां 500 तो गाड़ियां ही खड़ी मिल जाएंगी। जब कभी किसी "फार्म हाउस' में शादी होती है तो यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वहां दहेज निषेध कानून का उल्लंघन हो रहा है।

दहेज की इस कुरीति का उपचार केवल कानून द्वारा नहीं हो सकता। मुख्य बात है समाज में जागृति उत्पन्न करना। इस सामाजिक बुराई के पीछे कई गहरे कारण होते हैं, जैसे-

थ् वर पक्ष और वधु पक्ष के बीच आर्थिक विषमता थ् लड़के और लड़की दोनों के अकेले जीवन चलाने की क्षमता में अन्तर थ् फैशनपरस्त वातावरण का प्रभाव थ् आधुनिक समाज की मूलभूत मान्यताओं में परिवर्तन।

आज जीवन विलासी होता जा रहा है। जो सामान लड़के पहले 15-20 साल काम करके इकट्ठा कर पाते थे, वही सामान आज लड़के विवाह के समय बटोर लेना चाहते हैं। यह उपभोक्तावादी प्रवृत्ति भारतीय सभ्यता और संस्कृति के नितान्त विरुद्ध है। आज इन पवित्र परम्पराओं के प्रति हमारा दृष्टिकोण दूषित होता जा रहा है। गत दिनों दिल्ली स्टडी ग्रुप द्वारा दहेज के विरोध में खुलकर सामने आने वाली सुश्री निशा शर्मा के सम्मान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में केन्द्रीय जहाजरानी मंत्री श्री शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि दहेज की प्रथा को बढ़ावा देने के लिए केवल पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी समान रूप से दोषी होती हैं जो अपनी बहू को दहेज लाने के लिए उत्पीड़ित करती हैं। दहेज एक सामाजिक समस्या है जिसका उन्मूलन तभी हो सकता है जब हम संकल्पपूर्वक इसके विरुद्ध कदम उठाएं। श्री सिन्हा ने कहा कि जिन महिलाओं पर विवाह के बाद दहेज के लिए अत्याचार होते हैं, उनके लिए पति और परिवार से अलग होनेे का निर्णय बहुत कठिन होता है क्योंकि उनके बच्चों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। मुकदमा दर्ज होते ही वैवाहिक जीवन का रास्ता भी बंद हो जाता है। इसलिए इस विषय में पहल केवल महिला नहीं कर सकती।

दहेज से सम्बंधित किसी भी कानून को प्रभावी बनाने के लिए सरकार को अपनी पहल पर कदम उठाने होंगे। विडम्बना है कि अब तक ऐसा एक भी मामला नहीं आया है जहां सरकार ने अपनी तरफ से किसी पर दहेज विरोधी कानून का उल्लंघन करने के लिए मुकदमा किया हो। क्या मंत्रियों, प्रतिष्ठित व्यवसायियों या समाज के उच्च तबके में बजने वाले विवाहों के ढोल सरकार के कानों को सुनाई नहीं देते? दहेज के विरुद्ध जितनी शिकायतें और जितने मुकदमे दायर होते हैं, उनमें से 5 प्रतिशत मामलों में भी अभियुक्तों को सजा नहीं हो पाती। अधिकतर मामले तो न्यायालय के बाहर ही आपसी समझौता करके निपटा लिए जाते हैं। चिंताजनक विषय तो यह है कि इस कानून का दुरुपयोग भी बढ़ता जा रहा है। हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता में दहेज से सम्बंधित दो अपराधों को जमानती और समझौता योग्य बनाने का सुझाव दिया है। न्यायालय ने कहा कि ये धाराएं (406 तथा 498 ए) विवाह की आधारशिला को हिला रही हैं, जो समाज के लिए लाभकारी नहीं है। महिलाएं तथा उनके माता-पिता आदतन पति के परिवार के सभी सदस्यों, यहां तक कि बच्चों को भी दहेज के मामले में लपेट लेते हैं। परिवार के एक सदस्य की गिरफ्तारी के साथ पति-पत्नी के बीच समझौते की सभी संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं। न्यायालय ने राय दी कि यदि नाबालिग बच्चों का नाम अभियुक्त के रूप में दिया गया है, तो उन्हें गिरफ्तार न करके, उनका मामला अदालत भेज देना चाहिए।

दहेज की इस कुप्रथा का सबसे बड़ा शिकार लड़की ही होती है। लेकिन क्या इसमें कुछ दोष उन पिताओं का नहीं है जो अपनी पुत्रियों के विवाह में खर्च इसलिए करते हैं ताकि वे अपनी नाक ऊंची कर सकें? एक तरफ समाज में वह परिवार है जो बेटी के विवाह के कारण पूरी जिन्दगी कर्ज में डूबा रहता है और दूसरी तरफ वह परिवार है जो चमक-दमक के अंधे खेल में पानी की तरह पैसा बहाता है।

प्रश्न उठता है दिखावे और मजबूरी का। लक्ष्य एक ही है-दहेज। यह प्रश्न कितना गूढ़ और असमंजस पैदा करने वाला है और इसका निदान क्या हो, यह खोजना समाज का काम है। द

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